खुद को जानने के बाद इंसान बोलना क्यों छोड़ देता है?
हम पूरी जिंदगी बोलते रहते हैं। अपने बारे में, दूसरों के बारे में, अपने दुख, अपनी इच्छाएं, अपने विचार। लेकिन क्या हमने कभी खुद को सच में समझा है? या हम सिर्फ वही दोहराते रहते हैं जो हमने दुनिया से सीखा है। अष्टावक्र गीता में अष्टावक्र मुनि इसी गहरे रहस्य को खोलते हैं कि जब इंसान अपने असली स्वरूप को जान लेता है तब उसके अंदर एक ऐसी शांति उतरती है जहां शब्द अपने आप खत्म हो जाते हैं।
आज का यह ज्ञान आपको थोड़ा अजीब लगेगा। शायद uncomfortable भी करें क्योंकि यह आपके मन की उस आदत को तोड़ेगा जो हर चीज को समझना और समझाना चाहती है। तो अगर आप तैयार हो उस सच्चाई को जानने के लिए जो आपको बाहर की दुनिया से नहीं बल्कि आपके अंदर ले जाएगी। तो इस वीडियो को अंत तक जरूर देखना।
अब बात शुरू करते हैं उस रहस्य से जो सुनने में जितना सरल लगता है उतना ही गहरा है। जिसने खुद को जाना वो मौन हो गया। लेकिन इस मौन का मतलब क्या है? क्या सच में जो व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह बोलना बंद कर देता है या यहां मौन का अर्थ कुछ और है। कुछ ऐसा जो शब्दों से कहीं पड़े हैं।
अष्टावक्र मुनि जब मौन की बात करते हैं तो वे बाहरी चुप्पी की नहीं बल्कि अंदर की शांति की बात करते हैं। क्योंकि बाहर से चुप रहना आसान है। आप बोलना बंद कर सकते हो। लोगों से दूरी बना सकते हो। लेकिन असली मौन तब आता है जब आपके अंदर का शोर खत्म हो जाता है। और सच यह है कि हमारे अंदर हमेशा एक आवाज चलती रहती है। विचारों की, इच्छाओं की, डर की, तुलना की, उम्मीदों की।
यही आवाज हमें कभी चैन से बैठने नहीं देती। जरा ध्यान से देखो। जब तुम अकेले होते हो तब भी तुम अकेले नहीं होते। तुम्हारे अंदर लगातार कुछ ना कुछ चल रहा होता है। कभी तुम अतीत को याद कर रहे हो। कभी भविष्य की चिंता कर रहे हो, कभी किसी से बहस कर रहे हो, कभी खुद को सही साबित कर रहे हो। यह जो लगातार मानसिक बातचीत चल रही है, यही असली शोर है और जब तक यह शोर है, तब तक मौन संभव नहीं है।
अब सवाल यह है कि यह शोर खत्म कैसे होगा?
क्या हमें अपने विचारों को रोकना होगा?
क्या हमें जबरदस्ती अपने मन को शांत करना होगा?
नहीं।
यही वह जगह है जहां लोग सबसे बड़ी गलती करते हैं। वे अपने मन से लड़ने लगते हैं। उसे कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं। लेकिन जितना तुम मन को दबाओगे वो उतना ही जोर से वापस आएगा।
अष्टावक्र मुनि कहते हैं मन को रोकने की जरूरत नहीं है। उसे समझने की जरूरत है। क्योंकि जब तुम अपने विचारों को देखना शुरू करते हो बिना उनसे जुड़ने के तब धीरे-धीरे तुम्हें समझ आने लगता है कि यह विचार तुम्हारे नहीं है। यह आते हैं और चले जाते हैं। तुम सिर्फ उन्हें देखने वाले हो। अब जरा इस बात को गहराई से महसूस करो। अगर तुम अपने विचारों को देख सकते हो तो इसका मतलब है कि तुम विचार नहीं हो।
अगर तुम अपने मन की स्थिति को observe कर सकते हो तो तुम मन नहीं हो। और जब यह समझ साफ होने लगती है तब एक दूरी बनती है तुम्हारे और तुम्हारे विचारों के बीच यही दूरी मौन की शुरुआत है क्योंकि अब तुम हर विचार के साथ बहते नहीं हो। पहले जब कोई विचार आता था जैसे गुस्सा, डर, चिंता तुम तुरंत उसमें खो जाते थे।
लेकिन अब तुम उसे आते हुए देख सकते हो और जब तुम उसे देखते हो तो वह धीरे-धीरे अपनी शक्ति खो देता है।अब एक और गहरी बात समझो। हमारा मन हमेशा कुछ ना कुछ चाहता है। कभी वह खुशी चाहता है, कभी मान्यता चाहता है, कभी सुरक्षा चाहता है। और इसी चाहत के कारण वो लगातार सक्रिय रहता है। लेकिन जब इंसान खुद को जान लेता है, तब उसे एहसास होता है कि जो वह बाहर ढूंढ रहा था, वह उसके अंदर ही है। और जब यह realization होता है, तब चाहत धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। अब उसे कुछ पाने की जरूरत नहीं लगती, कुछ बनने की जरूरत नहीं लगती। किसी से कुछ साबित करने की जरूरत नहीं लगती। और जब चाहत खत्म होती है तो मन का शोर अपने आप शांत होने लगता है। यही असली मौन है।
अब सोचो जब तुम्हारे अंदर कोई कमी ही नहीं है। जब तुम्हें कुछ चाहिए ही नहीं तब तुम्हें बोलने की जरूरत क्यों पड़ेगी? क्योंकि हम बोलते क्यों हैं? या तो हम कुछ पाना चाहते हैं या कुछ बताना चाहते हैं या खुद को एक्सप्रेस करना चाहते हैं। लेकिन जब अंदर पूरी शांति होती है तब एक्सप्रेस करने के लिए कुछ बचता ही नहीं।
इसका मतलब यह नहीं है कि ऐसा व्यक्ति कभी बोलता नहीं है। वो बोलता है। लेकिन उसके शब्द जरूरत से आते हैं। आदत से नहीं। वह सिर्फ उतना ही बोलता जितना आवश्यक है। उसके शब्दों में कोई दिखावा नहीं होता। कोई ईगो नहीं होता और यही कारण है कि ऐसे व्यक्ति के शब्दों में इतनी शक्ति होती है क्योंकि वे शोर से नहीं शांति से आते हैं।
अब जरा अपने जीवन को देखो। हम कितना बोलते हैं? कितनी बातें सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि हमें चुप रहना अनकंफर्टेबल लगता है। हम साइलेंस को अवॉइड करते हैं क्योंकि उसमें हमें खुद से सामना करना पड़ता है और यही कारण है कि हम हमेशा कुछ ना कुछ डिस्ट्रैक्शन ढूंढते रहते हैं। फोन, सोशल मीडिया, बातचीत, काम। लेकिन जो व्यक्ति खुद को जान लेता है, उसे डिस्ट्रैक्शन की जरूरत नहीं होती। वह अकेले रह सकता है, चुप रह सकता है क्योंकि उसके अंदर अब कोई बेचैनी नहीं है और यही असली स्वतंत्रता है।
अब एक और महत्वपूर्ण बात मौन का मतलब यह नहीं है कि तुम दुनिया से कट जाओ। अष्टावक्र मुनि यह नहीं कहते कि सब कुछ छोड़कर जंगल चले जाओ। वे कहते हैं दुनिया में रहो। अपने काम करो, अपने रिश्ते निभाओ लेकिन अंदर से शांत रहो। यानी बाहर एक्टिविटी हो सकती है। लेकिन अंदर साइलेंस होना चाहिए। यह वही स्थिति है जहां इंसान काम भी करता है, बात भी करता है, हंसता भी है, लेकिन अंदर से स्थिर रहता है। उसे कोई चीज अंदर से डिस्टर्ब नहीं करती।
अब सवाल यह है कि हम इस मौन तक कैसे पहुंचे ?
1 पहला कदम है अवेयरनेस।
अपने विचारों को देखना शुरू करो। जब भी कोई विचार आए उसे पकड़ो मत। बस देखो। जैसे कोई फिल्म चल रही हो और तुम सिर्फ दर्शक हो। दूसरा कदम है एक्सेप्टेंस। जो भी है उसे स्वीकार करो। अपने मन को बदलने की कोशिश मत करो। क्योंकि जब तुम रेजिस्ट करते हो तब वो और मजबूत हो जाता है। तीसरा कदम है लेटिंग गो। धीरे-धीरे उन चीजों को छोड़ना सीखो जिनसे तुम चिपके हुए हो। चाहे वह कोई विचार हो, कोई भावना हो या कोई पहचान। जैसे-जैसे तुम यह प्रैक्टिस करते हो, तुम्हारा मन हल्का होने लगता है और एक दिन ऐसा आता है जब तुम्हारे अंदर एक गहरी शांति उतर जाती है और यही वो मोमेंट है जब इंसान सच में मौन हो जाता है। अब उसे बोलने की जरूरत नहीं होती क्योंकि उसे सब समझ आ जाता है और जो समझ आ जाता है उसे शब्दों में कहना जरूरी नहीं होता। यही कारण है कि अष्टावक्र मुनि कहते हैं जिसने खुद को जाना वह मौन हो गया क्योंकि वहां पहुंचकर शब्द छोटे पड़ जाते हैं और अनुभव इतना बड़ा हो जाता है कि उसे सिर्फ जिया जा सकता है कहा नहीं जा सकता यहीं से असली यात्रा शुरू शुरू होती है क्योंकि समझ आ जाना एक बात है लेकिन उस समझ में स्थिर हो जाना उसे हर पल जी पाना यही असली साधना है और यही वह जगह है जहां अधिकतर लोग रुक जाते हैं उन्हें उन्हें थोड़ी सी शांति मिलती है। कुछ क्षणों के लिए मौन का अनुभव होता है। लेकिन फिर वही पुराना मन, वही शोर, वही उलझन वापस आ जाती है।
तो सवाल उठता है इस मौन को स्थिर कैसे करें?
अष्टावक्र मुनि कहते हैं मौन को पकड़ने की कोशिश मत करो। क्योंकि जिस चीज को तुम पकड़ने की कोशिश करते हो, वह फिर से मन का हिस्सा बन जाती है और मन कभी स्थिर नहीं रह सकता। इसलिए अगर तुम मौन को एक लक्ष्य बना लोगे तो तुम उससे दूर होते जाओगे। मौन कोई करने की चीज नहीं है। मौन तुम्हारा स्वभाव है। तुम्हें उसे बनाना नहीं है। बस उसे पहचानना है।
अब जरा ध्यान से देखो। जब तुम पूरी तरह प्रेजेंट होते हो। जब तुम किसी चीज को बिना जजमेंट के देखते हो तब उस मोमेंट में एक natural silence होता है। लेकिन जैसे ही मन बीच में आता है, कमेंट करता है, analysis करता है, तुलना करता है। वह साइलेंस टूट जाता है। इसलिए असली बात है प्रेजेंट रहना। लेकिन प्रेजेंट रहना भी कोई टेक्निक नहीं है। जिसे तुम जबरदस्ती कर लो। यह धीरे-धीरे आता है। जब तुम अपने मन को समझने लगते हो। जब तुम यह देख लेते हो कि हर विचार टेंपरेरी है। हर भावना आती जाती है। तब तुम अपने आप प्रेजेंट में टिकने लगते हो।
अब एक और सल पॉइंट समझो। हमारा मन हमेशा मीनिंग ढूंढता है। वह हर चीज को समझना चाहता है। लेबल करना चाहता है। लेकिन सच्चाई यह है कि जीवन को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता। उसे सिर्फ जिया जा सकता है और जब यह समझ आती है तब मन धीरे-धीरे शांत होने लगता है। क्योंकि अब उसे हर चीज को कंट्रोल करने की जरूरत नहीं लगती। यही सरेंडर है। लेकिन सरेंडर का मतलब हार मान लेना नहीं है। सरेंडर का मतलब है जीवन को वैसे ही स्वीकार करना जैसा वो है। बिना रेजिस्टेंस के जब तुम रेजिस्ट करना छोड़ देते हो तब तुम्हारे अंदर एक फ्लो आ जाता है। अब तुम लाइफ के साथ चल रहे हो उसके खिलाफ नहीं। और इसी फ्लो में मौन अपने आप गहराता जाता है।
अब जरा अपने रोजमर्रा के जीवन को देखो। क्या तुम हर काम awareness के साथ करते हो?
या तुम ऑटोमेटिक मोड में जी रहे हो?
खाना खाते समय तुम्हारा ध्यान कहीं और होता है। चलते समय तुम कुछ और सोच रहे होते हो। बात करते समय तुम अपने जवाब के बारे में सोच रहे होते हो। यही unconscious living है और यही कारण है कि मौन टिकता नहीं। लेकिन अगर तुम धीरे-धीरे हर काम में अवेयरनेस लाना शुरू करो छोटे-छोटे स्टेप्स में तो तुम्हें फर्क महसूस होने लगेगा। जब तुम खाना खाओ सिर्फ खाना खाओ। जब तुम चलो सिर्फ चलो। जब तुम सुनो पूरी तरह सुनो। यह सिंपल लगता है। लेकिन यही सबसे गहरी प्रैक्टिस है। क्योंकि इसी में मन धीरे-धीरे शांत होता है।
अब एक और गहरी बात। मौन का मतलब सिर्फ शांति नहीं है। मौन का मतलब है clarity। जब मन शांत होता है, तब चीजें साफ दिखने लगती है। अब तुम्हें कंफ्यूजन नहीं होता। अब तुम्हें हर बात को सोचने की जरूरत नहीं होती। तुम्हारे decision भी क्लियर होते हैं। तुम्हारी एकशंस भी सहज होती हैं। और यही नेचुरल इंटेलिजेंस है जो मन के शांत होने पर अपने आप प्रकट होती है।
अब एक बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट जब इंसान मौन में स्थिर होता है तब उसका ego धीरे-धीरे डिसोल्व होने लगता है। क्योंकि ego हमेशा comparison में जीता है। मैं कैसा हूं? लोग मुझे कैसे देखते हैं?होने लगता है। क्योंकि ego हमेशा कंपैरिजन में जीता है। मैं कैसा हूं? लोग मुझे कैसे देखते हैं? मैं दूसरों से बेहतर हूं या नहीं। लेकिन जब तुम अपने असली स्वरूप को जान लेते हो तब यह कंपैरिजन खत्म हो जाता है। अब तुम्हें खुद को साबित करने की जरूरत नहीं होती और यही असली फ्रीडम है।
अब सोचो अगर तुम्हें कुछ साबित नहीं करना, कुछ पाना नहीं, कुछ खोने का डर नहीं। तो तुम्हारा मन कैसा होगा? शांत, स्थिर, मौन यही वह अवस्था है जहां इंसान सच में जीना शुरू करता है। लेकिन यहां एक अंतिम चेतावनी भी है। इस रास्ते में पेशेंस बहुत जरूरी है क्योंकि मन की आदतें बहुत पुरानी है। वो बार-बार तुम्हें पुराने पैटर्न में खींचेगा। कभी तुम गुस्सा हो जाओगे। कभी परेशान हो जाओगे। कभी फिर से उलझ जाओगे। लेकिन हर बार बस एक काम करो। ऑब्जर्व करो। खुद को जज मत करो। खुद को ब्लेम मत करो। बस देखो। धीरे-धीरे यह देखने की क्षमता गहरी होती जाएगी। और एक दिन ऐसा आएगा जब तुम्हारे अंदर का शोर पूरी तरह शांत हो जाएगा। और उस मोमेंट में तुम्हें कुछ पाने की जरूरत नहीं होगी। क्योंकि तुम वही बन चुके हो जिसे तुम ढूंढ रहे थे। यही है अष्टावक्र मुनि का ज्ञान। ना कुछ जोड़ना है ना कुछ बनना है। बस जो झूठ है उसे हटाना है। और जब झूठ हट जाता है तो जो बचता है वही सत्य है। वही मौन है। और यही कारण है कि जिसने खुद को जाना वो मौन हो गया।
