पांचवी अध्याय में ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को आत्मज्ञान की अंतिम अवस्था का रहस्य बताते हैं इस अध्याय का मुख्य विषय है लय अर्थात मन अहंकार और देहाभिमान का आत्मा में विलीन हो जाना हैं की मुक्ति कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे भविष्य में प्राप्त करना हो आत्मा तो पहले से ही मुक्ति शुद्ध और पूर्ण है केवल अज्ञान के कारण मनुष्य स्वयं को शरीर मन और संसार से जुड़ा हुआ मान बैठता है जब यह भ्रम समाप्त हो जाता है तब आत्मा का स्वाभाविक प्रकाश प्रकट हो जाता है
न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि ।
सङ्घातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ५-१॥
तेरा किसी से भी संग नहीं है, इसलिए तू शुद्ध है, फिर किसको त्यागना चाहता है। इस प्रकार देहभमान के त्याग की इच्छा करके लय को प्राप्त हो। ॥१॥
अष्टावक्र कहते हैं कि वास्तव में तेरा किसी से कोई संबंध नहीं है। आत्मा न शरीर है, न मन है, न इंद्रियाँ हैं और न ही संसार है। आत्मा तो केवल साक्षी है। जब तू पहले से ही शुद्ध है, तब त्यागने योग्य क्या है? सामान्यतः लोग सोचते हैं कि मुक्ति पाने के लिए संसार छोड़ना पड़ेगा, वस्तुएँ छोड़नी पड़ेंगी, परिवार छोड़ना पड़ेगा या जंगल जाना पड़ेगा। लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि बाहरी त्याग पर्याप्त नहीं है। असली त्याग है “मैं शरीर हूँ” इस भ्रम का त्याग। जब देहाभिमान समाप्त होता है, तब आत्मा अपने स्वाभाविक स्वरूप में स्थित हो जाती है। इसलिए साधक को बाहरी वस्तुओं से अधिक अपने अहंकार और आसक्ति को त्यागना चाहिए ।
सङ्घातविलयं कुर्वन्ने – असली साधना
संघात = शरीर+ मन+ इंद्रिय + अहंकार
विलय = अलग देखना
मोक्ष यही है = लयम व्रज
मोक्ष कही जाने से नहीं, गलत पहचान मिटने से मिलती है।
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुबुदः ।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज ॥ ५-२॥
मन के संकल्प से यह जगत उत्पन्न हुआ है और मन के ही लय होने से जगत लय हो जाता है ।
आत्मा सदैव शुद्ध और मुक्त है कदापि बंधन को नहीं प्राप्त होता है बंधन और मोक्ष दोनों मन के धर्म है । मन के शांत होने से बंधन और मोक्ष का नाम भी नहीं रहता । आत्मा में मन के लय करने से सारा जगत लय को प्राप्त हो जाता है ।
यह जगत भले ही प्रत्यक्ष दिखाई देता है पर वास्ता में इसका कोई ठोस अस्तित्व नहीं है जैसे रस्सी में सांप दिखाई देता है लेकिन वास्तविकता में नहीं होता उसी तरह यह संसार भी केवल प्रतीत होता है इस सत्य को जानकर तू शांति मुक्ति में स्थित हो जा
संसार तीनों कालों भूत वर्तमान भविष्य में स्थाई नहीं
जो हमेशा नहीं है = असत्य है
असत्य केवल दिखाई देता है होता नहीं है
जो परिवर्तनशील है= संसार
जो अपरिवर्तनशील है= आत्मा
संसार भी ज्ञान से मिटता है । त्याग से नहीं , ज्ञान से ही त्याग आएगा सब भरम मिटेगा
यस श्लोक अद्वैत वेदांत का अत्यंत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है जैसे समुद्र में असंख्या बुलबुल होते हैं उठाते हैं और कुछ समय बाद इस समुद्र में विलीन हो जाते हैं वैसे ही यह संपूर्ण विश्व आत्मा से प्रकट होता है पर अंतर उसी में विलीन हो जाता है बुलबुला समुद्र से अलग नहीं होता है उसका अस्तित्व समुद्र पर ही निर्भर है उसी प्रकार संसार का अस्तित्व आत्मा पर निर्भर है आत्मा के बिना संसार की कोई सता नहीं है जब साधक इस सत्य को जान लेता है सब कुछ उसी एक चेतना का विस्तार है तब उसके भीतर अलगाव की भावना समाप्त हो जाती है और वह अद्वैत का अनुभव करने लगता है ।
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद् विश्वं नास्त्यमले त्वयि ।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज ॥ ५-३॥
दृश्यमान जगत प्रत्यक्ष होता हुआ भी रज्जु सर्प की भाँति तुझ शुद्ध के लिए नही ं है। इसलिए तू मोक्ष को प्राप्त हो। ॥३॥
अष्टावक यहां प्रसिद्ध रजू सर्प दृष्टांत देते हैं अंधेरे में रस्सी को देखकर व्यक्ति उसे सांप समझ लेता है और भयभीत हो जाता है लेकिन जब प्रकाश होता है तब पता चलता है कि वहां सांप कभी था ही नहीं। इसी प्रकार यह संसार हमें वास्तविक प्रतीत होता है परंतु आत्मज्ञान के प्रकाश में ज्ञात होता है कि इसकी स्वतंत्रता नहीं है । इसका अर्थ यह नहीं कि संसार बिल्कुल दिखाई देना बंद हो जाएगा बल्कि यह की ज्ञानी जान लेता है कि यह सब परिवर्तनशील है और अंतिम सत्य नहीं है । सत्य केवल आत्मा है जो शाश्वत अविनाशी और निर्मल है संसार एक सपना की तरफ अनुभव होता है , देखता है परंतु परम सत्य नहीं है
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः ।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज ॥ ५-४ ॥
दुःख और सुख जिसके लिए समान है, जो पूर्ण है, जो आशा और निराशा में समान है, जीवन और मृत्यु में समान है। ऐसा होकर तू मोक्ष को प्राप्त हो। ॥४॥
इस श्लोक में आत्मज्ञान की अवस्था का वर्णन करता है , संसार में अधिकांश लोग सुख मिलने पर प्रसन्न हो जाते हैं और दुख आने पर टूट जाते हैं । आशा पूरी हो जाए तो हर्ष होता है और असफलता मिलने पर निराशा लेकिन जिसने आत्मा का अनुभव कर लिया है वह इन दोनों से ऊपर उठ जाता है उसका आनंद किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं रहता । वह जानता है कि सुख और दुख दोनों आते जाते अनुभव हैं । इसलिए वह दोनों के में समान रहता है इसी प्रकार जीवन और मृत्यु भी उसके लिए समान हो जाते हैं क्योंकि वह स्वयं को शरीर नहीं बल्कि अमर आत्मा जानता है । ऐसी समता ही वास्तविक योग है और यही मुक्ति का द्वार है ।
इस अध्याय का सार यह है कि तू पहले से ही मुक्त हैं केवल अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की आवश्यकता है संसार में भागना नहीं बल्कि उसके प्रति अपने भ्रम को समाप्त करना है जब साधक समझ लेता है कि वह शुद्ध चैतन्य है संसार उसी में उत्पन्न और उसी में विलीन होता है तब मन शांत हो जाता है सुख-दुख लाभ हानि जीवन मृत्यु सब समान प्रतीत होने लगते हैं । यही अवस्था लय है , जहां अहंकार समाप्त हो जाता है और केवल आत्मा का प्रकाश शेष रह जाता है
” लय का अर्थ कुछ खोना नहीं बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना है जब झूठ “में “मिटता है तब सच्चा ‘” मैं ” प्रकट होता है
