अष्टावक्र गीता का नया अध्याय साधक को जीवन के सबसे गहरी भ्रमों से बाहर निकलने का प्रयास करता है । इस अध्याय में अष्टावक्र जनक को बताते हैं कि संसार की सबसे बड़ी समस्या संसार नहीं है ? बल्कि संसार के प्रति हमारी अपेक्षाएं हैं । मनुष्य जीवन भर यह सोचता रहता है कि एक दिन ऐसा आएगा जब सब कुछ ठीक हो जाएगा, सारे संघर्ष समाप्त हो जाएंगे । मन पूरी तरह शांत हो जाएगा और जीवन में केवल सुख ही सुख होगा लेकिन अष्टावक्र पहले ही श्लोक में इस भ्रम को तोड़ देते हैं वह कहते हैं कि कृत्य अकृत्य अर्थात क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए तथा सुख-दुख , लाभ हानि , मान अपमान जैसे द्वंद इस संसार में कभी किसी के लिए पूरी तरह समाप्त नहीं हुए यदि स्वयं जीवन ही परिवर्तन और विरोधी अभ्यास का नाम है तो फिर मनुष्य किस आषा में पूर्ण परिस्थितियों की प्रतीक्षा कर रहा है । जो यह समझ लेता है कि संसार का स्वभाव ही द्वंद्व है। वह धीरे-धीरे निश्चित हो जाता है उसका मन बाहरी परिस्थितियों को बदलने के बजाय स्वयं को जानने की ओर मुड़ जाता है । यही वस्तविक वैराग्य है ।
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा ।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद् भव त्यागपरोऽव्रती ॥ ९-१॥
जब तक मन के भीतर यह करना चाहिए यह नहीं करना चाहिए का हठ तब तक बंधन है । जब यह समझ आ जाता है कि दुनिया के दुख सुख कभी स्थाई नहीं तब स्वतः वैराग्य जन्म लेता है ।
इस जनक इस संसार में कभी किसी का कर्तव्य कर्तव्य लाभ हानि की सुख दुख या द्वंद्व शांत हुए हैं ?
कभी भी नहीं !
यह सदा बदलते रहते हैं इसलिए इसे चिपक कर मत बैठो
जब तुम यह सत्य समझ लेते हो कि दुनिया का कोई भी द्वंद स्थाई नहीं और इन्हें नियंत्रित नहीं किया जा सकता तभी वास्तविक वैराग्य पैदा होता है
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमः गताः ॥ ९-२॥
हे तात ! लोक की चेष्टा को देखकर किसी भाग्यशाली की ही जीने की कामना, भोगने की वासना और ज्ञान की इच्छा शान्त हुई है। ॥२॥
संसार की असली प्रकृति उसका आना-जाना जन्म मरण सुख दुख का खेल जब कोई गहरी मन से देखा है तो उसके भीतर तीनों प्रकार की इच्छाएं मूसा जाती है
1 जीवन की इच्छा
2 भोगो की इच्छा
3 ज्ञान पाने की इच्छा ।
हे प्रिय कभी-कभी किसी बहुत ही कम भाग्यशाली साधक के अंदर वैराग्य इतनी गहरी से जागता है कि बस संसार की चेषताओं को ध्यान से देखकर ही जीने की इच्छाएं , भोगों की भूख और जाने की लालसा तीनों शांत कर बैठता है
वैराग्य= इच्छाओं का शांत हो जाना
संसार को बदलना नहीं है = संसार को देखना है।
अष्टावक्र आगे कहते हैं कि संसार की चेष्टाओं को देखकर किसी विरले भाग्यशाली व्यक्ति की ही जीने की अधी इच्छा , भोगों की वासना और ज्ञान प्राप्त करने की लालसा शांत होती है । सामान्य व्यक्ति संसार को देखकर और अधिक दौड़ने लगता है । और दूसरों की सफलता देखकर और अधिक धन चाहता है , दूसरों के सुख देकर और अधिक धन चाहता है । और दूसरों के ज्ञान को देखकर स्वयं को बड़ा ज्ञानी बनाना चाहता है । लेकिन कोई दुर्लभ विवेक व्यक्ति ऐसा भी होता है जो इस अंतहीन दौड़ को देखकर जग जाता है । वह देखता है कि राजा से लेकर भिखारी तक विद्वान से लेकर मूर्ख तक हर कोई किसी न किसी इच्छा का दास है वह समझ जाता है कि यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होगी । तब उसके भीतर एक गहरी विरक्ति उत्पन्न होती है । यह निराश नहीं बल्कि जागृति है । बस समझ आता है कि जिस वस्तु को पाने के लिए पूरी दुनिया भाग रही है वह वस्तु वास्तव में स्थाई सुख देने में असमर्थ है।
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम् ।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ॥ ९-३॥
तीसरे श्लोक में अष्टावक्र संसार के वास्तविक का कठोर चित्र प्रस्तुत करते हैं । वह कहते हैं की संपूर्ण जगत और अनित्य है तीन प्रकार के तापों से दूषित हैं और सारहीन है । तीन तापों का अर्थ है आध्यात्मिक कष्ट शारीरिक कष्ट और बाहरी परिस्थितियों से उत्पन्न कष्ट।
कोई व्यक्ति चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों ना हो इन तीनों टेपों से पूरी तरह बच नहीं सकता शरीर रोगी हो सकता है, मन दुखी हो सकता है और संसार की परिस्थितियों कभी भी बदल सकती है ।
जिस चीज को हम आज अपना समझते हैं वह कल छूट सकती है जिस व्यक्ति पर हम सबसे अधिक भरोसा करते हैं वह भी एक दिन इस समय संसार से चला जा सकता है इसलिए अष्टावक्र कहते हैं कि जब मनुष्य यह निश्चित रूप से देख लेता है कि संसार की हर वस्तु अस्थाई है तभी उसके भीतर वास्तविक शांति उत्पन्न होती है । शांति वस्तुओं को प्राप्त करने से नहीं बल्कि उनकी वास्तविक को जानने से आती है
पदार्थ में ग्लानि और दोष दृष्टि का नाम ही वैराग्य है जितने संसार की उत्पत्ति और नाश वाले पदार्थ हैं सब में दोष लगे हैं ।
वैराग्य का उदय केवल तब होता है जब मन वास्तव में संसार की प्रकृति को समझ लेता है , ये समझ पढ़ने से नहीं जीवन देखकर आती है
यह सब अस्थिर है यह सब चला जाने वाला है यह अनुभव वैराग्य की जड़ है।
बैरागी के आठ श्लोक जिसमें शिष्य को यह बताया गया है कि संसार में क्या-क्या चीज त्याग्नि चाहिए कैसे त्याग्नि चाहिए और क्यों त्याग्नि चाहिए?
निर्वेद मतलब उदासीनता नहीं बल्कि बड़ी शुद्ध समझ के बाद संसार के दोष देकर मन का उसे हट जाना
त्याग कैसे होता है – कृत आकृत सुख दुख लाभ हानि जय पराजय से ऊपर कैसे उठाना ?
जितने भी विषय हैं सो सब दुख के ही कारण है।
शादी करना , ना करना आध्यात्मिक में नहीं आपकी जीवन स्थिति लक्ष्य और मन स्थिति पर निर्भर करता है ।
अष्टावक्र का अर्थ है यह नहीं है कि –
स्त्री पाश है – इसलिए विवाह मत करो
पुत्र पाश है – इसलिए परिवार मत बनाओ
धन पाश है – इसलिए व्यापार मत करो
असल अर्थ यह है ” जिस चीज को तुम चिपकती हो आसक्त हो वही बंधन बनती है राजा हुए होते हुए भी तुम संसार में रहते हुए भी मुक्त हो समस्या बस मन की आसक्ति है
यह संपूर्ण जगत अनित्य हैं तीनों प्रकार के काष्ठा से दूषित है सारहीन है त्याज्य है यह निश्चित जान लेने पर ज्ञानी शांत हो जाता है ।
* अनित्य – सब बदल रहा है देह , शरीर , रिश्ते , धन , सुख , पद कोई स्थाई नहीं । तो उस पर टीके रहने से दुख ही होगा ।
*हर चीज तीन दुखों से भरी है तीन प्रकार केदुख
1 आध्यात्मिक (शरीर मन संबंधी)
काम, क्रोध , लोभ , ईर्ष्या बुखार बीमारी दर्द अंतर में उत्पन्न होते हैं ,
2 अधिभौतिक ( बाहरी प्राणी वस्तुओं)
मनुष्य से झगड़ा , पशु का आक्रमण , सरकार , समाज , जीव , जगत से मिलने वाले कष्ट
3 आधिदैविक (दैवी प्रकृति)
बारिश , बाढ़, गर्मी , ग्रह, नक्षत्र, भाग्य – मनुष्य नियंत्रण से बाहर
इन तीनों से संसार हर समय दूषित है ज्ञानी संसार को नहीं छोड़ता संसार की पकड़ को छोड़ता है
वह जानता है कि सब क्षणभंगुर है – अनित्य
किसी भी चीज से सुखस्थाई नहीं – असारम
और सब कुछ तीन दुखों से भरा है – तापत्रित्य दुषितम
किसी भी देहदारी से यह सुख-दुख किसी काल में त्यागगे नहीं जा सकते इस वास्ते विवेक की पुरुष उन सुख दुख आदिक द्वंद में भी इच्छा को त्याग कर शरीर को प्रारब्ध आश्रित छोड़ देता है ।
कोऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम् ।
तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ९-४॥
ऐसी कौन सी समय है और ऐसी कौन सी अवस्था है जिसमें मनुष्य कोई द्वंद न हो बचपन में अपनी समस्याएं हैं , युवा में अपनीबी, वृद्धा अवस्था में अपनी । गरीब दुखी हैं क्योंकि उसके पास धन नहीं है , अमीर दुःखी है क्योंकि उसके पास शांति नहीं , जो अविवाहित हैं वह विवाह चाहता है और जो विवाहित है पर स्वतंत्रता चाहता है। इसका अर्थ है की समस्या परीस्थिति में नहीं मन की प्रकृति में इसलिए अष्टावक्र कहते हैं कि जो व्यक्ति इन द्वंद की उपेक्षा करके जो कुछ सहज रूप से प्राप्त हो जाए उसमें संतुष्ट रहता है वही सिद्धि को प्राप्त करता है । सिद्धि का अर्थ या कोई चमत्कारिक शक्ति नहीं बल्कि आत्मिक स्थिरता है
आत्मा – सत्य रूप , ज्ञान स्वरूप और आनंद रूप है । इस श्रुति के साथ विरोध आता है दूसरा दोनों ईश्वर और जीव को जड़ मानने से से जगदांध (संसार के मोह-माया या अज्ञान में अँधा) प्रसंग होगा ।
अगर हम मान ले की
*कभी आत्मा ईश्वर भी जड़ तो एक बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी जड़ में चेतना नहीं , जड़ कुछ कर नहीं सकती , सुख-दुख भोग नहीं सकती , जड़ फल नहीं दे सकती । तो फिर संसार कैसे चल रहा है ? कौन भोक्ता है ? कौन काम करता है ?कौन फल देता है ?
अगर सब जड़ है ? संसार अंधा हो जाएगा कोई चलने वाला नहीं रहेगा !
* गुण -गुणी अलग नहीं हो सकते ।
* अग्नि – उष्णता+ प्रकाश । अगर आप उष्णता ओर प्रकाश निकल दे तो अग्नि नाम की कोई चीज बचती ही नहीं
वैसे ही
*आत्मा – ज्ञान+चेतना
अगर ज्ञान और चेतना निकल दे तो आत्मा नाम की कोई चीज नहीं बचती , मतलब ज्ञान और चेतना आत्मा के स्वरूप है , कोई गुण नहीं है आत्मा के धर्म नहीं है क्योंकि गुण और गुणी भाव आत्मा में कही भी नहीं लिखा है।
कर्म करके वह जीव बंधन को प्राप्त होता है , और आत्मा विद्या करके वह मोक्ष को प्राप्त होता है । इसलिए विवेक की आत्मज्ञानी कर्मों को नहीं करते हैं किंतु आत्म निष्ठ में ही मगन रहते हैं।।
हजारों मनुष्य में से किसी एक भाग्यशाली पुरुष के चित में वैराग्य उत्पन्न होता है । उसके जीवन जीने की और भोगने की इच्छा भी निवृत हो जाती है । क्योंकि संसार के पदार्थ में ग्लानि और दोष दृष्टि का नाम ही वैराग्य है । जितने संसार की उत्पत्ति और नाश वाले पर्दाथ थे सब में दोष लगे हैं । यही सब जीवों के बंधन के कारण है इस बात से बिना इसमें वैराग्य प्राप्त हुए कदापि मोक्ष को प्राप्त नहीं होता है ।
पुरुष के बंधन का हेतु स्त्री को बेड़ी रूप करके कहा है । एवं लोहे की बेदी करके बाधा हुआ पुरुष छूट जाता है परंतु स्त्री पाश करके बंधा हुआ पुरुष कदापि छूट नहीं सकता ।
जितने भी विषय हैं तो सब दुख के कारण। स्त्री पुत्र धन आदि विषय महान पाश है जिनका त्यागना अति कठिन है जो पुरुष उन पाशो से रहित है वही मुक्ति का अधिकारी है , दूसरा षष्ठशास्त्रों को जानने वाला पुरुष भी मोक्ष का अधिकारी नहीं है। संपूर्ण विषय वस्तुओं से रहित संसार में लाखों में से एक ही वैराग्यवन जीव मुक्त कहा जाता है
नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा ।
दृष्ट्रा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ९-५॥
इस श्लोक में अष्टावक्र आध्यात्मिक संसार के एक और भ्रम को उजागर करते हैं । वह कहते हैं कि महर्षियों , योगियों और साधु के मध्य भी अनेक है ।कोई भक्ति को सर्वोच्च बताता है , कोई ज्ञान को , कोई योग को , कोई कर्म को , यदि मनुष्य केवल मतों के पीछे भागता रहेगा तो वह जीवन भर उलझा रहेगा । एक गुरु कुछ कहेगा दूसरा कुछ और रहेगा इसलिए अष्टावक्र संकेत देते हैं कि सत्य किसी मत में कैद नहीं है । जब साधक यह देख लेता है कि विचारों की दुनिया में पूर्ण सहमति भी कभी नहीं होगी तब तक भारी बहसों से मुक्त होकर अपने भीतर उतरना प्रारम्भ करता है । वहीं से वास्तविक शांति जन्म लेते हैं ।
ज्ञानी की सर्वत्र इच्छा के उपसम में क्या कारण है ?
जितना की दृष्टि का विषय प्रपंच है वह सब अनित्य हैं अर्थात चेतन के अध्यसत है।
प्रपंच क्या है? पांच (इंद्रिय विषय)
रूप -आँख
शब्द – कान
रस – जीभ
गंध – नाक
स्पर्श – त्वचा
जो कुछ भी इन पांच इंद्रियों में फैल गया है वही प्रपंच ? इसीलिए जो देखा जा सकता है सुना , चखा, सुंघा जा सकता है सब प्रपंच है !
प्रपंच कोई स्वतंत्र सत्य नहीं है , प्रपंच” दिखता है “पर परमार्थतह “है नहीं” !
जो दिखाई देता है , बदलता है और जिस पर” मैं “की भ्रांति बैठी है वही प्रपंच है ।
माया= देखने की शक्ति ( भ्रम पैदा करने वाली)
प्रपंच= वही भरम जो दिखाई देने लगा
माया कारण है प्रपंच परिणाम।
माया= वह शक्ति जो असत्य को सत्य जैसा दिखाई दे।
प्रपच क्या है ? – माया से उत्पन्न दृश्य संसार
शरीर, मन ,जगत सुख -दुख ,जन्म -मरण यह सब माया का खेल (विलास) है । किसी भी देहधरी से यह सुख दुख किसी काल में त्यागे नहीं जा सकते हैं इस वास्ते विवेकी पुरुष उन सुख दुख आदि से भी इच्छा को त्याग कर शरीर को प्रारब्ध असित छोड़ देता है । तर्कशास्त्र और कर्मकांड में निष्ठा को त्याग करके केवल आत्मज्ञान में ही निष्ठा करना चाहिए क्योंकि तर्क शास्त्र आदि सब बुद्धि के भरम करने वाले हैं।
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ९-६॥
जो उपेक्षा, समता और युक्ति के द्वारा चैतन्य के सच्चे स्वरूप को जानकर संसार में अपने को तारता है, क्या वह गुरु नहीं है । ॥६॥
अष्टावक्र गुरु की सच्ची परिभाषा देते गुरु वह नहीं जो केवल शास्त्रों का ज्ञान रखता है । या इसके बहुत सारे अनुयाई हैं । वास्तविक गुरु वह है जो क्षमता विवेक और वैराग्य के द्वारा चैतन्य के सच्चे स्वरूप को जाने और स्वयं को संसार सागर से पार कर ले । जिसने स्वयं सत्य का अनुभव किया है वही दूसरों को भी मार्ग दिखा सकता है । यहां अष्टावक्र बाहरी आडंबरों की बजाय आंतरिक अनुभूति को महत्व देते हैं।
अष्टाव कहते हैं कि जिसने विषय वासना का त्याग कर दिया जो मित्र और शत्रु में समभाव रखना है , जिसने विवेक और आत्मा अनुभव के द्वारा अपने सच्चिदानंद स्वरूप पहचान लिया और जिसने अपने आप को ही सब में व्याप्त अनुभव कर दिया । वही वास्तव में संसार सागर से पर हुआ है । यहां अष्टावक्र एक बहुत महत्वपूर्ण बात करें मोक्ष किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा दिए जाने वाला उपहार नहीं बल्कि स्वयं के जागरण का परिणाम है
सोचो यदि कोई गुरु तुम्हें भोजन के बारे में हज़ारे बातें बताएं , भोजन के स्वाद समझाएं , उसकी सुगंध का वर्णन करें , लेकिन खाना तुम्हें ही खाना पड़ेगा । गुरु तुम्हारे स्थान पर भोजन नहीं कर सकता । उसी प्रकार गुरु आत्मज्ञान की दिशा दिखा सकता है तुम्हारा भरम दूर कर सकता है । तुम्हारे प्रश्नों का समाधान कर सकता है लेकिन आत्मा का अनुभव तो तुम्हे स्वयं करना होगा । कोई दूसरा तुम्हारी आंखों से सूर्य नहीं देख सकता , कोई दूसरा तुम्हारी ओर से प्रेम का अनुभव नहीं कर सकता । उसी प्रकार कोई दूसरा तुम्हारी ओर से आत्मज्ञान भी प्राप्त नहीं कर सकता ।
यही कारण है कि भगवान राम ने भी महर्षि वशिष्ठ से प्रश्न कीये। उन्होंने आंख बंद करके विश्वास नहीं किया । उन्होंने अपने संदेह रखे , जिज्ञासा रखी और जब सभी संसय दूर हो गए तब ज्ञान प्रकट हुआ । इस प्रकार अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण से लगातार प्रश्न किए भागवत गीता का पूरा सवांद प्रश्न और उत्तर पर आधारित है यदि केवल गुरु के पास बैठने से मुक्ति मिल जाती तो फिर गीता के 18 अध्यायों की आवश्यकता ही नहीं होती श्री कृष्ण अर्जुन के लिए युद्ध नहीं ला सकते थे । धनुष अर्जुन को ही उठाना पड़ा । निर्णय अर्जुन को ही लेना पड़ा , जागरण अर्जुन को ही करना पड़ा
अष्टावक्र यहां एक और सूक्ष्म बात बताते हैं जब तक साधक अज्ञान में है तब तक गुरु और शिष्य का संबंध आवश्यक है । लेकिन जब आत्मज्ञान हो जाता है तब गुरु और शिष्य का भेद भी मिट जाता है । क्योंकि आत्मा एक ही है जैसे समुद्र में मिलने के बाद दो नदियां की अलग पहचान नहीं रहती वह सही आत्मज्ञान के बाद ” में शिष्य हूं ” और “वह गुरु है ” का भेद समाप्त हो जाता है तब केवल एक चैतन्य शेष रहता है ।
पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान यथार्थतः ।
तत्क्षणाद्वन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि ॥ ७ ॥
अष्टावक्र कहते हैं कि जब तुम पंचमहाभूतों से बने इस शरीर को और संसार के सभी विकारों को केवल भौतिक तत्वों का खेल समझ कर देखोगे , उसी क्षण बंधन से मुक्त हो जाओगे । क्रोध , भय ,मोह आकर्षन, शरीर की सुंदरता या कुरूपतता यह सब पंचमहाभूतों के स्तर पर होने वाली घटनाएं हैं लेकिन तुम इन सब के साक्षी हो। जिस क्षण साधक यह अनुभव कर लेता है कि वह मन शरीर और भावना ही नहीं बल्कि उनका देखने वाला चैतन्य है , इस क्षण मुक्ति का द्वार खुल जाता है ।
अंत में अष्टावक्र इस अध्याय का सार एक ही वाक्य में देते हैं “वासना ही संसार है” । संसार बाहर नहीं है। यदि जंगल में बैठा व्यक्ति भी इच्छाओं से भरा हुआ है तो वह संसार में है और यदि कोई व्यक्ति बाजार के बीच में रहकर भी इच्छा रहित है तो वह मुक्त है। बंधन वस्तुओं में नहीं उनके प्रति मन की लालसा में , धन समस्या नहीं है धन के तृष्णा समस्याएं , संबद समस्या नहीं है उनसे मिलने वाली खुशी पर निर्भरता समस्या है , समस्या शरीर नहीं है शरीर के साथ अपनी पहचान छोड़ लेना समस्या है , इसलिए अष्टावक्र कहते हैं कि संसार का त्याग करने की आवश्यकता नहीं केवल वासनाओं का त्याग करो वासना का त्याग होते ही संसार अपने आप समाप्त हो जाता है तब व्यक्ति जहां भी रहता है घर में ,जंगल में, बाजार में या आश्रम में अपने स्वरूप में स्थित रहता है ।
“द्वंद से लड़ो मत उन्हें समझो । संसार से भागो मत उसकी असाररता को देखो मतों से उलझो मत अपने भीतर उतर जाओ और सबसे बढ़कर वस्तुओं का नहीं बल्कि वासनाओं का त्याग करो । क्योंकि अष्टावक्र के अनुसार वासना ही संसार है , और वासना का अंत ही मुक्त है। “
