क्या गृहस्थ भक्त को नई गाड़ी-घर लेने की इच्छा करना चाहिए या नहीं ? Guruji premanand Ji Maharaj Baba

डॉक्टर स्वप्नील पाटिल जी जलगांव महाराष्ट्र से राधे राधे महाराज जी आपके चरणों में
कोटि-कोटि प्रणाम । महाराज जी क्या ग्रस्त नाम जापक जो होता है सांसारिक प्रलोभनों से हमेशा बचना चाहिए जैसे कि नया घर लेंगे ऐसी अंदर इच्छा आती है नई गाड़ी लेना है तो इससे बच के ग्रस्त जीवन नहीं इसमें ये देखना है प्रवृत्ति मार्ग में हमारे पास जैसे धन है हमें लगता है हम नया घर निर्माण करें कर लीजिए लेकिन कर्जा ले करें इस पर आप विचार कीजिए या कोई हम घस लेकर के बनाएं कोई अधिकारी पद में है या ऐसा अधर्म के द्वारा प्राप्त किए हुए धन से तुम कभी सुख शांति प्राप्त नहीं कर सकते।

यदि धर्म पूर्वक कमाया हुआ धन है और मन में आता है कि परिवार के सुख के लिए नया मकान ले देते हैं। ले लेना चाहिए। परिवार को तीर्थ याटन कराना है या कहीं रिश्ते नाते में जाना एक गाड़ी ले लेते हैं। पैसा है कर लेना चाहिए। महाराज जी विषय ऐसा है कि अगर कुछ नया लेना है तो उसमें चिंतन ज्यादा हो जाता है। तो ऐसा लगता है कि अपन मार्स से भटक रहे हैं। इसलिए नहीं उसका चिंतन इस तरह से करना है कि हमारी ड्यूटी है परिवार सुख के लिए। तो जैसे हम ठाकुर सेवा में लगे तो सोचते हैं इत्र अच्छे से अच्छा श्री जी को लगाएं।

अमुक से अमुक अच्छा भोग लगाएं। जैसे हमारे को पोशाक दिखाई जाती है कि ये श्री जी के लिए मंगला की पोशाक ठीक रहेगी। नहीं नहीं ये श्री जी लायक नहीं है। हटाओ इसको । हां ये श्री जी लायक है। तो जैसे हम श्री जी के लिए अच्छी-अच्छी वस्तुएं चयन करते हैं तो ऐसे ही आपका पुत्र है, पत्नी है, माता है, पिता है, परिवार है। ये आपकी सेवा है।

उनके सुख के लिए आप अपने सुख की प्रधानता ना रखें। उनके सुख की प्रधानता रख के करें तो ये भजन बन जाएगा। उनमें भगवान विराजमान । अगर हमारे पास बढ़िया घर है तो हम अपने परिवार को सुख दे सकते हैं। यह बुद्धि । लेकिन बेईमान और अधर्म भाव नहीं होना चाहिए कि हम बेईमानी से कमाकर अधर्म के भाव से ऐसा नहीं होना चाहिए।

यदि हमारी सामर्थ्य है तो हम अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने परिवार को सुख दें और धर्म पूर्वक कमाएं। इसमें कोई भक्ति में बाधा नहीं। अपनी विलासिता का ध्यान रखें। अपनी विलासिता के लिए धन का दुरुपयोग ना करें। परिवार के सुख के निमित्त से किया हुआ वो भजन माना जाएगा। लेकिन जहां लक्ष्य है अंदर के चिंतन का। अपनी विलासिता का देखो कुछ लोग होते हैं धन कमाकर विलासिता में जैसे मदिरापान कर रहे हैं पराई स्त्रियों के प्रति गलत पैसे का प्रयोग कर रहे हैं और नाना प्रकार के अन्य जो वो शब्द है कमाए हुए धन से कभी-कभी किसी शराब पीने वाले भाई से पूछा कि

आप कितने शराब पी जाते हैं? 100 200 के तो पी जाते होंगे। बोले हजार की पी जाते हैं।

हम कहा अब बताओ अगर ₹1000 का आप फल फूल सब्जी लेकर घर जाओ और सबको पवाओ तो कितना परिवार सुखी होगा।

आज के बाद कसम खाओ कि शराब नहीं पिएंगे। तो धन का वो दुरुपयोग है और यह धन का सदुपयोग है। तो उस धन का सदुपयोग करते हुए परिवार को भगवत भाव से मानते हुए नाम जप किया जाए तो हमारी भक्ति में कोई बाधा नहीं है। हां हम अपने लिए जब कपड़ा खरीदेंगे तो कम पैसे वाला सोचेंगे।

लेकिन जब पत्नी के लिए खरीद बहुत अच्छा खरीदे जो खुश हो जाए बेटे के लिए अच्छा सा माता-पिता के लिए अच्छा सा अच्छा अपने काम चल जाएगा अपना काम चल जाएगा अपने लिए जब विलासिता की बात आवे तो उसमें विवेक प्रयोग करें ये अपना क्या अपने तो भगवान के भक्त हैं अपने को तो पता है सब नौटंकी नाटक माया का है

लेकिन वो लोग सुखी हो जाएंगे वो हर्षित हो जाएंगे तो उनके लिए वो विषय हम कर देते हैं अपने निरपेक्ष रहते हैं जैसे कम से कम अपना खर्चा बनाते और उनके लिए अच्छी से अच्छी व्यवस्था करते यह सेवा बन जाएगी। उनके लिए जो योग्य है वही करना है। उनकी मांगों को हमेशा पूरा नहीं कर सकते। हां मांगों की तो किसी की भी पूरा नहीं किया जा सकता क्योंकि मांगे तो बहुत बड़ी है। बहुत बढ़िया है। नहीं मांगे तो बहुत बड़ी है। अगर एक सोने की जंजीर पहना दो तो फिर हीरे का आहार चाहिए। तो मांग तो बढ़ती चली जाएगी। लेकिन जैसे मांग करने वाले हैं जो अपने प्रियज देखो मांग करने वाले जो प्रियजन हैं उनके सामने अपनी परिस्थिति खोल के रखनी चाहिए जिससे उनका द्वेष ना बढ़ने पावे कि अब जैसे माता-पिता है वो जो मांग कर रहे हैं पत्नी है जो मांग कर रही है तो अगर उनके सामने आपकी परिस्थिति नहीं तो वो कहेंगे पत्नी जो कहते हैं वो कर देता है और हम जो कहते हैं वो नहीं करता या इनके माता-पिता कहे तो कर देते हैं और जब हम कहे तो नहीं तो आपस में द्वेष ना बने। अपनी परिस्थिति को खोल के रखें।

विवेकी भक्त जन जो होते हैं वो छुपाव छल कपट नहीं करते। इतना महीना आता है। इतने में ये खर्चा होता है। इतने अब आप बोलो हमारे पूज्य माता-पिता उनका ऐसे और आप तो हमारी प्राण हो। आप हमारी अर्धांगिनी हो। आपके आपको क्या छुपाव है। एक दैन्यता और प्रियता में किसी को भी बस में किया जा सकता है। और अगर विवेक नहीं है तो फिर बहुत कलह और शांति गृहस्ती में हो जाती है। धन्य है वो घर जिसमें झगड़ा ना होता हो। है नहीं विवेक पूर्वक परिवार को संभाल के चले वह बहुत बड़ा विद्वान बहुत बड़ा ज्ञानी बहुत बड़ा भगत है जो अपने परिवार को संभाल ले देखो संत भगवान के बल से समाज के समाज को संभाल देते हैं आपके परिवार में चार छह लोग होंगे तो आपकी भक्ति इतना तो रंग लावे कि छह लोगों में प्रेम पैदा कर दे छह लोगों में शांति रहे छह लोगों में झगड़ा ना

रहे संतों को तो देखो लाखों में झगड़ा नहीं होने देते लाखों में अशांति नहीं होने देते ऐसी भक्ति का तो आप ऐसी ऐसी भक्ति करें कि आपका परिवार शांत रहे, झगड़ा ना करे, प्रसन्न रहे। उचित धर्म की कमाई से, उचित कामनाओं की पूर्ति करते हुए उनमें भगवत भाव करते हुए आप भगवान को प्राप्त हो सकते हो।

भगवत प्राप्ति कोई कठिन कार्य नहीं है। कठिन कार्य है गंदे आचरणों को छोड़ पाना। जब उनको नहीं छोड़ पाते तो कह देते भगवत प्राप्ति बड़ी कठिन है। गंदे आचरण छोड़ दो। सहज जीवन में भगवत प्राप्ति हो जाएगी। नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवक समेत सुत नारी। नाम जप भगवत प्राप्ति पक्की तो आप समझ पा रहे हैं

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