अध्याय 3 – आत्म बोध का स्वाद | taste of self realization

अष्टावक्र गीता का तीसरा अध्याय आत्मज्ञान के बाद मनुष्य के वास्तविक अवस्था का वर्णन करता है यह अध्याय केवल दर्शन ही बल्कि उसे व्यक्ति की मन: स्थिति को प्रकट करता है जिसने आत्मा का स्वाद चक लिया अष्टावक्र बार-बार अश्वचर्य व्यक्त करते हैं कि मनुष्य आत्मा की महिमा सुनने और समझने के बाद भी संसार की क्षणभंगुर वस्तुओं में क्यों भटकता रहता है

आत्मबोध का अर्थ केवल यह जान लेना नहीं कि मैं आत्मा हूं बल्कि उसे सत्य को अपने जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बना लेना है।

जो मनुष्य यह जान लेता है की असली स्वरूप सारी या मन नहीं बल्कि नित्य शुद्ध अविनाशी आत्मा है

उसके लिए यह संसार धन पद मान समान सब क्षण भंगुर हो जाते हैं उसे यह भलीभाती बातें समझ में आ जाता है कि यह सब वस्तुएं मिटाने वाली है जबकि आत्मा अमर है

आत्मज्ञानी व्यक्ति संसार में यह रहकर भी संसार में नहीं फसता वह कर्तव्य करता है परंतु आसक्ति नहीं रखता आत्मा के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होने से ही विषय भौतिक वस्तुओं में प्रेम और आसक्ति उत्पन्न होती हैं जैसे संघ को चांदी समझ लेने के भ्रम में भ्रम से उसमें लोभ उत्पन्न हो जाता है

जब इंसान आत्मा को पहचान लेता है तब उसका विषयों के प्रति राग द्वेष सब समाप्त हो जाता है क्योंकि अब उसे समझ आ जाता है कि,” मैं शरीर नहीं  मै आत्मा हूं ” ज्ञान आने पर भरम मिट जाता है लोभ मोह राग अपने आप समाप्त हो जाते हैं

“विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे ।

सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि ॥” (3-3)


इस श्लोक में अष्टावक्र आत्मज्ञान का सार प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि यह सम्पूर्ण विश्व उसी प्रकार आत्मा में प्रकट होता है जैसे समुद्र में तरंगें उठती हैं। तरंग समुद्र से अलग नहीं होती, उसी प्रकार संसार आत्मा से अलग नहीं है। जब साधक को यह अनुभव हो जाता है कि “मैं वही अनन्त चेतना हूँ जिसमें यह सम्पूर्ण जगत प्रकट हो रहा है”, तब उसके भीतर की सारी हीनता, भय और कमी की भावना समाप्त हो जाती है। संसार में अधिकांश लोग इसलिए भाग रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कुछ प्राप्त करने पर वे पूर्ण हो जाएंगे। आत्मज्ञानी जानता है कि वह पहले से ही पूर्ण है। इसलिए उसकी दौड़ समाप्त हो जाती है। यही आत्मबोध का पहला स्वाद है—पूर्णता का अनुभव।

श्रुत्वापि शुद्धचैतन्य आत्मानमतिसुन्दरम् ।

उपस्थे ऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति ॥ ३-४॥

आत्मा को शुद्ध चैतन्य व अति सुन्दर सुनकर भी कैसे कोई इन्द्रिय के विषय में अत्यन्त आसक्त होकर मलिनता को प्राप्त होता है। ॥४॥

सभी ज्ञानियों के विषय आसक्ति की निंदा कर रहे हैं गुरु के मुख से तथा वेदांत वाक्य से आत्मा के शुद्ध सुंदर चैतन्य स्वरूप का श्रवण करके और यहां तक की आत्म साक्षात्कार करके भी यदि कोई पुरुष समीप वृत्ति विषय वासनाओं में अत्यंत सशक्त होता है तो यह अत्यंत आश्रय की बात है कि वह फिर मुड़ता को प्राप्त होता है यह गहन विश्वमय है

किसी ने रजत चांदी जैसे दिखने वाले सूक्ति देखा पहले उसे लगा कि यह चांदी है लेकिन बाद में उसने जान लिया कि केवल सूक्ति है मैं भरम देखा था

तो अब क्या वह व्यक्ति फिर उसे चांदी को पाने के लिए दौड़ेगा ?

नहीं

क्योंकि अब उसे भ्रम का पता चल गया है जिसे जान लिया कि

*देह जगत रिश्ते सब मिथ्या होना

* एक ही आत्मा सर्वव्यापी है  उसमें फिर तेरा मेरा कि भावना नहीं होती यदि रहती है तो वह अद्भुत आश्चर्य है, क्योंकि ज्ञान के बाद भी अज्ञान वृत्ति कैसे टिक सकती है।

ज्ञान के बाद भी यदि काम वासना या विषय का आकर्षण बचा हो तो वह ज्ञान अभी पूर्ण नहीं हुआ है और यदि कोई ऐसा करता दिखे वह बहुत आश्चर्य है।

वैसे विवेकी पुरुष को भी विषय भोग की इच्छा न होनी चाहिए जो ज्ञानी  पुरुष काम को ज्ञान का अत्यंत बेरी जानता हुआ भी फिर काम की इच्छा करें तो इससे बढ़कर क्या आश्र्य है

आत्मा नित्य और शरीरआदिक अनित्य है , इन दोनों के विवेचन करने वाले का नाम विवेक की है आनंद रूप ब्रह्मा की प्राप्ति का नाम मोक्ष है।

ऐसा ज्ञानी यदि यह भय रखें कि स्त्री पुत्र धन आदिक अनित्य वस्तुओं से मेरा वियोग हो जाएगा तो यह वास्तव में अत्यंत महान आश्रय हैं

“सत्य ज्ञानी को न तो शोक (तृप्ति/प्रसन्नता) होनी चाहिए और न ही क्रोध” (स्वस्थ/शांत रूप): क्योंकि ज्ञानी लोक की दृष्टि में चाहे भोग करता हुआ दिखे चाहे योग, उसकी निंदा करे या उसे कष्ट दें — वह भीतर से सुख-दुःख, निंदा-स्तुति से रहित, केवल साक्षी आत्मा को ही देखता है। आत्मा में न तो हर्ष है और न ही द्वेष, यदि उत्पन्न हो जाए तो यह अत्यंत महान आश्चर्य की बात है।

सावधान रहें: यह जो दृश्यमान जगत है, यह तो माया का कार्य है। और माया का कार्य होने से ही यह सब मिथ्या (नाशवान) है।

जो विद्वान अपने आत्म-स्वरूप में अचल है, वह मृत्यु के समीप आने पर भी भय को प्राप्त नहीं होता है।

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।

मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते ॥ ३-५॥

सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों को जानकर भी मुनि को ममता होती है। यही आश्चर्य है। ॥५॥

आत्मज्ञान का दूसरा महान लक्षण है एकत्व का अनुभव। जब साधक अपने भीतर उसी आत्मा को देखता है जो सभी प्राणियों में विद्यमान है, तब उसके हृदय से द्वेष, ईर्ष्या और भेदभाव मिटने लगते हैं। वह किसी को शत्रु नहीं समझता क्योंकि उसे हर प्राणी में वही चेतना दिखाई देती है। आत्मबोध का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए सभी में स्वयं को देखना है। जिस दिन यह दृष्टि जागृत हो जाती है, उसी दिन प्रेम स्वाभाविक हो जाता है और करुणा प्रयास नहीं रह जाती।

“धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा ।

आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति ॥” (3-9)


आत्मज्ञान का तीसरा स्वाद समत्व है। सामान्य मनुष्य सुख मिलने पर प्रसन्न और दुःख मिलने पर उदास हो जाता है। उसकी शान्ति परिस्थितियों पर निर्भर होती है। लेकिन आत्मज्ञानी जानता है कि सुख और दुःख दोनों शरीर और मन के अनुभव हैं, आत्मा के नहीं। इसलिए वह दोनों परिस्थितियों में साक्षी बना रहता है। उसकी प्रसन्नता किसी बाहरी वस्तु पर आधारित नहीं होती। यही कारण है कि वह न अत्यधिक उत्साहित होता है और न ही परिस्थितियों से टूटता है। उसका केन्द्र बाहर नहीं, भीतर होता है।

मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः ।

अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः ॥” (3-11)


यह श्लोक आत्मज्ञान के सबसे गहरे फल को प्रकट करता है—मृत्यु से मुक्ति। संसार का सबसे बड़ा भय मृत्यु का भय है। मनुष्य जीवन भर उसी से बचने का प्रयास करता है। लेकिन जिसने आत्मा को जान लिया, वह समझ जाता है कि मृत्यु केवल शरीर की है, आत्मा की नहीं। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार शरीर बदलता है लेकिन चेतना बनी रहती है। इसलिए आत्मज्ञानी मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक परिवर्तन के रूप में देखता है। जहाँ मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है, वहीं वास्तविक स्वतंत्रता प्रारम्भ होती है।

निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।

तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥” (3-12)


आत्मबोध का अंतिम स्वाद है आत्मतृप्ति। संसार का प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से सुख प्राप्त करना चाहता है। लेकिन आत्मज्ञानी का आनंद किसी बाहरी कारण पर निर्भर नहीं होता। वह स्वयं में ही संतुष्ट रहता है। उसकी प्रसन्नता वस्तुओं से नहीं आती, बल्कि उसके अपने अस्तित्व से उत्पन्न होती है। यही कारण है कि अष्टावक्र कहते हैं कि ऐसे महात्मा की तुलना किसी से नहीं की जा सकती। संसार के सभी सुख सीमित हैं, लेकिन आत्मा का आनंद असीम है।

स्वभावाद् एव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन ।

इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः ॥ ३-१३॥

जो जानता है कि यह दृश्य स्वभाव से ही कुछ नहीं है, वह धीर बुद्धि कैसे देख सकता है कि यह ग्रहण करने योग्य है और यह त्यागने योग्य । ॥१३॥

यह जो दृश्यमान प्रपंच है सो सब दृश्य होने से सूक्ति में रजत की तरह मिथ्या है अर्थात सूक्ति में रजत दृश्य भी है और मिथ्या भी है वैसे यह प्रपंच भी दृश्य होने से मिथ्या है इस अनुमान प्रमाण करके यह जगत मिथ्या सिद्ध होता है ऐसा जी विद्वान ने निश्चित कर लिया है वह धीर पुरुष ऐसा कब देखा है कि यह मेरे को ग्रहण करने योग्य है यह मेरे को त्यागने योग्य है किंतु कदापि नहीं देखता है ।

जिस विद्वान ने अंतःकरण के मलों को दूर कर लिया है वह शीत उष्ण आदि द्वंद से , सुख-दुख आदि से भी रहित और नष्ट हो गई है संपूर्ण विषय वासना जिसकी ऐसी जो समुचित विद्वान उसको दैव योग से प्राप्त हुए जो भोग है उनको प्रारब्ध वश भोगता हुआ भी हर्ष और शोक को नहीं होता है

आत्मबोध का स्वाद व अवस्था है जहां मनुष्य स्वयं को शरीर मन और संसार से परे शुद्ध चेतना के रूप में जान लेता है तब धन का मोह , कामना की बेचैनी ,  ममता का बंधन निंदा –  स्तुति का प्रभाव और मृत्यु का भय धीरे-धीरे समाप्त होने लगते हैं । आत्मज्ञानी संसार से भागता नहीं बल्कि संसार के बीच रहते हुए भी भीतर से पूर्ण स्वतंत्रता और शांत रहता है

अष्टावक्र जी का संदेश के जी स्थानीय अनुभव हो जाए कि मैं वही अविनाशी आत्मा हूं उसी क्षण जीवन की सारी दौड़ समाप्त हो जाती हैं और आत्मानंद का वास्तविक स्वाद प्राप्त होता है

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