अष्टावक्र गीता का चौथा अध्याय glorification of self realization आत्मज्ञान की महिमा आत्म ज्ञान व्यक्ति की अद्भुत अवस्था का वर्णन करता है यहां राजा जनक आश्चर्यचकित होकर बताते हैं कि जिसने अपने वास्तविक स्वरूप को जान लिया है उसका जीवन सामान्य मनुष्य से कितना भिन्न हो जाता है ।
आत्मज्ञान का अर्थ केवल शास्त्र पढ़ लेना नहीं है । आत्मज्ञान का अर्थ है अपने अनुभव से जान लेना कि मैं शरीर नहीं हूं , मैं मन नहीं हूं मैं शुद्ध चेतना हूं जिस समय यह सत्य प्रत्यक्ष हो जाता है उसी क्षण मनुष्य के सारे भय बंधन और दुख समाप्त होने लगते हैं
संसार का सामान्य मनुष्य इच्छा , भय, अपेक्षाओं और चिताओं का बोझ होता रहता है । वह धन, प्रतिष्ठा संबंध और परिस्थितियों में सुख खोजता है लेकिन आत्मज्ञानी जानता है कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं बल्कि अपने स्वयं के स्वरूप में है।
इसलिए वह संसार में रहकर भी संसार से परे रहता है वह कार्यकर्ता है लेकिन कर्तापन नहीं रखता वह भागों के बीच रहता है लेकिन भोग उसका स्वामी नहीं बनता । इस अध्याय का सबसे बड़ा संदेश यह है कि आत्मज्ञानी व्यक्ति किसी उपलब्धि से उत्साहित नहीं होता और किसी हानी से दुखी नहीं होता । जीस परम पद की प्राप्ति के लिए देवता भी लालयित है उसे अवस्था को प्राप्त करके भी ज्ञानी शांत रहता है
क्योंकि अब उसे कुछ पाना नहीं है और कुछ खोना नहीं उसने स्वयं को पा लिया है
अष्टावक्र जी कहते हैं कि जैसे आकाश धुएँ से प्रभावित नहीं होता है वैसे ही आत्मज्ञानी पुण्य और पाप से प्रभावित नहीं होता इसका वास्तविक स्वरूप सदैव शुद्ध और निर्मल रहता है वह स्वयं को शरीर और मन से अलग जानता है इसलिए संसार की घटनाएं उसके भीतर और अशांति उत्पन्न नहीं कर पाती है
इस अध्याय का एक और महत्वपूर्ण संदेश है कि केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिछा से ऊपर उठ सकता है सामान्य व्यक्ति हर समय कुछ पाने या कुछ खोने के भय में जीता है । लेकिन ज्ञानी वर्तमान में स्थित रहता है उसकी प्रसन्नता किसी वस्तु व्यक्ति या परिस्थिति स्थिति पर निर्भर नहीं होती है
अष्टावक्र बताते हैं कि जो आत्मा को अद्वैत रूप में जान लेता है, वह पूर्णतः निर्भय हो जाता है। भय हमेशा द्वैत से उत्पन्न होता है—जब तक “मैं” और “दूसरा” है, तब तक भय रहेगा। लेकिन जब ज्ञानी देखता है कि सम्पूर्ण जगत उसी एक चेतना का विस्तार है, तब भय का कोई कारण नहीं बचता।
चतुर्थ अध्याय का सार यही है कि आत्मज्ञान मनुष्य को संसार से भागना नहीं सिखाता, बल्कि संसार में रहते हुए पूर्ण स्वतंत्रता, शांति, निर्भयता और आनन्द के साथ जीना सिखाता है। आत्मज्ञान ही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है, क्योंकि जो स्वयं को जान लेता है, उसके लिए जानने को कुछ शेष नहीं रहता।
हन्तात्मज्ञानस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढः सह समानता॥
राजा जनक कहते हैं कि आत्मज्ञानी पुरुष संसार में रहते हुए भी संसार से बंधा नहीं होता। वह भोगों का त्याग करके नहीं बल्कि उनके बीच रहते हुए भी उनसे मुक्त रहता है पर संसार को एक खेल की तरह देखाता है ।
एक सामान्य व्यक्ति धन प्रतिष्ठा परिवार सफलता और असफलता का बोझ अपने सिर पर ढोता है । उसकी सारी खुशी और दुख बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर होती है । लेकिन आत्मज्ञानी जानता है कि यह सब परिवर्तनशील है वह संसार में रहता है पर संसार उसके भीतर नहीं रहता।
जैसे कमल का फुल पानी रहकर भी पानी से नहीं भीगता, वैसे ही आत्मज्ञानी संसार में रहकर भी उसे प्रभावित नहीं होता इसलिए अष्टावक्र कहते हैं कि आत्मज्ञानी और संसार में फंसे व्यक्ति की तुलना ही नहीं की जा सकती हैं
यदि कोई आपकी प्रशंसा करें तो आप प्रसन्न हो जाए कोई आलोचना करें और आप दुखी हो जाए तो समझे कि अभी संसार आपको चला रहा है लेकिन जिस दिन भीतर की शांति बाहरी घटनाओं पर निर्भर नहीं रहेगी इस दिन आत्मज्ञान की यात्रा प्रारंभ होगी
यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति॥
राजा जनक कहते हैं कि जीस परम पद को प्राप्त करने के लिए इंद्र सहित सभी देवताएं लालायित है उसे परम अवस्था को प्राप्त करके भी योगी उत्साहित या अहंकारी नहीं होता ।
संसार में यदि किसी व्यक्ति को थोड़ी सफलता मिल जाए तो उसका अहंकार बढ़ जाता है थोड़ी प्रसिद्धि मिल जाए तो वह स्वयं को विशेष समझने लगता है लेकिन आत्मज्ञानी को संपूर्ण ब्रह्मांड का सर्वोच्च सत्य मिल जाए पर भी अहंकार नहीं होता ।
क्यों ?
क्योंकि अहंकार तभी तक है जब तक मैं अलग हूं आत्मज्ञान में ज्ञानी देखा है कि सब कुछ इस एक चेतना का विस्तार है वहां कोई दूसरा नहीं बचता जिसे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनी पड़ेगी
आज लोग छोटी सी उपलब्धि पर स्वयं को महान समझने लगते हैं लेकिन जिसने परमात्मा को पा लिया वह भी विनम्र बन रहता है यही सच्चे ज्ञान की पहचान है
तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानापि संगतिः॥
अष्टावक्र कहते हैं कि आत्मज्ञानी के अंतःकरण को पुण्य और पाप स्पर्श नहीं करते जैसे आकाश को धुएं स्पर्श नहीं कर सकता आकाश में धुंआ दिखाई देता है लेकिन वास्तव में धुंआ आकाश को छू नहीं सकता उसी प्रकार आत्म सदा शुद्ध निर्मल और अछूती रहता है
हम स्वयं को शरीर और मान लेते हैं इसलिए पाप पुण्य दुख सुख लाभ हानि का अनुभव करते हैं लेकिन ज्ञानी जानता है कि मैं शरीर नहीं हूं मैं मन नहीं हूं मैं शुद्ध चेतना हूं ” इसलिए कम होते रहते हैं लेकिन उनका बंधन नहीं बनता।
जो पुरुष शुद्ध अति सुंदर चैतन्य स्वरूप आत्मा का श्रवण करके भी समीप वृत्ति विषयों भोगों में अत्यंत आवश्यक रहता है पुनः अज्ञान और माल को प्राप्त होता है अपने ज्ञान को मलिन कर देता है यह बहुत आश्चर्य की बात हैं की आत्मा का साक्षात्कार कर लेने के बाद भी मनुष्य विषयों की गंध में फंसकर फिर से मुढता को प्राप्त हो जाए ।
इस लोक में अष्टावक्र जी मुनि इस प्रकार से शिष्य की परीक्षा ले रहे हैं यह देखना चाहते हैं कि
* क्या शिष्य आत्मज्ञान सुनकर भी विषयों की और लौटेगा ?
यह चेतावनी है कि ज्ञान के बाद भी असंयम मनुष्य को पुनः अ लविद्या में ले जाता है केवल सुनना लेना पर्याप्त नहीं , आत्मज्ञान को जीना पड़ता है सच्चा ज्ञानी वही है जो विषय संसर्ग में रहकर भी भीतर से अलिप्त रहे
जैसे अगर कोई व्यक्ति जानता है कि आग जलती है फिर भी वह उसमें हाथ डाल दे तो दो से ज्ञान का नहीं उसकी मूर्खता का है यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और दिन अवस्था है यह वैसे ही है जैसे सूर्य को देखकर भी अंधेरे में भागने वाला
आत्मज्ञानी व्यक्ति को संसार विषयों में आसक्त नहीं होना चाहिए ?
आत्मज्ञानी व्यक्ति यदि प्रारब्ध के कारण संसार में भोग करता भी दिखे तो परिवार समाज में रहे व्यापार करें जिम्मेदारी और निभाए तो भी वह अंदर से साक्षी रहता है उसकी तुलना किसी मूर्ख विषयों में फंसे हुए विकारों से डूबे हुए मनुष्य से नहीं की जा सकती ।
ज्ञानी का भोग = खेल
अज्ञानी का भोग= बंधन
प्रारब्ध अपना काम करता है यानी शरीर से क्या करता है इससे कोई अंतर नहीं । वह अंतःकरण से साक्षी हैं
Q . ज्ञानी संसार में रहकर भी अज्ञानी जैसा क्यों नहीं ?
उतर:- क्योंकि अज्ञानी सुख-दुख में हर्ष शक करता है ज्ञानी नहीं करता ज्ञानवान ना लाभ में हर्ष करता है ना हानी में शोक करता
क्यों?
क्योंकि वह उसे आत्म स्थिति में स्थित है जिसकी प्राप्ति के लिए देवता तक लालायित रहते हैं हर्ष भी मन का विकार है शोक भी मन का विकार है
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विध।
विज्ञानस्यैव हि दृढ़मिच्छनिचविवर्जने ॥ 4-5॥
ब्रह्म से लेकर एक छोटे से स्तंभ चिटी तक चार प्रकार के जीव समूह में केवल ज्ञानी के पास ही वास्तव में सामर्थ्य शक्ति इच्छा और अनिचछा को त्यागने की क्षमता एक ‘विज्ञ ‘( ब्रह्मज्ञानी ) के पास होती है ।
एक ज्ञानी की इच्छा अनिच्छा से पार जा सकता है , दुनिया में किसी को भी देख लो देवता मनुष्य पशु पक्षी कीड़े हर किसी से इच्छाएं भी होती हैं और अनिच्छा भी लेकिन लेकिन केवल एक आत्मज्ञानी व्यक्ति ऐसा होता है जो चाहे तो इच्छा अनिच्छा दोनों से ऊपर उठ सकता है ज्ञानी को हो या ना हो उसकी शांति नहीं टूटती आसक्त नहीं है
Q. अगर ज्ञानी भी व्यवहार करता है खाता-पीता है परिवार में रहता है तो फिर वह अज्ञानी जैसा क्यों नहीं?
उतर:- क्योंकि अज्ञानी इच्छाओं से फंसकर जीता है लेकिन ज्ञानी इच्छा अनिच्छा के बिना रहता है सिर्फ प्रारब्ध अपना काम करता है , पूरी सृष्टि इच्छा अनिच्छा से चलती हैं लेकिन ब्रह्मज्ञानी की स्थिति इसके ऊपर होती है वह ना किसी चाह में चलता है ना किसी डर में उसका जीवन पारब्ध से चलता है लेकिन उसका अंतर्मन परम शांति में स्थित रहता है ।
जिस विद्वान ने आत्मज्ञान के प्रभाव से भेद और अभेद पाप पुण्य । भी नष्ट हो जाते हैं माया और माया का कार्य मोह यह दोनों जिसके नष्ट हो गए हैं और जो शब्द आदि विषयों से और तीनों गुण से रहित और जो आत्म तत्व को प्राप्त हुआ है और जो तीनों गुण से रहित होकर निर्गुण ब्रह्म से मार्ग में विचरता रहता है उसके लिए ना कोई विधि और ना कोई निषेध है
अद्वैत ज्ञान का अर्थ है कि मैं अलग नहीं हूं संसार अलग नहीं है ईश्वर अलग नहीं सब एक ही चेतना का विस्तार है जो कोई दुर्लभ व्यक्ति अपने आप को और जगत के ईश्वर को अद्वैत रूप में जान लेता है वह जैसा जानता है वैसा ही कर्म करता है और उससे कहीं भी किसी का भी भय नहीं रहता है।
जब तक व्यक्ति द्वैत में रहता है या मैं हूं यह दूसरा है यह दुख देगा यह छीन लेगा यह नुकसान करेगा तब तक भय की जड़ जीवित रहती है।
भय कहां से आता है ?
शास्त्र कहते हैं कि ” द्वितीय वै भयं भवति” जैसा ही दूसरा दिखाई देता है वहीं से भय शुरू होता है अद्वैत ज्ञान यह जान लेता है कि जीवन मृत्यु में ही हूं ! सुख-दुख भी इस एक चेतना के खेल है
