ashtavakra Gita

जब भीतर कुछ पाने को नहीं बचता — जनक की परम शांति| अध्याय 14 Tranquillity अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता का 14वां प्रखंडप्रकरण बहुत सूक्ष्म है । यहां जनक केवल यह नहीं बता रहे हैं कि ज्ञानि कैसे व्यवहार करता है , बल्कि वह उसे अंतिम आंतरिक अवस्था…

“आत्मानन्द में स्थित जीवन्मुक्त का जीवन” | अध्याय 13 Happiness अष्टावक्र गीता

“त्याग से भी आगे , ग्रहण से भी आगे , केवल अपने स्वरूप में विश्राम ” तेरहवाँ प्रकरण बहुत गहरा है। यहाँ राजा जनक किसी साधना की शुरुआत नहीं कर…

स्वात्मनिष्ठा: जब साधक साधनों से आगे बढ़कर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाता है । अध्याय 12 Abiding in the Self अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता का बारहवाँ प्रकरण पिछले अध्याय की स्वाभाविक परिणति है। ग्यारहवें प्रकरण में अष्टावक्र ने राजा जनक को आत्मज्ञान का स्वरूप समझाया था—तुम शरीर नहीं हो, मन नहीं हो,…

अष्टावक्र गीता – अध्याय 11 (ज्ञानाष्टक) | wisdom

यह अध्याय ज्ञानाष्टक कहलाता है। इसमें अष्टावक्र मुनि राजा जनक को बताते हैं कि मन की वास्तविक शांति बाहर की परिस्थितियाँ बदलने से नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने…

आप वर्तमान में क्यों नहीं जी पाते ? | अष्टावक्र गीता का सबसे गहरा रहस्य

क्या आपने कभी सोचा है कि आपका पूरा जीवन इसी क्षण में घट रहा है? फिर भी आप इसी क्षण में नहीं जी रहे? अभी इस समय जब आप मेरी…

जब मन की सारी दौड़ समाप्त हो जाती है । Quietude – शांति Chapter 10

यह अष्टाव के गीता अध्याय 10 ( उपसम प्रकरण ) का प्रारंभ है । इस अध्याय का मुख्य संदेश है – मन को संसार की दौड़ से हटकर आत्मा में…

अष्टावक्र गीता अध्याय 9 – वासना, द्वन्द्व और वैराग्य का रहस्य | Detachment

अष्टावक्र गीता का नया अध्याय साधक को जीवन के सबसे गहरी भ्रमों से बाहर निकलने का प्रयास करता है । इस अध्याय में अष्टावक्र जनक को बताते हैं कि संसार…

जिसने स्वयं को जान लिया, उसके शब्द क्यों खो जाते हैं? | अष्टावक्र गीता का मौन रहस्य

खुद को जानने के बाद इंसान बोलना क्यों छोड़ देता है? हम पूरी जिंदगी बोलते रहते हैं। अपने बारे में, दूसरों के बारे में, अपने दुख, अपनी इच्छाएं, अपने विचार।…

अध्याय 8 – बन्धन और मोक्ष का रहस्य (The Secret of Bondage and Liberation)

अष्टावक्र गीता का आठवां अध्याय अत्यंत सक्षिप्त हैं परंतु इसके चार श्लोक संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन का सर समेटे हुए हैं । यहां अष्टावक्र बंधन और मोक्ष की ऐसी परिभाषा देते…

अध्याय 7 – आत्मज्ञान की पराकाष्ठा (Nature of Self-Realization)

अष्टावक्र गीता के सातवें अध्याय में राजा जनक अपने आत्मानुभव को व्यक्त कर रहे हैं। अब वे केवल शास्त्रों की बातें नहीं कर रहे, बल्कि उस सत्य को बोल रहे…

Chapter – 6 – The Higher Knowledge | लययोग ( उच्चतम आत्मज्ञान)

इस अध्याय में वक्ता बदल जाते हैं । अब ऋषि अष्टावक्र नहीं बल्कि आत्मा ज्ञान प्राप्त कर चुके राजा जनक अपने अनुभव को व्यक्त कर रहे हैं पिछले अध्ययनों में…

Chapter 5 – four ways to dissolution | आत्मा में विलीन होने का मार्ग

पांचवी अध्याय में ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को आत्मज्ञान की अंतिम अवस्था का रहस्य बताते हैं इस अध्याय का मुख्य विषय है लय अर्थात मन अहंकार और देहाभिमान का आत्मा…

Chapter 4 Glorification of self realization | आत्म ज्ञान कि महिमा

अष्टावक्र गीता का चौथा अध्याय glorification of self realization आत्मज्ञान की महिमा आत्म ज्ञान व्यक्ति की अद्भुत अवस्था का वर्णन करता है यहां राजा जनक आश्चर्यचकित होकर बताते हैं कि…

अध्याय 3 – आत्म बोध का स्वाद | taste of self realization

अष्टावक्र गीता का तीसरा अध्याय आत्मज्ञान के बाद मनुष्य के वास्तविक अवस्था का वर्णन करता है यह अध्याय केवल दर्शन ही बल्कि उसे व्यक्ति की मन: स्थिति को प्रकट करता…

अध्याय 2 — आत्मसाक्षात्कार में शिष्य का आनंद | ashtavakra Gita explain details

यह अध्याय केवल शास्त्र का ज्ञान नहीं है, बल्कि उस आत्मा की पुकार है जिसने स्वयं को पहचान लिया। पहले अध्याय में गुरु Ashtavakra ने राजा Janaka को आत्मज्ञान का…

आत्मज्ञान का उपदेश Ashtavakragita chapter 1

यह अध्याय केवल श्लोकों का संग्रह नहीं है, बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष बोध कराने वाला दिव्य संवाद है। Ashtavakra यहाँ आत्मा का ऐसा ज्ञान देते हैं…

मैं महासमुंद हु , संसार केवल लहर है | लय योग क्या है, लय योग का रहस्य| अष्टावक्र गीता अध्याय 7

अष्टावक्र गीता का सातवां प्रकरण राजा जनक की आत्म साक्षात्कार से उपजी वाणी है यहां गुरु नहीं बोल रहे यहां ज्ञान स्वयं बोल रहा है । आत्मा= अन्नत महासमुंद संसार=…