जब मन की सारी दौड़ समाप्त हो जाती है । Quietude – शांति Chapter 10

यह अष्टाव के गीता अध्याय 10 ( उपसम प्रकरण ) का प्रारंभ है । इस अध्याय का मुख्य संदेश है –  मन को संसार की दौड़ से हटकर आत्मा में विश्राम देना ।  अष्टावक्र या राजा जनक से केवल ज्ञान की बात नहीं करें बल्कि उनके भीतर अंतिम वैराग्य जागना चाहते हैं

विहाय वैरिणं काममर्थ चानर्थसंकुलम् ।

धर्ममप्येतयोहेतुं सर्वत्रानादरं कुरु ॥ १ ॥

काम ( इच्छाओं ) को जो सबसे बड़ा शत्रु है छोड़ दो ,  अर्थ ( धन)  को भी छोड़ दो क्योंकि उसके साथ अनर्थ जुड़ रहते हैं और उस धर्म को भी छोड़ दो जो केवल अर्थ और काम की प्राप्ति के लिए किया जाता है फिर संसार के किसी भी वस्तु के प्रति विशेष आदर या आसक्ति मत रखो

अष्टावक  कहते हैं कि मनुष्य की पूरी जिंदगी तीन चीजों के पीछे निकल जाती हैं  – काम (Desire) अर्थ (money ) और धर्म का दिखावा । वह सोचता है कि यदि मेरे पास अधिक पैसा होगा  , बड़ा घर होगा , सुंदर जीवन साथी होगा , समाज में समान होगा ,  तब मैं सुखी हो जाऊंगा ।  लेकिन जैसे-जैसे इच्छाएं पूरी होती है नई इच्छाएं जन्म ले लेती है ।  इसलिए इच्छा कभी समाप्त नहीं होती ,  आज के युग में देखो लोग मोबाइल बदलते हैं , कार बदलते हैं , नौकरी बदलते हैं ,  रिश्ते बदलते हैं,  लेकिन मन बेचैनी नहीं बदलती क्योंकि समस्या बाहर नहीं इच्छा में है । इच्छा ही मन को भविष्य में भटकती रहती है ।  अष्टावक्र धर्म का विरोध नहीं करें ,  उस धर्म का विरोध कर रहे हैं जो केवल स्वर्ग , धन ,  प्रसिद्धि या लाभ के लिए किया जाता है । यदि पूजा भी किसी सौदे की तरह हो भगवान ”  मुझे यह दे दो ” तो वह भी इच्छा का ही रूप है । इसलिए वह कहते हैं कि जहां अपेक्षा समाप्त होती है वही आत्मा का द्वार खुलता है जिस दिन मन किसी वस्तु व्यक्ति या सामान का दास नहीं रहेगा उसी दिन भीतर स्वतंत्रता काअनुभव होगा

यह राजा जनक से कहते हैं कि यदि तुम वास्तव में आत्मज्ञान चाहते हो तो सबसे पहले अपने सबसे बड़े शत्रु को पहचानो और वह शत्रु बाहर बैठा कोई व्यक्ति नहीं है और तुम्हारे भीतर बैठी कामना (Desire ) है ।

अष्टावक्र कहते हैं कि ” सर्वत्र अनादरम कुरू” इस वाक्य का अर्थ लोगों का अपमान करना नहीं है , इसका अर्थ है कि संसार की किसी भी वस्तु को इतना महत्व मत दो कि तुम्हारी शांति इस पर निर्भर हो जाए यदि धन मिले तो ठीक ना मिले तो भी ठीक,  समान मिले तो ठीक ,  अपमान मिले तो भी ठीक ।  सफलता मिले तो ठीक, असफलता मिले तो भी मन शांत रहे। यही “अनादर” है अर्थात किसी भी नश्वर वस्तु को अंतिम सत्य न मानना।

स्वप्नेन्द्रजालवत् पश्य दिनानि त्रीणि पञ्च वा ।

मित्रक्षेत्रधनागारदारदायादिसम्पदः ॥” 2||

अष्टावक्र कहते हैं कि  – मित्र ,परिवार खेत ,  मकान , धन ,  रिश्ते और संपत्ति इन सबको ऐसे देखो जैसे कोई सपना हो ।  सपना जब चलता है तब बिल्कुल वास्तविक लगता है लेकिन आंख खुलते ही सब समाप्त हो जाते हैं यही इस संसार का भी सत्य है ।

आज जिस घर पर हमें इतना गर्व है 100 वर्ष बाद उसमें कोई और रहेगा । जीस शरीर पर हम घंटे सजाने संवारने में लगते हैं एक दिन वही शरीर पंचतत्वों में मिल जाएगा । जिन लोगों के बिना हमें लगता है कि हम जी नहीं पाएंगे समय धीरे-धीरे उनके बिना भी जीना सिखा देता है

इंद्रजाल अर्थात जादू ।  जादू देखते समय सब कुछ सच्चा लगता है लेकिन वास्तव में कुछ भी वैसा नहीं होता ।  यही माया है  । सोशल मीडिया पर लोग मुस्कुराते दिखाई देते हैं लेकिन कैमरे बंद होते ही वही व्यक्ति अकेलेपन और तनाव से जूझ रहा होता है । संसार बाहर से जितना चमकदार दिखता है भीतर से उतना ही अस्थिर है इसलिए अष्टावक्र कहते हैं कि जिसे तुम स्थाई समझ बैठे हो वह कुछ दिनों का मेहमान है इसे जान लेने वाला व्यक्ति मोह से मुक्त होने लगता है

यत्र यत्र भवेत्तृष्णा संसारं विद्धि तत्र वै।

प्रौढवैराग्यमाश्रित्य वीततृष्णः सुखी भव॥3||

जहां तृष्णा है ,  वही संसार है । संसार बाहर नहीं है ।  संसार मन की अधूरी इच्छाओं का नाम है । कोई हिमालय में बैठा होकर भी इच्छाओं में जल सकता है और कोई भी भीड़भाड़ वाले शहर में रहकर भी पूर्ण शांत हो सकता है ।

तृष्णा का अर्थ केवल धन नहीं है। प्रशंसा की तृष्णा ,  प्रसिद्ध की तृष्णा ,  दूसरों से आगे निकलने की तृष्णा ,  हर समय मोबाइल देखने की तृष्णा , यह सब संसार है । आज का इंसान हर 5 मिनट में फोन चेक करता है ? क्यों ? क्योंकि मन को कुछ नया चाहिए यही तृष्णा है

अष्टावक्र कहते हैं कि _  प्रौढ़ वैराग्य अपनाओ । वैराग्य का अर्थ गुस्से से सब छोड़ देना नहीं ,  बल्कि अनुभव से समझ जाना कि इन चीजों में स्थाई सुख नहीं है । जब यह समझ भीतर उतर जाती है।  तब इच्छाएं स्वतः ही कम होने लगते हैं ।  इस क्षण मन हल्का हो जाता है जहां तृष्णा समाप्त हुई वहीं से वास्तविक सुख प्रारंभ हुआ

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते।

भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहुर्मुहुः॥

मोक्ष कहीं मृत्यु के बाद मिलने वाली वस्तु नहीं अष्टावक्र कहते हैं की तृष्णा ही बंधन है और तृष्णा का नाश ही मोक्ष है।

कल्पना कीजिए कि आपके हाथ में एक मोबाइल है वह मोबाइल आपको नहीं बनता ।  लेकिन यदि मन हर समय उसी में लगा रहे ,  तब वही बंधन बन जाता है ।  वस्तु नहीं बांधती आसक्ति बाँधती है

जब मन संसार से चिपकाना छोड़ देता है तब भीतर एक अद्भुत संतोष उत्पन्न होता है । तब व्यक्ति हर परिस्थिति में प्रसन्न रहता है उसे सुख मिले तो ठीक दुख मिले तो भी ठीक , सफलता मिले तो भी ठीक असफलता मिले तो भी ठीक ,  यही स्वतंत्रता है यही मोक्ष है

त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा।

अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते॥5||

अष्टावक्र राजा जनक से कहते हैं कि _  तुम शरीर नहीं हो , तुम मन भी नहीं हो,  तुम शुद्ध चैतन्य हो , देखने वाले हो , दृश्य नहीं ।

जिस प्रकार आकाश में बादल आते जाते हैं लेकिन आकाश नहीं बदलता उसे प्रकार विचार आते हैं भावना बदलती हैं , शरीर बूढ़ा होता है लेकिन तुम्हारा वास्तविक स्वरूप कभी नहीं बदलता

यदि यह सत्य है तो फिर और क्या जानना चाहते हो ?

ज्ञान का उद्देश्य केवल इतना ही है कि तुम स्वयं को पहचान लो बाकी सब जानकारी केवल मन को संग्रह है जिसे स्वयं को जान लिया उसके लिए पूरा संसार समझ में आ गया

“यदि तृष्णा (इच्छा) ही बन्धन का कारण है, तो क्या आत्मा को प्राप्त करने की इच्छा भी बन्धन नहीं होगी?”

यह बहुत महत्वपूर्ण शंका है ।  यदि हर इच्छा बंधन है तो फिर मोक्ष की इच्छा , आत्मज्ञान की इच्छा या भगवान को पाने की इच्छा भी तो इच्छा ही हुई फिर उसमें और संसार की इच्छा में क्या अंतर है ?

उतर :- अष्टावक्र कहते हैं कि जगत में वास्तव में केवल तीन पदार्थ है

1 आत्मा ( शुद्ध , सत्य , चैतन्य)

आत्मा क्या है ?

जो स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर से भिन्न तथा जागृत स्वप्न और सुषुप्ति – इन तीनों अवस्थाओं का साक्षी है , वही सच्चिदानंद स्वरूप आत्मा है ”

अर्थात तुम शरीर नहीं हो , तुम मन भी नहीं हो ,  तुम बुद्धि भी नहीं हो ,  तुम वह हो जो इन सबको देख रहा है बचपन आया चला गया , जवानी आई चली गई , । विचार बदलते हैं । भावनाएं बदलती है । लेकिन जो इन सब परिवर्तनों को देख रहा है वह कभी नहीं बदला । वही आत्मा है

2 जगत ( जो बदलता रहता हैं )

जो निरंतर चलता रहता है ,  बदलता रहता है वही जगत है

इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है

शरीर बदल रहा है ,  रिश्ते बदल रहा है ,  धन आता जाता है , समय बदल रहा है , विचार बदल रहे हैं ,  जो हर क्षण बदल रहा है वह स्थाई सत्य नहीं हो सकता

3 अविद्या (अज्ञान)

अष्टावक्र कहते हैं :-

जो अनादि ( आरंभ रहित) अज्ञान है। आत्मज्ञान होने पर नष्ट हो जाता है , वही अज्ञान है ।

अविद्या कोई वास्तविक वस्तु नहीं है  । यह केवल भूल है ।  जैसे अंधेरे में रस्सी को सांप समझ लेना , सांप वास्तव में था ही नहीं ।  केवल अज्ञान था । जैसे ही प्रकाश हुआ सांप गायब नहीं हुआ क्योंकि वह था ही नहीं । केवल भरम समाप्त हुआ इस प्रकार हम स्वयं को शरीर मान बैठे हैं , यही अविद्या है । जैसे ही आत्मज्ञान होता है यह भ्रम समाप्त हो जाता है

राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च।

संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥

राजा जनक के सामने अष्टावक्र मुनि एक ऐसा सत्य रखते हैं जो पहली बार सुनने में कठोर लगता है , लेकिन यदि इसे समझ लिया जाए तो मनुष्य का पूरा जीवन बदल सकता है । वह कहते हैं कि –  हे जनक ! जिन चीजों को तुम आज ” मेरा “कह रहे हो वह पहली बार तुम्हें नहीं मिली . अनगिनत जन्मों से तुम्हें राज्य मिला। ,  धन मिला ,  पत्नी मिली , पुत्र मिले , मित्र मिले , शरीर मिला , सुख मिला और हर बार समय ने सब कुछ तुमसे छीन लिया

अष्टावक्र हमें एक बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं ।  रात को सपना में हम एक अलग दुनिया में देखते हैं   वहां लोग होते हैं , घर होते हैं ,  धन होता है , सुख-दुख होता है , उसे समय सब कुछ बिल्कुल वास्तविक लगता है । लेकिन जैसे ही आंख खुलती है पूरा सपना गायब हो जाता है । फिर दिन भर हम जागृत संसार को सत्य मानते हैं लेकिन जब आत्मज्ञान का सूर्य उदय होता है।   तब यह जागृत संसार भी इस सपना की तरह प्रतीत होने लगता है । जैसे सपना जागने पर मिट जाता है , वैसे ही अज्ञान मिटाने पर संसार का मोह समाप्त हो जाता है । संसार दिखाई देता है , लेकिन बाँध नहीं पता।

यही कारण है कि वेदांत कहता है  ,- “त्रिकालबांधितम सत्यम ” अर्थात जो भूत ,वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में कभी नष्ट ना हो वहीं सत्यम है । अब स्वयं विचार करो । क्या शरीर तीनों कालों में रहता है ? नहीं । क्या धन रहता है ? नहीं । क्या रिश्ते रहते हैं ? नहीं । क्या पद और प्रतिष्ठा रहती है ?  नहीं । जब सब कुछ समय के साथ बदल जाता है तब वह अंतिम सत्य कैसे हो सकता है ?

अष्टावकृ कहते हैं की –  बार-बार नष्ट होने वाली वस्तुओं को पकड़ने की जगह उस सत्य को पहचानो जो कभी नहीं बदलता।  वह न तुम्हारे शरीर है ,  ना तुम्हारा धन है , ना तुम्हारा परिवार ।  वह तुम्हारा शुद्ध चैतन्य स्वरूप है । जन्म बदलते हैं ,  शरीर बदलते हैं रिश्ते बदलते हैं,  केवल लेकिन साक्षी कभी नहीं बदलता ।  इस साक्षी को जान लेना ही आत्मज्ञान है  । जिस दिन यह अनुभव हो जाता है उसी दिन मनुष्य संसार में रहते हुए भी संसार से मुक्त हो जाता है ।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि संसार से घृणा करो या अपने परिवार को छोड़ दो। अष्टावक्र का संदेश त्याग का नहीं, अनासक्ति का है। पत्नी से प्रेम करो, लेकिन यह जानकर कि वह ईश्वर का दिया हुआ एक संबंध है, स्थायी अधिकार नहीं। बच्चों की सेवा करो, लेकिन उन्हें अपनी संपत्ति मत समझो। धन कमाओ, लेकिन धन को अपनी पहचान मत बना लो। शरीर की देखभाल करो, लेकिन यह मत भूलो कि यह भी एक दिन यहीं रह जाएगा

जिस शरीर को तुम  ” मैं ” कहते हो वह भी हर जन्म में बदल गया जिन लोगों को तुम अपना कहते थे वह भी बदल गए ,  यदि सब बदलता रहा तो फिर वास्तव में तुम्हारा अपना क्या है ?

जब प्रश्न जब भीतर उतरता है तब मन का मोह टूटने लगता है । व्यक्ति समझ जाता है कि पकड़ने योग्य कुछ भी नहीं है केवल आत्मा शाश्वत है।

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा।

एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः॥

अष्टावक्र कहते हैं कि _  धन भी कमा लिया ,  इच्छाएं भी पूरी कर ली ,  अच्छे कर्म भी कर लिए लेकिन क्या मन को शांति मिली?

आज का आधुनिक जीवन इसका सबसे बड़ा प्रमाण है । डिग्रियां है , नौकरी है ,  व्यवसाय हैं , विदेश यात्रा है , महंगी कार हैं , फिर भी भीतर बेचैनी है। क्यों ? क्योंकि मन बाहर भाग रहा है,  भीतर लौटना नहीं जानता

संसार एक जंगल की तरह है जितना भागोगे ,  उतना उलझते जाओगे विश्राम बाहर नहीं मिलेगा । यह विश्राम केवल तब मिलेगा जब मन स्वय में लौट आएगा

कृतं न कति जन्मानि कायेन मनसा गिरा।

दुःखमायासदं कर्म तदद्याप्युपरम्यताम्॥8

यह पूरे अध्याय का सबसे करुण और सबसे गहरा संदेश है   अष्टावक्र कहते हैं – कितने जन्म से तुम शरीर से काम कर रहे हो , मन  से सोच रहे हो ,वाणी से बोल रहे हो , कितना संघर्ष किया , कितनी योजना बनाई , कितनी दौड़ लगाई । क्या मिला ?

अब थोड़ा रुक जाओ।

यह” रुकना “आलस्य नहीं है । यह भीतर विश्राम करना है ।  कुछ क्षण स्वयं को केवल साक्षी की तरह देखना है । बिना किसी लक्ष्य के बैठना है ।  बिना कुछ बनने की इच्छा के स्वयं में टिकना है ।

आज पूरी दुनिया भाग रही है ।  लेकिन जिसने रुकना सीख लिया , वही वास्तव में जीना सीख गया । शांति किसी उपलब्धि का नाम नहीं है । शांति तुम्हारा स्वभाव है । उसे प्राप्त नहीं करना ,  केवल पहचानना है।

अष्टावक्र का पूरा अध्याय हमें यही दिलाता है – जिसे पाने के लिए तुम पूरी दुनिया में भटक रहे हो , वह तुम्हारे भीतर पहले से मौजूद है बस इच्छाओं का शोर शांत होने दो ।  जब मन मौन होगा तभी आत्मा की आवाज सुनाई देगी । और वही आवाज तुम्हें उस शाश्वत शांति तक ले जाएगी ,  जिसे संसार का कोई सुख कभी नहीं दे सकता ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share via
Copy link