यह अध्याय केवल श्लोकों का संग्रह नहीं है, बल्कि मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का प्रत्यक्ष बोध कराने वाला दिव्य संवाद है। Ashtavakra यहाँ आत्मा का ऐसा ज्ञान देते हैं जो मनुष्य को जन्म-मृत्यु, भय, मोह, वासना और दुःख से परे ले जाता है। यह अध्याय बताता है कि मुक्ति किसी जंगल, गुफा या मृत्यु के बाद मिलने वाली वस्तु नहीं, बल्कि यह उसी क्षण प्राप्त हो सकती है जब मनुष्य स्वयं को शरीर और मन से अलग जान लेता है।
जनक उवाच
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति ।
वैराग्यं च कथं प्राप्तमेतद् ब्रूहि मम प्रभो ॥ १-१॥
जनक ने कहा – ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ? मुक्ति कैसे होती है ? और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है ? प्रभु ! यह मुझसे कहिये ॥१॥
अष्टावक्र उवाच ॥
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज ॥ १-२॥
“यदि मुक्ति चाहते हो तो विषयों को विष के समान त्याग दो।”
यदि मुक्ति चाहते हो तो विषयों को विष के समान त्याग दो।
अष्टावक्र का यह पहला उपदेश ही सम्पूर्ण अध्याय की नींव है। यहाँ “विषय” केवल भोग-विलास नहीं हैं, बल्कि वे सभी वस्तुएँ हैं जिनसे मनुष्य की चेतना बँध जाती है — जैसे वासना, लालच, अहंकार, क्रोध, मान-सम्मान की इच्छा, तुलना, और इन्द्रियों का आकर्षण। संसार का प्रत्येक सुख प्रारम्भ में अमृत जैसा लगता है, परन्तु अंत में वही दुःख का कारण बनता है। मनुष्य जितना अधिक बाहर भागता है, उतना ही भीतर खाली होता जाता है। इसलिए अष्टावक्र कहते हैं कि यदि वास्तव में मुक्ति चाहिए तो इन विषयों को विष समझकर त्यागना होगा। इसके स्थान पर क्षमा, दया, सरलता, संतोष और सत्य को अपनाना होगा, क्योंकि यही आत्मा को शुद्ध करते हैं। क्षमा मन को हल्का करती है, दया हृदय को विशाल बनाती है, संतोष इच्छाओं की आग बुझाता है और सत्य मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप तक पहुँचाता है।
विषय के प्रति आसक्ति नहीं रखना ही वैराग्य है । इसमें जो अती आशकती हैं अर्थात पांचो विषय में से किसी एक के प्राप्त होने से चित्त की व्याकुलता होना और सदैव उसी में मन का लगा रहना आशक्ति है उसके त्याग का नाम ही विषयों का त्याग है।
एवं जो प्रारब्ध भोग के प्राप्त हो उसी में संतुष्ट होना लोलुप ना होना और उनके प्राप्ति के लिए असत्य भाषण आदि को ना करना किंतु प प्राप्ति काल में उसमें दोष दृष्टि और ग्लानि होनी और उसके त्याग की इच्छा होनी और उनके प्राप्ति के लिए किसी के आगे दिन ना होना इसका नाम वैराग्य है ।
यह जनक जी के एक प्रश्न का उत्तर दिया हुआ है संसार के पदार्थ में दोस्त दृष्टि और ग्लानि का नाम ही वैराग्य है और खोटे पुरुषों के संग से डर कर महात्माओं क संग करने वाला क्षमा कोमलता दया और सत्य भाषण आदि गुना को अमृत पान करने वाला का नाम वैराग्यवन है और वही ज्ञान का अधिकारी है
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायु र्न वा भवान् ।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये ॥ १-३॥
यदि तू शरीर को अपने से अलग जानकर चैतन्य में स्थित हो जाए, तो अभी इसी क्षण मुक्त हो जाएगा।
यहाँ अष्टावक्र कोई कठिन साधना नहीं बता रहे। वे कहते हैं कि मुक्ति भविष्य की घटना नहीं, वर्तमान की अनुभूति है। मनुष्य केवल एक भ्रम में जी रहा है कि “मैं शरीर हूँ।” यही भ्रम बंधन है। जैसे कोई अभिनेता मंच पर अपने पात्र को ही वास्तविक मान ले तो दुःखी हो जाएगा, वैसे ही आत्मा स्वयं को शरीर मानकर संसार में रोती है। यदि मनुष्य थोड़ी देर रुककर स्वयं को देखे, तो अनुभव होगा कि शरीर बदल रहा है, पर भीतर कोई साक्षी स्थिर है। वही वास्तविक “मैं” है। उसी में विश्राम करना ही आत्मज्ञान है।
अष्टावक्र जी ने राजा जनक जी से पूछा दूसरा प्रश्न :-
पुरुष आत्मज्ञान को कैसे प्राप्त होता है ?और ज्ञान का स्वरूप क्या है ?
ऋषि जी ने कहते हैं कि अनादि काल से देहाती को के साथ जो आत्मा का तादात्म्य अभ्यास हो रहा है उसे अध्याय से ही पुरुष देह को आत्मा मानता है और इसी से जन्म मरण रूपी संसार चक्र में पून पून भ्रमण करता रहता है उसे अध्यास का कारण अज्ञान है उसे अज्ञान की निवृत्ति आत्मज्ञान करके होती है
श्रुति कहता है कि _ “अयमात्मा ब्रह्म” जो यह प्रत्यक्ष तुम्हारा आत्मा है यही ब्रह्म है यही ईश्वर है अष्टाअष्टावक्र जी कहते हैं कि है जनक पृथ्वी अदिक पांच भूत और उनका कार्य स्थूल शरीर तथा इंद्रियों और उनके विषय सब शब्द आदिक इन सब से तु न्यारा है और सबका तू साक्षी है ऐसे निश्चित का नाम ही आत्मज्ञान है
अब मुक्ति के स्वरूप तथा उपाय को कहते हैं ?
यदि देहं पृथक् कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि ।
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि ॥ १-४॥
हे राजन ! जब तू दहे से आत्मा को पृथक विचार करके और अपने आत्मा में चित्त को स्थिर करके स्थिर हो जाएगा तब तू सुख और शांति को प्राप्त होगा जब तक चित् जड़ ग्रंथि का नाश नहीं हो जाता अर्थात परस्पर के अभ्यास का नाश नहीं होता है तब तक ही जीव बंधन में है जिस काल में अध्यास का नाश हो जाता है उसी काल में जीव मुक्त होता है।
यहां अष्टावक्र जी कहते हैं की मुक्ति कोई लंबी साधना कठिन तपस्या या भविष्य में मिलने वाली चीज नहीं है मुक्ति अभी इसी क्षण मिल सकती है अगर तुम आत्मा में स्थित हो जाओ और शरीर को अलग मान लो
पुरुष अपने को आत्मा को कर्ता और भोक्ता मानने लग जाता है और उसी से जन्म मरण रूपी बंधन को प्राप्त होता है जब आत्मज्ञान करके अपने को अकर्ता उपभोक्ता शुद्ध और असंग मानता है और कर्तव्यवादिक अंत:करण का धर्म मानता है , तब स्वयं साक्षी होकर अंतकरण का भी प्रकाशक होता है और तब ही अभ्यास का नाश होता है अध्यास के नाश का नाम ही मुक्ति हैं इसके अतिरिक्त मुकति कोई वस्तु नहीं है ।
यदि तू शरीर को अपने से अलग जानकर चैतन्य में स्थित हो जाए, तो अभी इसी क्षण मुक्त हो जाएगा।
यहाँ अष्टावक्र कोई कठिन साधना नहीं बता रहे। वे कहते हैं कि मुक्ति भविष्य की घटना नहीं, वर्तमान की अनुभूति है। मनुष्य केवल एक भ्रम में जी रहा है कि “मैं शरीर हूँ।” यही भ्रम बंधन है। जैसे कोई अभिनेता मंच पर अपने पात्र को ही वास्तविक मान ले तो दुःखी हो जाएगा, वैसे ही आत्मा स्वयं को शरीर मानकर संसार में रोती है। यदि मनुष्य थोड़ी देर रुककर स्वयं को देखे, तो अनुभव होगा कि शरीर बदल रहा है, पर भीतर कोई साक्षी स्थिर है। वही वास्तविक “मैं” है। उसी में विश्राम करना ही आत्मज्ञान है।
न त्वं विप्रादिको वर्णों नाश्रमी नाक्षगोचरः ।
असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ॥ १-५॥
“तू न किसी वर्ण का है, न किसी आश्रम का, तू असंग और निराकार है।”
मनुष्य ने अपने ऊपर असंख्य पहचानें लाद रखी हैं — जाति, धर्म, नाम, पद, धन, समाज, शरीर, सफलता, असफलता। अष्टावक्र इन सबको झूठा बताते हैं। आत्मा किसी सीमा में नहीं बँधती। वह न हिन्दू है, न मुसलमान, न अमीर, न गरीब, न पुरुष, न स्त्री। ये सब शरीर और समाज की पहचानें हैं। आत्मा तो केवल साक्षी है। जब तक मनुष्य स्वयं को इन पहचानों से जोड़कर देखता है, तब तक वह भय और अहंकार में जीता है। लेकिन जैसे ही वह समझता है कि “मैं निराकार चेतना हूँ,” उसी क्षण भीतर स्वतंत्रता का अनुभव होने लगता है।
अहं कर्तेत्य मानमहाकृष्णाहिदंशितः ।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव ॥ १-८ ॥
” अहम कर्त्ता ” मैं इस कर्म का करता हूं मैं इसके फल को भोगूँगा यह जो अहंकार रूपी काल सर्प है इसी करके दस हुआ उसे अहंकार रूपी सर्प के विश को उतारने के लिए ” नाहम कर्ता ” मैं कर्ता नहीं हूं जब ऐसे निश्चित रूप अमृत को तू पान करेगा तब तू सुखी होवेगा।।
अहम और मम भावना को त्याग करके और अंतकरण के धर्म जो सुख-दुख अदीक हैं उनमें जो तुझको अहम् भावना हो रहे हैं उसका त्याग करके आत्मा को अकर्ता , कूटस्थ, असंग , ज्ञान स्वरूप अद्वैत और व्यापक निश्चित कर
तू न कर्ता है, न भोक्ता; तू सदैव मुक्त है।
मनुष्य का सबसे बड़ा बंधन “मैं करता हूँ” यह अहंकार है। यही अहंकार सुख और दुःख का कारण बनता है। सफलता मिलती है तो अहंकार बढ़ता है, असफलता मिलती है तो दुःख होता है। अष्टावक्र कहते हैं कि आत्मा केवल साक्षी है, वह कुछ करती नहीं। प्रकृति अपना कार्य कर रही है — शरीर चलता है, मन सोचता है, इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं — पर आत्मा केवल देखती है। जैसे सूर्य केवल प्रकाश देता है, वह किसी कार्य में लिप्त नहीं होता, वैसे ही आत्मा सदा निष्क्रिय और शुद्ध है। यह समझ आने पर मनुष्य कर्म करते हुए भी भीतर से मुक्त रहने लगता है
“मैं कर्ता हूँ” यह अहंकार ही महान काले सर्प का दंश है।
अष्टावक्र अहंकार को विषैले सर्प के समान बताते हैं। संसार का प्रत्येक दुःख इसी से जन्म लेता है। मनुष्य सोचता है — “मैंने किया,” “मेरी उपलब्धि,” “मेरा सम्मान,” “मेरा अपमान।” यही “मैं” सबसे बड़ा बंधन है। जब तक यह अहंकार जीवित है, तब तक शांति असंभव है। इसलिए अष्टावक्र कहते हैं कि “मैं कर्ता नहीं हूँ” इस अमृत को पी लो। इसका अर्थ भागना नहीं, बल्कि भीतर से हल्का होना है। तब कर्म होते रहते हैं, पर मन उन कर्मों से बँधता नहीं।
राजा जनक जी पूछते हैं कि हे भगवान पतंजलि ऋषि के मत अनुसार चित्र वृत्ति निरोध ( मन के सभी वृत्तियों को रोक देना ही योग है और मुक्ति का कारण है तो यह माना सही है या नहीं ?
निःसङ्गो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठति ॥ १-१५॥
हे जनक ! तू असंग है , तू निष्क्रिय है तू स्वयं प्रकाशित है और तू निरंजन है तेरा असली स्वरूप पहले से ही मुक्त है लेकिन तेरे लिए बंधन यही है कि तू सोचता है की समाधि या चित्त वृत्ति निरोध ही मुक्ति का कारण है ।
पतंजलि योग कहता है कि ” योगचित्तवृत्ति निरोधः “योग है चित् की वृत्तियों को निरोध
लेकिन अष्टावक जी कहते हैं कि यह मानना ही बंधन है कि ” जब तक चित् वृत्तियाँ रुकेगी नहीं तब तक मुक्ति मिलेगी नहीं
क्योंकी
आत्मा तो पहले से ही मुक्ति है , शुद्ध है , निर्लिप्त है । उसे किसी साधना नियम समाधि अभ्यास से मुक्ति नहीं करना पड़ता है पतंजलि का मार्ग साधक के लिए है जिसे अभ्यास और अनुशासन धीरे-धीरे मन को शांत करके आत्मा को अनुभव करना
अष्टावक्र जी का मार्ग सीधा बोध ( direct realisation) अभी इसी क्षण मान लो कि “मै न मन हूं” , ना शरीर हूं मैं तो शुद्ध चैतन्य हूं और इस क्षण मुक्ति मिल सकती है
दोनो रास्ते अलग है = योग कहेगा – मन को साधो तभी मुक्ति
ज्ञानी अष्टावक्र जी कहते हैं मुक्ति तो अभी है बस जानो
आत्मा के स्वरूप के ज्ञान से भिन्न जितने मुक्ति के उपाय कह गए वह सब बंधन के ही कारण है किंतु सब बंधन रूपी हैं
मनुष्य जीवन में जो छ प्राकृतिक अवस्था आती है उन्हें षडूर्मि कहते हैं यह शरीर धारी जीव का स्वाभाविक धर्म है मनुष्य को षडूर्मि रहित होना चाहिए ।
1 भूख
ये दोनों प्राण के धर्म है
2प्यास
3 शोक
ये मन के धर्म है
4 मोह
5 जन्म
सूक्ष्म देह के धर्म है
6 मरण
“जायते अस्ति वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते विनश्यति“
अर्थात जो उत्पन्न होता है स्थित है बढ़ता है परिणाम को प्राप्त होता है क्षण क्षण में क्षीण होता है और नाश हो जाता है यह छठ भाव विकार स्थूल देह के धर्म है तू आत्मा के धर्म नहीं है क्योंकि तू स्थल है और सूक्ष्म देह से परे हैं
एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना ।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥ १-९॥
मैं शुद्ध बोध स्वरूप हूँ — इस निश्चय की अग्नि से अज्ञान को जला दो।
यह श्लोक आत्मज्ञान का प्रत्यक्ष घोष है। अष्टावक्र कहते हैं कि आत्मा कोई वस्तु नहीं जिसे बाहर खोजा जाए। आत्मा स्वयं शुद्ध चेतना है। अज्ञान केवल इतना है कि मनुष्य स्वयं को शरीर और मन मान बैठा है। जैसे अंधकार प्रकाश आते ही समाप्त हो जाता है, वैसे ही आत्मज्ञान होते ही अज्ञान समाप्त हो जाता है। इस ज्ञान से शोक समाप्त हो जाता है, क्योंकि तब मनुष्य समझ जाता है कि जो जन्मा है वही मरेगा, पर मैं जन्मा ही नहीं हूँ।
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥ १-११॥
“जो स्वयं को मुक्त मानता है, वह मुक्त है; जो स्वयं को बंधा मानता है, वह बंधा है।
यह श्लोक मन की शक्ति को दर्शाता है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा बनता जाता है। यदि वह लगातार स्वयं को कमजोर, दुःखी और बंधा हुआ मानेगा तो वही अनुभव करेगा। लेकिन यदि दृढ़ निश्चय से जाने कि “मैं शुद्ध चेतना हूँ,” तो उसका जीवन बदलने लगेगा। आत्मज्ञान बाहर से नहीं आता, वह भीतर जागता है।
“देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक ।
बोधोऽहं ज्ञानखड्गेन तन्निकृत्य सुखी भव ॥ १-१४ ॥
तू देहाभिमान के पाश से बहुत समय से बँधा हुआ है।
अष्टावक्र कहते हैं कि मनुष्य का सबसे पुराना बंधन देहाभिमान है। यही वासना, भय, लोभ और मोह का मूल कारण है। जब तक मनुष्य शरीर को ही “मैं” मानता रहेगा, तब तक वह संसार के सुख-दुःख में उलझा रहेगा। ज्ञान की तलवार से इस देहाभिमान को काटना ही आत्मज्ञान है।
Ashtavakra Gita का पहला अध्याय मनुष्य को भीतर झाँकना सिखाता है। यह कहता है —
तू शरीर नहीं है
तू मन नहीं है
तू विचार नहीं है
तू शुद्ध, शांत, मुक्त चेतना है
मुक्ति कहीं बाहर नहीं है।
जिस सत्य को मनुष्य संसार में खोज रहा है, वह उसके भीतर सदैव उपस्थित है।
जब मन शांत होता है, इच्छाएँ गिरती हैं, अहंकार मिटता है और साक्षी भाव जागता है — तभी आत्मा का प्रकाश प्रकट होता है।
