अष्टावक्र गीता के सातवें अध्याय में राजा जनक अपने आत्मानुभव को व्यक्त कर रहे हैं। अब वे केवल शास्त्रों की बातें नहीं कर रहे, बल्कि उस सत्य को बोल रहे हैं जिसे उन्होंने स्वयं प्रत्यक्ष अनुभव किया है। यहाँ जनक का दृष्टिकोण पूर्णतः बदल चुका है। अब वे स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि या संसार नहीं मानते, बल्कि अनन्त, अचल और शुद्ध चैतन्य के रूप में जानते हैं। यह अध्याय बताता है कि आत्मज्ञान प्राप्त होने पर व्यक्ति संसार से भागता नहीं, बल्कि संसार को उसके वास्तविक स्वरूप में देखता
“मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः ।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ ७-१ ॥
जनक कहते हैं कि मैं एक अनन्त महासागर हूँ और यह सम्पूर्ण संसार केवल एक छोटी सी नाव है जो अपने ही मन की हवाओं से इधर-उधर डोल रही है।
यहाँ महासागर आत्मा का प्रतीक है और नाव संसार का। सामान्य मनुष्य स्वयं को नाव मानता है। जब जीवन में सुख आता है तो वह प्रसन्न हो जाता है, दुःख आता है तो टूट जाता है। लाभ मिले तो अहंकार बढ़ता है, हानि हो तो निराशा घेर लेती है।
लेकिन आत्मज्ञानी स्वयं को नाव नहीं, महासागर जानता है।
जीवन में विचार आएंगे ,लोग बदलेंगे ,सीस्थिति बदलेगी , जीवन में उतार चढ़ाव आएगा लेकिन यह सब आपके सच्चे अस्तित्व को डिस्टर्ब नहीं कर सकता
जैसे समुद्र को कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसकी सतह पर कितनी नावें चल रही हैं, वैसे ही आत्मज्ञानी को संसार की घटनाएँ भीतर से विचलित नहीं कर सकतीं। उसके भीतर एक गहरी स्थिरता होती है।
उसके लिए सफलता और असफलता केवल जीवन के दृश्य हैं। वे आते हैं और चले जाते हैं, परन्तु उसका वास्तविक स्वरूप अचल बना रहता है।
दुनिया जैसी चाहे घूमए मेरा असली स्वरूप शांत और गहरा है मुझे इससे कोई भी डिस्टरबेंस नहीं है
जो विक्षेप है वह मन में है मेरा स्वरूप में नहीं । आत्मा कभी बेचैनी नहीं हो सकती विचार उठते हैं गिरते हैं ।
Q . अगर लय चिंतन नहीं होगा तो संसार के विक्षेप , इच्छाएं , भावनाएं – मन की उतार चढ़ाव यह तो चलते रहेंगे तो क्या वह आपको ( आत्मा ) को परेशान नहीं करेंगे ?
उतर= विक्षेप डिस्टर्ब तभी करते हैं जब तुम भूल जाते हो कि तुम समुद्र हो और लहरों को ही मैं मान लेते हो ।
लय चिंतन = यह पहचान की ” मैं“ मन नहीं हूं। लय चिंतन जरूरी इसलिए है , क्योंकि उसकी मदद से मानसिक लहरों को लहरों जैसा देखने सीखते हैं लेकिन लय चिंतन ना भी हो तभी आत्मा डिस्टर्ब कभी नहीं होता है ।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः ।
उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः ॥ ७-२॥
मुझ अन्तहीन महासमुद्र में जगतरूपी लहर स्वभाव से उदय हो, चाहे मिठे । मेरी न वृद्धि है, न हानि। ॥२॥
जनक कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत मेरे भीतर उठने वाली एक लहर के समान है। वह उठे या मिट जाए, इससे मुझे न कोई लाभ होता है और न कोई हानि ।
तुम्हारा असली सत्ता आत्मा अनंत समुद्र की तरह और पूरा संसार डे रिश्ते घटनाएं सुख दुख सफलता असफलता सिर्फ लहरों की तरह
शरीर पैदा हो जाए = आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं
शरीर नष्ट हो जाए = आत्मा कोई हानि नहीं
समुद्र में हजारों लहरें उठती हैं। कुछ बड़ी होती हैं, कुछ छोटी । कुछ सुंदर दिखती हैं, कुछ भयंकर। परन्तु कोई भी लहर समुद्र को बड़ा या छोटा नहीं बनाती।
उसी प्रकार संसार में जन्म, मृत्यु, सफलता, असफलता, निर्माण और विनाश निरन्तर चलते रहते हैं। परन्तु आत्मा पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
जब शरीर जन्म लेता है तब आत्मा नहीं बढ़ती और जब शरीर मरता ह लै तब आत्मा घटती नहीं।
यही कारण है कि आत्मज्ञानी मृत्यु से भी भयभीत नहीं होता। वह जानता है कि परिवर्तन केवल लहरों में है, समुद्र में नहीं।
मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना ।
अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः ॥ ७-३॥
यह श्लोक पूरे वेदान्त का सार है।
जनक कहते हैं कि संसार केवल मन की कल्पना है और मैं उस निर्विकल्प सत्य में स्थित हूँ जहाँ कोई कल्पना नहीं है।
हमारा सम्पूर्ण दुःख वस्तुओं से नहीं, बल्कि उनके बारे में बनाई गई धारणाओं से पैदा होता है।
कोई व्यक्ति हमें कुछ कह देता है। शब्द कुछ क्षण में समाप्त हो जाते हैं, लेकिन हम महीनों तक उन्हें मन में दोहराते रहते हैं। दुःख शब्दों से नहीं, हमारी कल्पना से पैदा होता है।
भविष्य की चिंता, अतीत का पश्चाताप, सम्मान की इच्छा, अपमान का भय—ये सब मन की कल्पनाएँ हैं।
आत्मज्ञानी इन कल्पनाओं के पार चला जाता है। वह वर्तमान क्षण में, शुद्ध अस्तित्व में स्थित रहता है।
जब आप सोते हैं और स्वप्न मैं पूरा संसार देख लेते हैं क्या वह सच में बना था?
नहीं , वह सब आपकी चेतना में ही था । आपकी चेतना से बाहर कुछ भी नहीं था फिर भी संपन्न में ऐसा लगता है कि बाहर कुछ है ।
जागृत संसार भी इसी तरह चेतन (आत्मा ) में ही दिखाई देता है चेतना से बाहर कुछ भी नहीं है ।
राजा जनक कहते हैं कि मेरे अनंत आत्मा रूप महासमुंद में यह संपूर्ण विश्व मात्र एक कल्पना है वस्तुत जगत का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है यह केवल मन नाम रूप की कल्पना भर है ,जैसे स्वप्न
नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरञ्जने ।
इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्तितः ॥ ७-४॥
जनक कहते हैं कि आत्मा विषयों में नहीं है और विषय आत्मा में नहीं हैं। इसलिए मैं आसक्ति और इच्छा से मुक्त होकर शान्त हूँ।
जब तक हम स्वयं को शरीर मानते हैं, तब तक हमें लगता है कि वस्तुओं से हमें सुख मिलेगा।
धन चाहिए। प्रतिष्ठा चाहिए। संबंध चाहिए। प्रशंसा चाहिए।
लेकिन आत्मज्ञान के बाद व्यक्ति समझता है कि सुख वस्तुओं में नहीं है। सुख तो उसके अपने स्वरूप में है।
जैसे सूर्य को चमकने के लिए किसी दीपक की आवश्यकता नहीं होती, वैसे ही आत्मा को पूर्ण होने के लिए किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती।
यही कारण है कि आत्मज्ञानी के भीतर इच्छाओं का अंत हो जाता है। वह संसार का त्याग नहीं करता, बल्कि संसार पर अपनी निर्भरता का त्याग कर देता है।
अहो चिन्मात्रमेवाहमिन्द्रजालोपमं जगत् ।
इति मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ ७-५॥
जनक विस्मय से कहते हैं—
“अहो! मैं तो केवल शुद्ध चैतन्य हूँ और यह संसार इन्द्रजाल अर्थात् जादू के समान है।”
जब किसी जादूगर का खेल देखते हैं तो कुछ समय के लिए वह वास्तविक लगता है। लेकिन जैसे ही रहस्य समझ में आता है, आकर्षण समाप्त हो जाता है।
उसी प्रकार आत्मज्ञान से पहले संसार अत्यन्त वास्तविक प्रतीत होता है। हम उसके पीछे भागते हैं, उसके लिए रोते हैं, लड़ते हैं और जीवन भर संघर्ष करते हैं।
लेकिन आत्मज्ञान के बाद समझ में आता है कि सब कुछ एक स्वप्न की भाँति था।
तब “यह अच्छा है”, “यह बुरा है”, “इसे पाना है”, “इसे छोड़ना है” — ये सभी धारणाएँ समाप्त हो जाती हैं।
क्योंकि जो स्वयं पूर्ण है, उसे कुछ पाने की आवश्यकता नहीं होती।
आत्मा देह – मन आदि भाव में न स्थित होता है , और ना ही देह – मन – आत्मा में स्थित है । दोनों का वास्तविक संबंध नहीं है सिर्फ अज्ञान के कारण जुड़े हुए लगते हैं ।
आत्मा = अनंत – निरंजन – संत टी नर में दे हूं ना मैन हूं ना इच्छा हूं न भाव हो
जो पुरुष जगत के पदार्थ को सत्य मानता है उसी के उनमें ग्रहण और त्याग बुद्धि होती है = इन्द्रजाल
जगत की अपनी सता कुछ भी नहीं है इस वास्ते मेरे को किसी पदार्थ में भी किसी प्रकार करके त्याग और ग्रहण की बुद्धि नहीं होती है
जो वस्तु स्वप्न जैसी है उसका त्याग या ग्रहण कैसा ?
जगत मिथ्या है असत्य नहीं है बिल्कुल सपने की तरह।
