आत्म ज्ञान की सीधी दृष्टि| Knowledge of the Self अध्याय 15 अष्टावक्र गीता part 1
पन्द्रहवें प्रकरण में अष्टावक्र मुनि जनक को बार-बार उसी सत्य की ओर ले जाते हैं, लेकिन इस बार बात केवल किसी साधना, कर्म, पूजा या बाहरी परिवर्तन की नहीं है।…
पन्द्रहवें प्रकरण में अष्टावक्र मुनि जनक को बार-बार उसी सत्य की ओर ले जाते हैं, लेकिन इस बार बात केवल किसी साधना, कर्म, पूजा या बाहरी परिवर्तन की नहीं है।…
अष्टावक्र गीता का 14वां प्रखंडप्रकरण बहुत सूक्ष्म है । यहां जनक केवल यह नहीं बता रहे हैं कि ज्ञानि कैसे व्यवहार करता है , बल्कि वह उसे अंतिम आंतरिक अवस्था…
“त्याग से भी आगे , ग्रहण से भी आगे , केवल अपने स्वरूप में विश्राम ” तेरहवाँ प्रकरण बहुत गहरा है। यहाँ राजा जनक किसी साधना की शुरुआत नहीं कर…
अष्टावक्र गीता का बारहवाँ प्रकरण पिछले अध्याय की स्वाभाविक परिणति है। ग्यारहवें प्रकरण में अष्टावक्र ने राजा जनक को आत्मज्ञान का स्वरूप समझाया था—तुम शरीर नहीं हो, मन नहीं हो,…
यह अध्याय ज्ञानाष्टक कहलाता है। इसमें अष्टावक्र मुनि राजा जनक को बताते हैं कि मन की वास्तविक शांति बाहर की परिस्थितियाँ बदलने से नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने…
क्या आपने कभी सोचा है कि आपका पूरा जीवन इसी क्षण में घट रहा है? फिर भी आप इसी क्षण में नहीं जी रहे? अभी इस समय जब आप मेरी…
यह अष्टाव के गीता अध्याय 10 ( उपसम प्रकरण ) का प्रारंभ है । इस अध्याय का मुख्य संदेश है – मन को संसार की दौड़ से हटकर आत्मा में…
अष्टावक्र गीता का नया अध्याय साधक को जीवन के सबसे गहरी भ्रमों से बाहर निकलने का प्रयास करता है । इस अध्याय में अष्टावक्र जनक को बताते हैं कि संसार…
खुद को जानने के बाद इंसान बोलना क्यों छोड़ देता है? हम पूरी जिंदगी बोलते रहते हैं। अपने बारे में, दूसरों के बारे में, अपने दुख, अपनी इच्छाएं, अपने विचार।…
अष्टावक्र गीता का आठवां अध्याय अत्यंत सक्षिप्त हैं परंतु इसके चार श्लोक संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन का सर समेटे हुए हैं । यहां अष्टावक्र बंधन और मोक्ष की ऐसी परिभाषा देते…
अष्टावक्र गीता के सातवें अध्याय में राजा जनक अपने आत्मानुभव को व्यक्त कर रहे हैं। अब वे केवल शास्त्रों की बातें नहीं कर रहे, बल्कि उस सत्य को बोल रहे…
इस अध्याय में वक्ता बदल जाते हैं । अब ऋषि अष्टावक्र नहीं बल्कि आत्मा ज्ञान प्राप्त कर चुके राजा जनक अपने अनुभव को व्यक्त कर रहे हैं पिछले अध्ययनों में…
पांचवी अध्याय में ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को आत्मज्ञान की अंतिम अवस्था का रहस्य बताते हैं इस अध्याय का मुख्य विषय है लय अर्थात मन अहंकार और देहाभिमान का आत्मा…
अष्टावक्र गीता का चौथा अध्याय glorification of self realization आत्मज्ञान की महिमा आत्म ज्ञान व्यक्ति की अद्भुत अवस्था का वर्णन करता है यहां राजा जनक आश्चर्यचकित होकर बताते हैं कि…
अष्टावक्र गीता का तीसरा अध्याय आत्मज्ञान के बाद मनुष्य के वास्तविक अवस्था का वर्णन करता है यह अध्याय केवल दर्शन ही बल्कि उसे व्यक्ति की मन: स्थिति को प्रकट करता…
यह अध्याय केवल शास्त्र का ज्ञान नहीं है, बल्कि उस आत्मा की पुकार है जिसने स्वयं को पहचान लिया। पहले अध्याय में गुरु Ashtavakra ने राजा Janaka को आत्मज्ञान का…
यह अध्याय केवल श्लोकों का संग्रह नहीं है, बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष बोध कराने वाला दिव्य संवाद है। Ashtavakra यहाँ आत्मा का ऐसा ज्ञान देते हैं…