मन को Control करने वाली दिनचर्या और नियमावली | how to control mind by baba premanand ji maharaj

प्रातः काल से सायं काल तक की हर व्यक्ति की अपनी एक दिनचर्या होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि आज हम 4:00 बजे उठे, कल 7:00 बजे उठे, फिर मन को आप कंट्रोल नहीं कर पाएंगे। मन के लिए एक दिनचर्या होनी चाहिए कि हमको 10:00 बजे सोना है, 4:00 बजे उठ जाना है। तो फिर 4 से सवा नहीं होना चाहिए। 4:00 बजे उठ जाना ऐसा नियम बना ले और उठकर के हमको थोड़ी देर नाम जप करना है, थोड़ी देर हमें वाणी जी का गायन करना है, थोड़ी देर हमें ध्यान एक अपनी दिनचर्या, फिर हम अपने संसार के कार्य के नियम जो संसार के कार्य हैं उनको भी करते हुए भगवान को समर्पित करें।

जैसे जो पद में है, जो आपको राष्ट्र सेवा मिली है, जो आपको समाज सेवा के पद मिले हैं या आपको जो घर की सेवा के कार्य मिले हैं उनमें बहुत धर्म पूर्वक आचरण होना चाहिए। अगर आप अधर्म आचरण करते हैं, अपने पद का दुरुपयोग करते हैं तो आप सुबह जग करके थोड़ा माला चला लीजिए फिर भी आपका कल्याण नहीं होगा। क्योंकि आप अपने पद का, अपने सेवा का दुरुपयोग कर रहे हैं। जैसे हम जानते हैं कि अधर्म आचरण है, यह अधर्मी है, हमें पता है दोषी है और वह हमको कुछ धन दे देता है और हम उसको मुक्त करवाने की बात सोचते हैं और जो निर्दोष है, उसको फंसा देते हैं। अब तुम चाहे जितना माला चलाने की कोशिश करो या दान पुण्य करो, वह तुम्हारा अधर्म आचरण, वह अधर्म का धन तुम्हें सतार्ग में नहीं जाने देगा।

नियम लेना चाहिए कि जिस पद में हैं, जिस धर्म में है, जिस कर्तव्य में है, चाहे कुछ भी हो जाए, हम अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होंगे। जितना जप महान है उतना ही कर्तव्य महान है। दोनों बातें समझना है। जब माला फेरा और इसके बाद बेईमानी अधर्म आचरण इनका कोई नियम नहीं है कि हमें कैसे चलना है तो वो माला काम नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसका तभी सत्य भाव माना जाएगा माला जपला जब धर्माचरण है। धर्माचरण नियम से बोले वो बड़े कट्टर नियम वाले हैं। उनको घूस नहीं है। आप उनको भयभीत करके नहीं काम करवा सकते, प्रलोभन में काम नहीं करा सकते। यह हमारी गृहस्ती है ना तो गृहस्ती के पालन के लिए धन चाहिए और धन के लिए हम धर्म को आगे रखें, धन को नहीं। धर्म को, हमारा कर्तव्य क्या?

प्रायः जैसे पूज्य बाबा ने कहा आज हमारे देश में बहुत दुर्दशा हो रही है। दुर्दशा हो रही क्यों? क्योंकि सब अपनी जगह से गलत हो रहे हैं। अगर अपनी जगह हम ठीक रहे तो हमारी दुर्दशा नहीं होगी। हमारा भजन कम होगा लेकिन हम धर्म से चल रहे हैं तो हम विजय होंगे। हम भगवान को प्रसन्न कर सकते हैं क्योंकि हमें जो कार्य मिला है वो भगवान का ही कार्य, सृष्टि भगवान का कार्य। जैसे नए बच्चे कुछ वकील वकालत पढ़ रहे थे तो यहां आकर प्रश्न किया था कि हम जानते हैं कि वह दोषी नहीं है, हम जानते हैं कि वो दोषी है पर दोषी हमें पैसा दे रहा है। तो हम वकालत पड़ी इसीलिए हम उसको जिताएंगे तो ये क्या कोई पाप है?

तो हम कहा खुला पाप है। बोले नहीं हमारी कोई ऐसा कंपनी दो ऐसा कुछ बोले कि हमारी कंपनी को ये यही सिखाया जाता है तो हमको तो ये करना ही होगा। अगर नहीं करेंगे तो हमारी वकालत का मतलब क्या रहा? तो नहीं वकालत का मतलब अधर्मी को मुक्त करवाना नहीं है। वकालत का मतलब अधर्मी के सबूत एकत्रित करके उसको दंड दिलवाना है और धर्मात्मा को मुक्त करवाना है। अब इसके लिए आपके पास अर्थव्यवस्था अगर कमजोर भी है तो धर्म व्यवस्था आपकी पूरी है। धर्म व्यवस्था ठीक है तो परिवार स्वस्थ रहेगा, सुखी रहेगा, भगवान आप पर प्रसन्न रहेंगे।

अच्छा फिर हमने तर्क रखा कि जैसे आपकी बहन के साथ कोई गलत व्यवहार करे आपको पता है और वो आपको ₹1 लाख घूस दे तो क्या आप उसका पक्ष लेंगे? नहीं, तो फिर दूसरी बहन के साथ किया है। अब यहां विचार करना है ना, अपने भाई का अगर कत्ल किए हो मुझे पता हो कि यह दोषी है तो क्या हम पैसे से उसको मुक्त करने देंगे? लगेगा कि जान की बाजी लगा देंगे और तुम्हें हम ऐसे ही एक गरीब आदमी की किसी ने हत्या की है तो आपका पक्ष बनता है पर यह ज्ञान कहां मिलेगा बिना अध्यात्म के ये ज्ञान तो मिलेगा नहीं। ज्ञान तो इस बात का मिला कि कैसे पैसा कमाया जाए। अच्छा वो पैसा यदि अधर्म से आया है तो आपकी दुर्दशा कर देगा, आपकी बुद्धि भ्रष्ट कर देगा।

तो जो बाबा कह रहे हैं कि आज हमारे समाज की बड़ी दुर्दशा हो रही उसका कारण यही है कि हमें अध्यात्म का ज्ञान नहीं, हमें धर्म का ज्ञान नहीं और बड़ी-बड़ी गलतियां हो जाती है। बिल्कुल पता है आदमी निर्दोष है और हम धन के प्रभाव से उसको दंड दे देते हैं। वो दंड भगवान जब आपको पलट कर देंगे तो आप सह नहीं पाओगे। उसका परिणाम बहुत बुरा होता है। तो इसलिए समाज को चाहिए अपने कर्तव्य का पालन करते हुए एक नियमावली बना ले। जैसे कुछ दुकानों का नियम होता है कि वहां फिक्स रेट होता है, नहीं होता। वहां यह नहीं चलेगा कि कसम से कहते हैं कि तुम्हें हम अपना जान के कि ₹100 मीटर यह मिला है, हम बिल्कुल मुनाफा नहीं ले रहे। नहीं झूठ क्यों बोल रहे हो?

दुकान खोले मुनाफा के लिए, झूठ क्यों बोल रहे हो? नहीं लेंगे मुनाफा, हम जितने का लाए हैं उससे मुनाफा लेंगे पर ₹120 मीटर देंगे। कपड़ा बढ़िया है, नाप फिट है, इससे नीचे नहीं उतरेंगे। हमें सफाई देने की जरूरत नहीं है कि हम कसम खाते हैं या ऐसा इतना आप जानते हो यह बिजली है, दुकान है, नौकर लगे हैं तो इसका मुनाफा लेने के लिए दुकान खोलें, कोई दान करने के लिए तो नहीं। तो सबको पता है मुनाफा लेगा लेकिन एक फिक्स दाम उसे ₹10 का मुनाफा लेकर के हम उसको बेच रहे हैं। लेकिन झूठ क्यों बोले? बोले झूठ के बिना धंधा नहीं चलता। नहीं ऐसा नहीं है। अब असत्य बोलोगे तो उससे जो आपको मुनाफा मिलेगा वो आपकी बुद्धि भ्रष्ट करेगा और सत्य है कि मुनाफा के लिए है वही चीज और आप एक फिक्स रेट में दे रहे हैं, बढ़िया है।

अब अगर आप कोई मिलावट करके भोजन सामग्री दे रहे हैं, आपको पता है तो जो खाने वाले के हृदय में बैठे हुए भगवान हैं वो तुम्हारे जीवन में मिलावट कर देंगे, तुम्हारा जीवन महान दुखमय हो जाएगा। ये कहां समझा जाता है? एक आदमी सिंथेटिक दूध बना रहा है, उससे कहो अपने बच्चे को पिलाओ, नहीं पिलाएगा। फिर यह दूसरे का बच्चा जब पिएगा तो उसकी हालत क्या होगी? दूसरे शरीर में जाएगा तो हालत क्या होगी? वो केवल धन की बुद्ध ि रख रहा है। एक आदमी घी में केमिकल मिला रहा है, एक ऐसे अभक्ष पदार्थ मिला है, वो स्वयं नहीं खाएगा लेकिन वो होटलों में भेजा जाएगा। हजारों लाखों लोग खाएंगे, बीमारी बढ़ेगी, उसको रुपया से मतलब है।

यह चीज यह दुर्दशा हर जगह धर्म का ज्ञान ना होने के कारण फैल रही। नही ं फैल रही? एक मरीज बीमार है, असली दवाओं मे ं पैस े ज्यादा है, नकली दवा लेकर के असली के दाम में बेच देना, उसको बिल्कुल फायदा ना होना। लेकिन परमात्मा देख रहा है, तुम जानते हो नकली दवा है, वो तो नही ं जानता बेचारा ज्यादा पढ़ े लिखे नहीं, किसान आदमी गांव का आया ह ै तुमने दे दिया और उसन े पैसा दिया असली के, अब वह पैसा तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट करेगा, तुम्हारे परिवार में कलह पैदा करेगा और तुम्हारा पतन कर देगा।

ऐस े हर डिपार्टमेंट में हर विषय मे ं यद ि हम अपने धर्म से चलें, अपने सत्य से चलें और थोड़ा भी भजन होगा वो आपको उत्तम गति प्रदान करेगा पर ऐसा कहा ं समझ में आ रहा है अध्यात्म के बिना भला ऐसा समझ मे ं आएगा? तो इसीलिए कह रहे हमारे देश की दुर्दशा हो रही है। पूर्वजों में पहले यह था कि हमारा धर्म नही ं जाना चाहिए, चाह े प्राण चले जाए, हमारा चरित्र नही ं जाना चाहिए, चाह े सर्वस्व नष्ट हो जाए। आज इसकी कोई परवाह नहीं। तो उसी से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, जीवन एक पशुवत आचरण वाला हो जाता है और वह अपने को बड़ा सुखी समझन े लगते हैं कि हमारे पास बड़ा वैभव है।

लेकिन प्यारे उस दिन को याद करो जिस दिन तुम्हारा आखिरी समय होगा ना तुम्हारा फार्म हाउस जाएगा ना महल तुम्हारा जाएगा ना बैंक बैलेंस जाएगा ना कोई व्यक्ति और ना यह शरीर, अब तुम्हारे कर्म तुमको भोगवाएंगे। उस समय की कौन याद करता है? अगर उस समय की याद हो तो भय लग जाए कि नही ं नही ं पाप नहीं करूंगा क्योंकि जाना ह ै यहा ं से। अच्छा कब जाना कुछ पता ले किसी भी समय ट्रांसफर हो सकता ह ै इस शरीर से तो हमे ं लगता है कि महापुरुषों के जो वचन है कि हमे ं एक नियम से जीवन जीना चाहिए, धर्म पूर्वक जीवन जीना चाहिए, अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए जो हमारे लिए कर्तव्य आज प्राय धन प्रधान बुद्धि होने के कारण कर्तव्य स्वभाव हो रहा है।

एक विद्यालय में विद्यार्थी के जो गुरु पद मे ं बैठा ह ै उसका क्या कर्तव्य है? वह अपने कर्तव्य को भूला हुआ है। भला छोटे-छोटे विद्यार्थियों को जिनकी नींव पूरे राष्ट्र सेवा मे ं समाज सेवा में बन सकते हैं, अगर उनको हम सही शिक्षा नही ं दी तो उनका पूरा जीवन बर्बाद हो जाएगा। अगर उनको हम गलत सपोर्ट कर दिए तो उनका पूरा जीवन बर्बाद क्योंकि नया जीवन है और जगह-जगह अपने-अपने कर्तव्यों का यद ि पालन किया जाए तो पूरा समाज सुखी हो जाए लेकिन कर्तव्यहीनता आ रही, कोई अपने कर्तव्य को नही ं समझ रहा है।

तो यही बात महापुरुष जनों को दुख लगता है कि अगर सब अपने कर्तव्य का पालन करें, धर्म का पालन करें, भगवान का नाम जप करें तो सब सुखी हो जाए। सुख सब चाहते ह ैं और आचरण दुख वाले करते इसीलिए सुख नही ं मिलता मिल रहा है, परिणाम मे ं हमे ं दुख मिल रहा है। सच्ची मानना वो रुपया पूरे परिवार में अशांति पैदा कर देगा और धर्म पूर्वक ₹100 लाओगे और चार-पांच परिवार के बैठ के नमक रोटी खाओग े आनंद से सोओग े बड़ा प्यार रहेगा, भगवान की कृपा रहेगी। पर यह बात समझ मे ं नही ं आती है।

तो यह वृत्ति अगर छोड़ी ना जाएगी तो कुछ भी कर लो, कही ं भी दान पुण्य कर लो, लाभ नहीं मिलेगा। अगर दान देन े की बात कही गई है तो धर्म पूर्वक कमाए हुए धन से अगर आप मेहनत से कमाए हो ना ₹1 दे दोगे ना तो ₹1 का वो आटा लाके अगर दो रोटी खाएगा तो खूब भजन होगा और आप ₹1 लाख बेईमानी का रख दोगे ना तो बैठे-बैठ े वो गंदा ही सोचेगा, भजन नहीं होगा, उसका गंदा सोचना और आपका गंदा करना दोनों मिलकर के उसके कारण भी तो आप बन े ना तो आपका ही पतन हो जाएगा, उसको तो भगवान बचा लेंग े क्योंकि भगवान की शरण में

तो मुझ े लगता अधर्म के धन से कभी किसी को लाभ नही ं मिलता। तो अपने कर्तव्य का पालन करते हुए यद ि नाम जप किया जाए तो बहुत जल्दी हमको लाभ प्राप्त हो जाएगा। बहुत सुंदर मतलब यह चर्चा होती है, अगर आप लोग इसको धारण कर ले तो निहाल हो जाएगी, सच्ची कह रहे हैं। यह जो बातें ह ै ं यह बहुत सुंदर जीवन को पुष्ट करने वाली ह ैं पर आप धारण कर ले तो बात है, नही ं नहीं तो जैस े लाभ दिखाई दे रहा 500 तो ये बातें भूल जाओगे।

ये बातें अच्छी नही ं लगेंगी, हे यार बहुत बढ़िया काम घर मे ं आएगा, पर हमारी ये बात ध्यान रखना वो 500 घर में अशांति पैदा कर देगा, सच्ची मानना आप धर्म से चलना। धर्म से चलोगे तो भगवान तुम्हारी रक्षा में रहेंगे। अधर्माचरण देखो कैसी कैसी घटनाए ं होती हैं, बढ़िया कार है, फिल्मी गाना लगाए चल रहे ह ैं और वो एक्सीडेंट हुआ, आग लग गई, बाहर निकल ही नही ं पाए, वो अंदर ही जल गए, क्या हुआ? ये करोड़ों रुपए की कार भुंज दिया तुमको अंदर ही बैठाल के, धूधू करके आग लग गई।

अंदर जल, ए ऐस े जलना चाहते हो या भगवान के आनंद में चिंतन करके शरीर छूट े हो फिर दाह संस्कार हो ऐसे कि सब लोग भगवान के नाम का कीर्तन करते जा रहे फिर आपका अंतिम संस्कार, वहां जीवित जल गए क्या हो सकता है? एक-एक पल तुम्हारे कर्म का हिसाब होगा, एक-एक सेकंड का। ये ऐस े कर्म करो कि हमारा अच्छा हिसाब हो, बुरा हिसाब यह मत समझो कोई देख नहीं रहा, वह देख रहा है जिसको हिसाब कर रहा है, वह देख रहा है। उसके लिए कोई वकील या किसी सबूत की जरूरत नही ं होती, वो सर्वांतर्यामी आपके अंदर बैठ े देख रहा है।

तो सदैव जैसे सत्संग सुन रहे हैं तो अगर हाथ जोड़ के प्रार्थना है थोड़ी भी बात मान लोगे तो आप सच्चे सुख के मार्ग में चलने लगोगे। नहीं तो भाई बहुत गंदी हवा चल रही है, माया की बहुत गंदगी ऐसी फैल रही, कलिकाल है ना कि यह बातें किसी को पसंद ना थी। वो बात बताओ कि हम कितना रुपया कमा ले, कैसे कितने भोग भोग लें और वो अध्यात्म में नहीं है, आपको सच धोखे में मत रहना।

अध्यात्म में है जितना आप धर्म से चलोगे उतना सुखी होगे और लोक में जितना धर्म मिल जाएगा उतना सुखी माना जाएगा। लेकिन वो सुख नहीं है, वो चंद मिनट के लिए हाईजन की तरह जलेगा और फ्यूज हो जाएगा और धर्मात्मा दीपक की तरह जलेगा पर बहुत काल तक चलता रहेगा। इन बातों का चिंतन कीजिए, खूब नाम जप कीजिए और भगवान के भरोसे रहिए, गंदे आचरण मत कीजिए।

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