अष्टावक्र गीता का आठवां अध्याय अत्यंत सक्षिप्त हैं परंतु इसके चार श्लोक संपूर्ण आध्यात्मिक जीवन का सर समेटे हुए हैं । यहां अष्टावक्र बंधन और मोक्ष की ऐसी परिभाषा देते हैं जो बाहरी परिस्थितियों पर नहीं बल्कि मन की अवस्था पर आधारित है । वह बताते हैं कि ना तो संसार बंधन है और ना जंगल मोक्ष हैं , ना घर बंधन है और ना सन्यास मोक्ष है। स बंधन और मोक्ष दोनों का जन्म मन में होता है जिसने मन के रहस्य को जान लिया उसने मुक्ति का द्वारा खोज लिया
बंधन कब लगता है ?
अष्टावक्र उवाच ॥
तदा बन्धो यदा चित्तं किञ्चिद् वाञ्छति शोचति
किञ्चिन् मुञ्चति गुण्हाति किञ्चिद् दृष्यति कुप्यति ॥ ८-१॥
अष्टावक्र जी कहते हैं कि जब मन कुछ भी चाहता है कुछ मिलने पर खुश होता है ना मिलने पर दुखी होता है कुछ छोड़ना पकड़ना चाहता है कभी उत्साहित होता है तो कभी गुस्सा होता है तभी बंधन पैदा होता है।
ध्यान दीजिए या संसार को बंधन नहीं कहा गया बंधन का कारण मन की प्रतिक्रिया है।
दो व्यक्ति एक ही परीस्थिति में रहते हैं एक दुखी हैं और दूसरा शांत कारण स्थिति नहीं मन की अवस्था है ।
मन लगातार कहता रहता है-
“मुझे यह चाहिए ..
“ यह नहीं होना चाहिए….
” काश ऐसा हो जाता….
“ उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया…..
यही निरंतर चलने वाले मानसिक सवन्द् बंधनहै । इच्छा का अर्थ केवल धन वस्तु की चाह नहीं है सामान की इच्छा , प्रशंसा की इच्छा , सफलता की इच्छा, आध्यात्मिक उपलब्धि की इच्छा यह सब मन के बंधन है । मन जितना चाहता है उतना ही असंतुष्ट होता जाता है क्योंकि इच्छा का स्वभाव है कि एक पूरी हुई नहीं की दूसरी पैदा हो जाती है । इसलिए अष्टाव वक्र जी कहते हैं कि बंधन बाहर नहीं इच्छा करने वाले मन में है
बंधन= चित की आसक्ति
मोक्ष= चित की अनासक्ति
चित का कोई भी reaction ही बंधन है
चित = मन+ बुद्धि + अहंकार + स्मृति ( सांसारिक प्रभावों)
हर reaction तुम्हे कर्ता बना देता है । और जहां कर्ता है वहां बंधन है।
जब मन किसी भी एक विषय में भी चिपक जाता है वही बंधन शुरू हो जाता है और जब मन सभी विषयों में अनासक्ति हो जाए वही मुक्ति शुरू हो जाती है
आत्मा सिर्फ साक्षी है वह रिएक्ट नहीं करती वह सिर्फ देखती है , चित शांत यानी आत्मा का स्वरूप देखने लगता है मन जब समान , शांत और एक रस बना रहे तभी वही क्षण मुक्ति का क्षण है । मुक्ति भविष्य में नहीं यहीं इसी पल में , जब मन द्वंद रहित हो जाता है जब मन किसी चीज को पाने के पीछे नहीं भागता और किसी चीज की खो जाने पर रोता भी नहीं ना अपने पर खुशी ना खोने का दुख तब समझो यही है वास्तविक मुक्ति है मोक्ष कोई दूर की चीज नहीं मन के शांत और स्वयं को जानने से ही मोक्ष मिल जाता है
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं काश्वपि दृष्टिषु ।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ८-३॥
“आसक्ति ही बंधन है”
जब मन किसी भी वस्तु विचार , व्यक्ति , मत , सिद्धांत या पहचान से चिपक जाता है तब बंधन उत्पन होता है । मन केवल वस्तुओं से ही आसक्त नहीं होता है वह अपने विचारों से भी आवश्यक होता है । अपने धर्म , जाति , प्रतिष्ठा , सफलता , असफलता ज्ञान , अज्ञान सबसे आसक्त हो सकता है । यहां तक की आध्यात्मिक साधक अपनी साधना से भी आसक्त हो सकता है । जब मन किसी चीज को पकड़ कर कहता है
“यही मैं हूं”
जैसे आग में पड़े हुए बी भले ही बाहर से बी जैसे दिखे पर उनमें अंकुर निकालने की शक्ति नहीं रहती क्योंकि उनकी बी शक्ति जल चुकी है इस तरह जब तक चित विचार रहित होकर विश्व में इंद्रिय सुख में आसक्त रहता है तब तक बंधन है , जब विवेक जागता है और मन विचार से मुक्त होकर –
* विषय क्षणभंगुरता
* विषय सुख के साथ आने वाले दुख
* विषय आशक्ति की वास्तविक हानि को स्पष्ट रूप से देख लेता है तभी विषयों में आसक्ति छुट्ती है फिर धीरे-धीरे चित् में विषय वासना का बीज ही नष्ट हो जाता है और जब बीज ही नहीं रहा तो न आसक्ति हो सकती है ना बंधन पैदा हो सकता है ना पुण्य जन्म संभव है
इस अवस्था को कहते हैं निर्वासनिक चित् यानी वासनाओं से पूर्णत रहित मन
आत्मज्ञान के पूर्व जितने कल तक पुरुष का चित् विषय से शून्य होकर विषय में आसक्त रहता है उतने कल तक जीव बंधन में ही पड़ा रहता है पश्चात जब विचार करके हैं युक्त हुआ रचित दोष दृष्टि करके विषयों में आसक्ति से रहित हो जाता है और फिर वासना विषय का बीज भी चित् में नहीं रहता है तब फिर वह मुक्त होकर कदापि बंधन को नहीं प्राप्त होता है
जब तक जीव का शरीर आदि को से अहंकार अभ्यास बना है तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती जिस काल में अहंकार अभ्यास इसका निवृत्त हो जाता है उसे काल में बिना ही परिश्रम अकरता , अभोक्ता हो। मुक्त हो जाता है
अष्टावक्र हमें किसी नए स्वर्ग की ओर नहीं भेजती ना किसी भविष्य की उपलब्धि का वादा करते हैं वह कहते हैं कि मोक्ष कोई प्राप्त करने की वस्तु नहीं है । मोक्ष तो वही है जो तब प्रकट होता है जब मन की इच्छाएं आसक्तियां और अहंकार शांत हो जाते हैं जहां मैं समाप्त होता है वहीं से आत्मा का अनंत प्रकाश प्रकट होता है वही मोक्ष है वही शांति हैं वही आत्मज्ञान है
