यह अध्याय केवल शास्त्र का ज्ञान नहीं है, बल्कि उस आत्मा की पुकार है जिसने स्वयं को पहचान लिया। पहले अध्याय में गुरु Ashtavakra ने राजा Janaka को आत्मज्ञान का उपदेश दिया था, और अब दूसरे अध्याय में जनक उस अनुभूति को व्यक्त कर रहे हैं जो आत्मा के जागने पर भीतर उत्पन्न होती है। यह अध्याय किसी दर्शनशास्त्र की बहस नहीं, बल्कि उस आनंद का वर्णन है जो तब प्रकट होता है जब मनुष्य पहली बार जानता है कि वह शरीर, मन, नाम, पद और संसार नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य है। जनक की प्रत्येक वाणी में आश्चर्य है, क्योंकि जिस सत्य को खोजने में लोग जन्मों लगा देते हैं, वह सत्य सदैव उनके भीतर ही था।
Ashtavakra Gita
यह अध्याय केवल शास्त्र नहीं है।
यह उस व्यक्ति की आवाज़ है जिसने स्वयं को जान लिया।
पहले अध्याय में गुरु Ashtavakra ने ज्ञान दिया था।
अब दूसरे अध्याय में राजा Janaka बोल रहे हैं।
लेकिन यह साधारण बोलना नहीं है।
यह उस व्यक्ति की अवस्था है जिसने पहली बार जाना कि —
“मैं शरीर नहीं हूँ… मैं शुद्ध चेतना हूँ।”
यह अध्याय ऐसा है जैसे कोई व्यक्ति वर्षों तक अंधेरे कमरे में बंद रहा हो और अचानक सूर्य को देख ले।
उसकी हर बात में विस्मय है… आश्चर्य है… आनंद है… स्वतंत्रता है।
जनक उवाच ॥
अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः ।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः ॥ २-१॥
जनक ने कहा – मैं निरञ्जन हूँ, शान्त हूँ, बोध हूँ, प्रकृति के परे हूँ, आश्चर्य है । किन्तु मैं इतने काल तक मोह के द्वारा ठगा गया हूँ ॥१॥
यह श्लोक पूरे अध्याय का हृदय है। जनक कहते हैं — “आश्चर्य है! मैं तो सदैव से शुद्ध, शांत और चेतन स्वरूप था, लेकिन मोह ने मुझे इतने समय तक धोखे में रखा।” मनुष्य का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि वह स्वयं को शरीर मान बैठता है। शरीर बूढ़ा होता है, मन बदलता है, विचार बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं; और मनुष्य उन्हीं परिवर्तनों को अपना स्वरूप समझकर दुखी होता रहता है। लेकिन आत्मज्ञान के क्षण में जनक को अनुभव होता है कि जो देख रहा है, जो हर अवस्था में उपस्थित है, वह कभी नहीं बदलता। वही आत्मा है। जैसे बादल सूर्य को छुपा सकते हैं, मिटा नहीं सकते, वैसे ही अज्ञान आत्मा को केवल ढँकता है। आत्मा सदैव प्रकाशित रहती है। यही अनुभूति जनक को भीतर से विस्मित कर देती है।
यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत् ।
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किञ्चन ॥ २-२॥
जैसे इस देह को मैं अकेला ही प्रकाशित करता हूँ, वैसे ही संसार को भी प्रकाशित करता हूँ। इसलिए तो मेरा सम्पूर्ण संसार है अथवा कुछ भी नहीं । ॥२॥
जनक कहते हैं कि जैसे यह शरीर मेरी चेतना से प्रकाशित होता है, वैसे ही पूरा संसार भी मेरी चेतना के कारण अनुभव होता है। यहाँ “प्रकाश” का अर्थ सूर्य या दीपक का प्रकाश नहीं, बल्कि चेतना का प्रकाश है। यदि चेतना न हो तो संसार का अनुभव कौन करेगा? गहरी नींद में संसार कहाँ चला जाता है? वस्तुएँ रहती हैं, लेकिन अनुभव समाप्त हो जाता है क्योंकि मन शांत हो जाता है। इसका अर्थ यह है कि संसार का अनुभव चेतना पर निर्भर है। जैसे चलचित्र स्क्रीन पर चलते हैं लेकिन स्क्रीन उनसे प्रभावित नहीं होती, वैसे ही जीवन की घटनाएँ चेतना में आती-जाती रहती हैं। आत्मा केवल साक्षी है। वह न सुख में बदलती है, न दुख में। जनक को अब अनुभव हो चुका है कि संसार उनके भीतर प्रकट हो रहा है, वे संसार के भीतर सीमित नहीं हैं।
जड़ देह और चेतन आत्मा का अधयासिक संबंध है सत्य और मिथ्या का वास्तविक संबंध न होने से इन दोनों का पर पारमार्थिक संबंध नहीं है आत्मा की सता करके देह सत्यवती भान होता है वास्तव में देह मिथ्या है इसी तरह आत्मा की सता करके ही सारा जगत सत्यव्रत प्रतीत होता है
अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् ।
आद्यत्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥
इनमें पहले तीन — अस्ति (सत्ता) , भाति ( प्रकाश) , प्रियं (आनंद ) — ब्रह्म का स्वरूप हैं।
और अंतिम दो — नाम (आकार) और रूप (पहचान) — जगत का स्वरूप जो (अस्थायी)हैं।
अर्थात् संसार में जो भी नाम और रूप दिखाई देते हैं वे बदलते रहते हैं, पर उनके भीतर जो “अस्तित्व, चेतना और आनंद” है वही परमात्मा का वास्तविक स्वरूप है।
Ex:- सोना किसी भी रूप में हो सकता है अंगूठी , हार , चूड़ी हर रूप का नाम एक है अंगूठी हार नेकलेस , चैन , ब्रेसलेट etc,,, लेकिन सब नाम और रूप को हटा दो तो असलीत में
सोना अस्ति (सता) है ।
सोने की चमक _ भाती ( प्रकाश) चेतना
सोना सबको प्रिय है – प्रियम ( आनंद)
अंगूठी _ रूप ( बचपन , जवानी , बुढ़ापा)
हार नेकलेस चैन __ नाम
जैसे नाम और बदलते रहते हैं लेकिन सोना वही रहता है वैसे ही जगत के नाम और रूप बदलते रहते हैं परंतु आत्मा ब्रह्म सच्चिदानंद हमेशा एक जैसा है असली पहचान हमारी चेतना अस्तित्व और आनंद में स्वरूप है
स शरीरमहो विश्व परित्यज्य मयाधुना
कुतश्चित् कौशलाद् एव परमात्मा विलोक्यते ॥ २-३॥
अरे! आश्चर्य है कि मैं शरीर सहित इस सारे विश्व का मौह त्याग दिया और केवल ज्ञान के कौशल से मैं परमात्मा का प्रतीक अनुभव कर लिया है
आत्मज्ञान की अतिरिक्त और कोई भी आत्मा के अवलोकन का उपाय नहीं है
परित्यजय – त्यागना नहीं बल्कि मोह और आसक्ति छोड़ना है राजा जनक कहते हैं कि उन्हें शरीर या संसार को फिजिकल छोड़ने को जरूरत नहीं पड़ी बस उन्होंने देह भावना अहंकार और आसक्ति छोड़ दे और भीतर ही परमात्मा का अनुभव हुआ आत्म साक्षात्कार के लिए जंगल भागने की जरूरत नहीं बल्कि दृष्टिकोण और आसक्ति का त्याग जरूरी है
यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुबुदाः ।
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥ २-४ ॥
“जैसे लहर पानी से अलग नहीं “
जनक कहते हैं कि जैसे लहर, फेन और बुलबुले जल से अलग नहीं होते, वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत आत्मा से अलग नहीं है। संसार में भिन्नता दिखाई देती है — कोई राजा है, कोई गरीब; कोई ज्ञानी है, कोई अज्ञानी; कोई पशु है, कोई पक्षी — लेकिन इन सभी के भीतर जो चेतना है, वह एक ही है। यह भिन्नता केवल रूपों की है, सार एक ही है। जैसे सोने से हार, मुकुट और अंगूठी बनते हैं, पर सबका मूल सोना ही है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि एक ही चेतना का विस्तार है। अज्ञान व्यक्ति केवल बाहरी रूप देखता है, ज्ञानी उसके पीछे छिपी एकता को देखता है। यही अद्वैत का अनुभव है।
आत्मज्ञानाज्जगद् भाति आत्मज्ञानान्न भासते ।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद् भासते न हि ॥ २-७॥
“अज्ञान से संसार वास्तविक लगता है“
यहाँ जनक संसार के भ्रम को समझाते हैं। वे कहते हैं कि जैसे अंधेरे में रस्सी को साँप समझ लिया जाता है, वैसे ही आत्मा के अज्ञान से संसार वास्तविक प्रतीत होता है। जब तक सत्य का ज्ञान नहीं होता, तब तक मनुष्य भय, मोह और दुख में जीता है। लेकिन जैसे ही ज्ञान का प्रकाश आता है, भ्रम समाप्त हो जाता है। साँप कभी था ही नहीं; केवल अज्ञान था। उसी प्रकार संसार का भय भी अज्ञान से उत्पन्न होता है। मनुष्य धन, शरीर, संबंध और भविष्य को वास्तविक मानकर भयभीत रहता है, जबकि ये सब परिवर्तनशील हैं। आत्मज्ञान का अर्थ संसार को नष्ट करना नहीं, बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप को जानना है।
प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः ।
यदा प्रकाशते विश्वं तदाहं भास एव हि ॥ २-८॥
प्रकाश मेरा निज रूप है मैं उससे अलग नहीं हूं जब संसार प्रकाशित है, तब वह मेरे प्रकाश से ही प्रकाशित है
राजा जनक जी आश्चर्य में पूछते हैं कि अगर आत्मा तो सदा मुक्त है शुद्ध और अजर अमर हैं तो फिर यह बंधन दुख मोह जन्म मृत्यु का चक्र किसका है ?
और जब कभी हम कहते हैं की मुक्ति तू किसकी मुक्ति हो रही है ?
मतलब जैसे सूर्य की रोशनी से दुनिया दिखती है वैसे ही आत्मा चैतन्य के बिना कुछ भी दिखाई या जाना नहीं जा सकता है दुनिया का प्रकाश ज्ञान अनुभव सब आत्मा से ही प्रकाशित है ।
हे स्वामी जी ! मुझे बताइए कि मैं मुक्ति कैसे पा सकता हूं ? ज्ञान कैसे मिलेगा और संसार से बंधन से कैसे छूटेगा ?
अष्टावक्र जी ने पहला अध्याय में कहा था कि यदि मुक्ति चाहते हैं तो विषय का त्याग करो और आत्मज्ञान से आत्मा स्वयं को जानो
इस श्लोक आत्मज्ञान की जिज्ञासा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है
1 Q. जनक जी सोचते हैं कि यदि मुझे आत्मा का ज्ञान नहीं है अज्ञान है तो आत्मा का प्रकाश तो मेरे लिए अप्रकट है तो फिर मैं मैं जगत को कैसे देख पा रहा हूं अगर प्रकाश ही नहीं दिख रहा तो जगत का अनुभव कैसे हो रहा है ?
उतर मेरा जो प्रकाश अर्थात नित्य ज्ञान वह मेरा स्वाभाविक स्वरूप है मैं उसे प्रकाश से भिन्न नहीं हूं इसलिए जब मुझे विश्व प्रतीत होता है तब आत्मा के इस प्रकार से प्रतीत होता है जैसे सूरज बादलों से ढक जाए तो उसकी पूरी रोशनी हमें नहीं मिलती पर फिर भी इतना प्रकाश तो रहता ही है जिससे हम चीजों को देख सकते हैं
2Q. जनक जी पूछते हैं कि यदि आत्मा स्वयं ज्ञान रूप प्रकाश है तो फिर अज्ञानता रही कैसे सकता है ? ज्ञान और अज्ञान तो एक दूसरे के विरोधी जैसे रोशनी और अंधेरा साथ नहीं रह सकते
उतर दो प्रकार का चेतन है 1 सामान्य चेतन
2 विशेष चेतन
सामान्य चेतन यह आत्मा का मूलभूत प्रकाश है यह अज्ञान का विरोधी नहीं है किंतु साधक है अर्थात अज्ञान को सिद्ध करता है जैसे अग्नि दो प्रकार की हैं एक सामान्य अग्नि दूसरी विशेष अग्नि है सामान्य अग्नि तो सब काष्ठों में व्यापक हैं परंतु काष्ठों के स्वरूप को जलती नहीं है किंतु बनती है
यह चेतना अज्ञान को नहीं मिटती बल्कि जगत को प्रकट करती हैं
जितने जगत के पदार्थ हैं वह सब भूतों के पांच कारण से बनी है जैसे जो लकड़ी पांच तत्वों से बनी है उसको सामान्य तेज अर्थात अग्नि जो उसके भीतर हैं जलते नहीं है पर जब दो लड़कियों के परस्पर रगड़ से जो विशेष अग्नि रूप तेज उसमें से उत्पन्न होता है वह तुरंत उसे लकड़ी को जला देता है क्योंकि वह उसका विरोधी है
वैसे सामान्य चेतन जो सर्वत्र व्यापक हैं वह उस अज्ञान का विरोधी अर्थात बाधक नहीं है किंतु अपनी सट्टा करके उसका साधक है और
वही उसे अज्ञान का बाधक अर्थात नाशक हैं यदि स्वरूप चेतन अज्ञान का विरोधी हुए जब जड़ की सीधी भी ना होगी यदि आत्मा के प्रकाश का भी अभाव मान जावे जब जगत द्वंद प्रसंग हो जाएगा इस बात से आत्मा के स्वरूप प्रकाश करके ही जगत भी प्रकाशमान हो रहा है स्वतः जगत मिथ्या है
सामान्य चेतन के कारण ही हम जगत को देख सुन जान पाते हैं अज्ञान भी सामान्य चेतन के रहते बना रहता है जब विशेष चेतन ज्ञान की ज्वाला प्रकट होता है तब अज्ञान नष्ट हो जाता है आत्मा के प्रकाश का पूर्ण अभाव मानना असंभव है वरना यह सारा जगत अंधकार में हो जाएगा
आज्ञा तभी मिटेगा जब हम आत्मा को प्रत्यक्ष अनुभव करेंगे यही विशेष चेतन है
सामान्य चेतन = जीवन को चलाने वाला प्रकाश
विशेष चेतन = अज्ञान को मिटाने वाला ज्ञान का प्रकाश
अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते ।
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जी वारि सूर्यकरे यथा ॥ २-९ ॥
आश्चर्य है कि कल्पित संसार अज्ञान से मुझे ऐसा भासता है जैसे सीपी में चाँदी, रस्सी में साँप, सूर्य की किरणों में जल भासता है। ॥९॥
जनक जी यहां कहते हैं की वास्तविक में यह जगत आत्म स्वरूप से अलग कुछ नहीं है परंतु अज्ञान अविद्या के कारण हम उसे वास्तविक स्थाई और अलग अस्तित्व वाला समझते हैं यह भ्रम वैसे ही है जैसे
1 शुक्ति – रजत (सीप में चांदी का भ्रम)
2 रज्जु में सर्प
3। सूर्य किरण में जल
इसी तरह जीवन में हम दुनिया की घटनाओं सुख-दुख सफलता असफलता को वास्तविक मानकर भाई चिंता और लालसा में उलझे रहते हैं परंतु जब आत्मज्ञान होता है तब समझ आता है कि यह सब अस्थाई और मिथ्या है आत्मा की एकमात्र सत्य है
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति ।
मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा ॥ २-१०॥
मुझसे उत्पन्न यह संसार मुझमें ही लय को प्राप्त होगा जैसे मिट्टी में घड़ा, जल में लहर और सोने में आभूषण लय होते हैं। ॥१०॥
जैसे गड़ा मिट्टी से बनता है और मिट्टी में ही लय होता है जैसे लहर जल से उड़ती हैं और जल में ही मिट जाती है वैसे ही यह सारा जगत मुझसे ही प्रकट होता है और मुझसे ही लीन हो जाता है
गहरा सत्य समझता है कि जगत और ईश्वर दृश्य और दृष्टिता दोनों अलग नहीं है जैसे मिट्टी और घड़ा का संबंध होता है वैसे ही ईश्वर और संसार का है
मिट्टी अलग नहीं होती वैसे सिर्फ उसका नाम बदल जाता है मिट्टी से घड़ा इस तरह हम भी यह सब शरीर यह जगत सब एक ही ब्रह्म तत्व से निकला है और उसी में लौटना है
जब इंसान यह समझ आता है कि मैं और जगत अलग नहीं तब उसके अंदर से हर प्रकार का भय लोभ ओर अहंकार समाप्त हो जाता है और उसे सब में अपना अस्तित्व दिखाई देता है फिर ना किसी से द्वेष होता है और ना मोह बस एक पूर्ण शांति।
“यतो वा इमानि भूतानी जयन्ते ” _ जिस ब्रह्म से यह सब प्राणी उत्पन्न होते हैं जिसे जीवित रहते हैं उसे जिसमें अंत में लय हो जाते हैं वह ब्रह्म ही तेरी आत्मा है
अहो अहं नमो मह्यं विनाशो यस्य नास्ति मे
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशोऽपि तिष्ठतः ॥ २-११॥
मैं आश्चर्यमय हूँ। मुझको नमस्कार है। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त जगत के नाश होने पर भी मेरा नाश नहीं है। ॥११॥
ब्रह्म की पारमार्थिक सता है और जगत की प्रतिभासिक सत्ता है।
Q , यदि हम मान ले की ( ब्रह्म ) आत्मा की जगत का उपादान कारण है यानी जिसे जगत बनाएं तो क्या ब्रह्मा भी विकारी परिवर्तनशील और नासि हो जाएगा ?
उतर नहीं ब्रह्म विकारी या नाशी तभी होता जब जगत को हम ब्रह्मा का परिणाम वास्तविक रूप से बदला हुआ स्वरूप माने लेकिन वेदांत कहता है कि जगत ब्रह्मा का परिणाम नहीं बल्कि विवर्त हैं
विवर्त= जब एक ही वस्तु अपनी मूल अवस्था बदले बिना दूसरे रूप में दिखती हैं तो उसे विवर्त कहते हैं
इसी तरह ब्रह्मा से जगत बनता नहीं है बल्कि अज्ञानवश जगत के रूप में प्रतीत होता है इसलिए ब्रह्मा विकारी नहीं और नाशी भी नहीं है
मैं ब्रह्मा स्वरूप हूं
चाहे ब्रह्म सृष्टिकर्ता से लेकर एक दिन के तब सब कुछ नष्ट हो जाए पर मेरा अस्तित्व कभी नहीं मिटता मैं वही साक्षी आत्मा हूं जो सब परिवर्तन के बीच भी अपरिवर्तित रहता है
सोने से कान के , नेकलेस , चैन, अंगूठी बनते हैं रूप बदलते हैं पर सोना ही रहता है।
अहो अहं नमो मह्यमेकोऽहं देहवानपि ।
क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः ॥ २-१२॥
देह मन बुद्धि इंद्रियों सब परिवर्तनशील है
पर आत्म अचल निराकार ओर सर्वव्यापक है।
जनक जी की यह स्थिति जीवन मुक्त अवस्था कहलाती हैं अब उन्हें किसी सुख-दुख स्पर्श नहीं होता क्योंकि वह जानते हैं कि सुख-दुख शरीर के हैं मैं तो साक्षी मात्र हूं
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन ।
अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ २-१४ ॥
इस श्लोक में राजा जनक आत्मज्ञान की परम अवस्था को प्रकट कर रहे हैं। जब आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेती है, तब उसके भीतर अद्भुत विस्मय उत्पन्न होता है। इसलिए वे कहते हैं — “अहो! मैं कितना आश्चर्यमय हूँ, मैं स्वयं को नमस्कार करता हूँ।” यहाँ अहंकार का “मैं” नहीं है, बल्कि शुद्ध आत्मा का बोध है।
जनक कहते हैं — “मेरा कुछ भी नहीं है” क्योंकि आत्मज्ञानी जानता है कि यह शरीर, धन, घर, परिवार, पद, प्रतिष्ठा — सब नश्वर हैं। इनमें से कुछ भी वास्तव में “मेरा” नहीं है। सब प्रकृति का खेल है, जो समय के साथ बदल जाता है। जिस क्षण मनुष्य “मेरा–तेरा” के भ्रम से ऊपर उठ जाता है, उसी क्षण भीतर स्वतंत्रता का जन्म होता है।
फिर वे कहते हैं — “अथवा मेरा ही सब कुछ है जो मन और वाणी का विषय है।” इसका अर्थ यह है कि जब आत्मा अपने ब्रह्मस्वरूप को पहचान लेती है, तब वह अनुभव करती है कि सम्पूर्ण जगत उसी चेतना का विस्तार है। जैसे समुद्र से उठी हर लहर समुद्र ही है, वैसे ही सम्पूर्ण सृष्टि उसी एक आत्मा की अभिव्यक्ति है। तब अलगाव समाप्त हो जाता है। वहाँ “मैं” और “दूसरा” नहीं बचता।
यह श्लोक अद्वैत वेदान्त का गहरा रहस्य बताता है —
पहले अवस्था में साधक कहता है: “कुछ भी मेरा नहीं।”
और अंतिम अवस्था में अनुभव होता है: “सब कुछ मैं ही हूँ।”
यही आत्मज्ञान की चरम स्थिति है, जहाँ मनुष्य संसार में रहते हुए भी उससे बँधता नहीं।
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्याऽस्ति भेषजम्
दृश्यमेतन मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोमलः ॥ २-१६॥
“दुःख का मूल द्वैत है “
जनक कहते हैं कि समस्त दुख का कारण द्वैत है — “मैं” और “दूसरा” का भाव। जब तक मनुष्य स्वयं को संसार से अलग मानता है, तब तक तुलना, भय, ईर्ष्या, क्रोध और संघर्ष बने रहते हैं। अहंकार हमेशा स्वयं को सुरक्षित रखना चाहता है, इसलिए वह दूसरों से लड़ता है। लेकिन जिस क्षण मनुष्य सबमें उसी एक चेतना को देखता है, उसी क्षण द्वैत समाप्त होने लगता है। तब प्रेम स्वाभाविक हो जाता है। तब करुणा पैदा होती है। तब कोई “दूसरा” नहीं बचता। यही अद्वैत का अनुभव है — जहाँ सब एक ही आत्मा के रूप में दिखाई देते हैं।
न मे बन्धोऽस्ति मोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तो निराश्रया ।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम् ॥ २-१८ ॥
यह अध्याय का सबसे गहरा रहस्य है। जनक कहते हैं कि आत्मा न कभी बंधी थी, न उसे मुक्त होने की आवश्यकता है। बंधन केवल मन की कल्पना है। जैसे आकाश को कमरे में बंद नहीं किया जा सकता, वैसे ही आत्मा कभी सीमित नहीं होती। शरीर और मन बदलते हैं, लेकिन आत्मा सदैव स्वतंत्र रहती है। मनुष्य केवल स्वयं को सीमित मानकर दुखी होता है। यही भ्रम बंधन कहलाता है। जब यह भ्रम टूटता है, तब ज्ञानी समझता है कि मुक्ति कोई भविष्य की घटना नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक अवस्था है।
नाह देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित् ।
अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा ॥ २-२२ ॥
” मैं शरीर नहीं हूं”
जनक कहते हैं — “मैं शरीर नहीं हूँ, न शरीर मेरा है; मैं केवल शुद्ध चैतन्य हूँ।” यही आत्मज्ञान का सार है। मनुष्य का पूरा जीवन शरीर की रक्षा, सजावट और इच्छाओं में निकल जाता है क्योंकि वह स्वयं को शरीर मानता है। लेकिन शरीर हर क्षण बदल रहा है। बचपन का शरीर अलग था, युवावस्था का अलग, वृद्धावस्था का अलग। फिर भी भीतर “मैं हूँ” का अनुभव वही रहता है। इसका अर्थ यह है कि वास्तविक “मैं” शरीर नहीं, बल्कि वह चेतना है जो शरीर के सभी परिवर्तनों को देख रही है। यही पहचान आत्मज्ञान है।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति ।
अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः ॥ २-२४॥
“— मन की हवा से संसार की लहरें उठती हैं“
जनक स्वयं को अनंत महासागर कहते हैं और मन को उस पर चलने वाली हवा। जब मन अशांत होता है, तब संसार भी अशांत प्रतीत होता है। जब मन शांत होता है, तब वही संसार सुंदर दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि संसार से अधिक महत्वपूर्ण मन की अवस्था है। क्रोध में पूरी दुनिया शत्रु लगती है, प्रेम में वही दुनिया सुंदर हो जाती है। संसार बदलने से पहले दृष्टि बदलनी पड़ती है। ज्ञानी व्यक्ति संसार को बदलने की कोशिश नहीं करता; वह अपने चित्त को समझ लेता है। तब जीवन एक खेल बन जाता है। लहरें उठती हैं, मिटती हैं, लेकिन महासागर सदैव शांत रहता है। वैसे ही आत्मा जन्म और मृत्यु से परे है।
यह अध्याय आत्मा के जागरण का उत्सव है। यहाँ जनक यह अनुभव करते हैं कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप शरीर या मन नहीं, बल्कि शुद्ध चैतन्य है। संसार एक स्वप्न की भाँति है, जो अज्ञान से वास्तविक प्रतीत होता है। दुःख का कारण द्वैत है, और मुक्ति किसी साधना से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचानने का नाम है। जब यह ज्ञान प्रकट होता है, तब भीतर एक गहरी शांति जन्म लेती है। फिर संसार चलता रहता है, लेकिन ज्ञानी उसके बीच भी भीतर से पूर्णतः मुक्त रहता है।
