इस अध्याय में वक्ता बदल जाते हैं । अब ऋषि अष्टावक्र नहीं बल्कि आत्मा ज्ञान प्राप्त कर चुके राजा जनक अपने अनुभव को व्यक्त कर रहे हैं पिछले अध्ययनों में अष्टावक ने जो ज्ञान दिया था अब उसका प्रत्यक्ष अनुभव जनक के शब्दों में प्रकट हो रहा है । इसलिए यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां दर्शन नहीं बल्कि अनुभूति बोल रही हैं ।
लययोग

जो ज्ञान कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ उसका त्याग है न लय, सच्चा ज्ञान ही मुक्ति है
गुरुजी अपनी अनुभूति बता रहे हैं पांचवें प्रकरण में उन्होंने लययोग यानी जगत को मन में विलीन करने की साधना सिखाई इस छठे प्रकरण में गुरु जी कहते हैं कि मेरे लिए लय, त्याग ग्रहण यह सब असंभव है ,
क्यों ?
क्योंकि लय किसका होता है ? उसी वस्तु का लय होता है – जो जन्मी हो , बनी हो, बदले , नष्ट हो लेकिन जो कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है उसका ना लय संभव है ना त्याग ना ग्रहण , जगत प्रतीति है सत्य नहीं है
पहले शिष्य को “लययोग” सिखाया जाता है, कि यह जगत को मन में विलीन कर के अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो जाओ लेकिन बाद में गुरु कहते है –
वास्तविक में न जगत का लय है , न त्याग ना ग्रहण तुम तो सदा से शुद्ध मुक्त और अनंत हो मतलब लय योग एक सीढ़ी है – मंजिल नहीं
मंजिल है _ असंग , साक्षी, अचल , आत्मा
विचारों का लय= विचार आते हैं _ उन्हें रोकना नहीं बस देखो, साक्षी बनो।
” विचार स्वयं धुलकर वही लौट जाते हैं, जहां से आए थे , यही लय है यह अवस्था गहरी है पर सबसे शक्तिशाली है ”
विषय लय – बाहरी चीजों का लय, – इंद्रिय के विषयों का भीतर समा जाता ।
मन बाहरी आवाजों, रूपो, स्पर्श, गंध, स्वाद , इन सबकी पकड़ छोड़ देता है, बाहरी की दुनिया धुंधली हो जाती हैं , मन बाहर जाना बंद करता है, , इसमें जगत का लय नहीं होता, बल्कि मन की बाहर भागने की प्रवृत्ति लय होती है ”
” जगत प्रत्यक्ष है पर वास्तव में अवास्तविक है इसलिए इसे मन में विलीन करके आगे बढ़ो ‘

विचार लय= मन की विचार तरंगे शांत हो जाना इस अवस्था में विचार उठते हैं पर पकड़ नहीं पाए जैसे पानी में बुलबुले उठते हैं और तुरंत फूट जाते हैं मन की धारा टूट कर शांत हो जाती हैं और सोचने की मशीन कमजोर हो जाती है ( मन है भी और नहीं भी )
विचार आते हैं पर वह उनसे जुड़ता नही
= अहम लयम सबसे गहरा अंतिम परम चरण
मैं भाव का विलय
कर्ता भोक्ता, देखने वाला सब धूल जाते हैं
जैसे दीपक बुझ जाने पर सिर्फ अंधकार बचता है ऐसे ही हम विलीन होने पर सिर्फ शांत निश्चल आनंद स्वयं बचता है
इस अवस्था में
ना मन बचता है
ना विचार बचता है
ना संसार बचता है
ना साधक बचता है
ना योग बचता है
बस मौन । शुद्ध चैतन्य । अद्वैत ।
यही आत्म स्वरूप चमकता है यहां लय योग भी लय हो जाता है
इस अवस्था को अष्टावक् जी कहते हैं कि ना त्याग ना ग्रहण न लय = मै तो सदा से आकाशवत अनत हु।
मैं समुद्र हूं और यह पूरा जगत सिर्फ एक लहर है लहरों को ना पकड़ने की जरूरत है ना छोड़ने की न मिटने की उनका अपना को अस्तित्व ही नहीं है जो भी है समुद्र है और वह मैं हूं
आत्मा= समुद्र
जगत= समुद्र में उठने वाली तरंगे
जनक कहते हैं कि मैं महासागर हूँ और यह सम्पूर्ण संसार उसकी तरंगों के समान है।
(यहाँ तरंग केवल प्रतीक है—उत्थान और विलय का।)
समुद्र में असंख्य तरंगें उठती हैं, पर वे समुद्र से अलग नहीं होतीं। तरंग का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत आत्मा से अलग नहीं है। जन्म, मृत्यु, सुख, दुःख, सफलता, असफलता—ये सब चेतना के महासागर में उठती हुई तरंगें हैं।
जब साधक स्वयं को तरंग नहीं बल्कि समुद्र जान लेता है, तब जीवन के उतार-चढ़ाव उसे विचलित नहीं कर पाते।
“मैं आकाश के समान अनन्त हूँ”
जनक उवाच ॥
आकाशवदनन्तोऽहं घटवत् प्राकृतं जगत् ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-१॥
राजा जनक कहते हैं कि मैं आकाश की भाँति अनन्त हूँ और यह संसार घड़े की भाँति सीमित है। आकाश को घड़ा सीमित नहीं कर सकता। घड़ा बनता है, टूटता है, बदलता है, लेकिन आकाश वैसा ही रहता है। उसी प्रकार शरीर, मन, विचार, परिस्थितियाँ और सम्पूर्ण संसार परिवर्तनशील हैं, जबकि आत्मा अनन्त और अपरिवर्तनशील है।
जब यह ज्ञान दृढ़ हो जाता है, तब संसार से भागने या उसे त्यागने की आवश्यकता नहीं रहती। त्याग तभी किया जाता है जब किसी वस्तु को वास्तविक माना जाए। ज्ञानी जानता है कि आत्मा से अलग कुछ भी नहीं है, इसलिए न त्याग की आवश्यकता है, न ग्रहण की।

अहं स शुक्तिसङ्काशो रूप्यवद् विश्वकल्पना ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-३॥
“मैं सीपी हूँ, संसार चाँदी का भ्रम है”
यहाँ जनक एक प्रसिद्ध वेदान्तिक उदाहरण देते हैं। दूर से सीपी (शुक्ति) को देखकर कई बार चाँदी का भ्रम होता है। व्यक्ति चाँदी समझकर उसकी ओर दौड़ता है, लेकिन निकट जाकर पता चलता है कि वहाँ चाँदी थी ही नहीं।
इसी प्रकार संसार की पृथक सत्ता भी अज्ञान का भ्रम है। आत्मा ही सत्य है, संसार उसी पर आरोपित कल्पना है।
जब सत्य ज्ञात हो जाता है, तब भ्रम को हटाने के लिए विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता। जैसे चाँदी के भ्रम को अलग से नष्ट नहीं करना पड़ता, केवल सीपी को पहचानना पर्याप्त है। उसी प्रकार आत्मज्ञान होने पर संसार के प्रति मोह स्वतः समाप्त हो जाता है।

मै ब्रह्मा हु, जगत मेरा कोई विकार नहीं सिर्फ कल्पना है, जैसे रस्सी में सांप का भ्रम जब ये जाना तो ना कुछ छोड़ना है , ना पकड़ना है, ना कुछ मिटना है , बस अपने आप में रहना ।

लहरें का उठना ” समुद्र का बदलना” नहीं कहलाता यह केवल प्रकट रूप में दिखाई देता है, पर समुद्र के जल में कोई विकार नहीं आता ।
” विकार तो सामान्य वस्तुओं में होता है , पर नित्य (eternal) वस्तुओं में विकार नहीं होता है ।
आत्मा= नित्य , अंचल , अविकार
देह और जगत = केवल कल्पना , अध्यास (appearance)
“सब मुझमें हैं और मैं सबमें हूँ”
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्यथो मयि ।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः ॥ ६-४॥

यह अध्याय का सबसे ऊँचा उद्घोष है। जनक कहते हैं कि मैं सभी प्राणियों में हूँ और सभी प्राणी मुझमें हैं।
यह केवल दार्शनिक कथन नहीं, बल्कि अद्वैत की प्रत्यक्ष अनुभूति है। ज्ञानी को प्रत्येक जीव, प्रत्येक मनुष्य, प्रत्येक प्राणी और सम्पूर्ण सृष्टि में वही एक चेतना दिखाई देती है।
तब भेदभाव समाप्त हो जाता है। “मैं” और “तुम”, “अपना” और “पराया”, “मित्र” और “शत्रु” जैसी धारणाएँ मिटने लगती हैं। प्रेम स्वाभाविक हो जाता है क्योंकि सबमें वही एक आत्मा विद्यमान है।
चारों श्लोकों में एक ही वाक्य बार-बार आता है:

“न त्यागो न ग्रहो लयः”
न कुछ त्यागना है, न कुछ ग्रहण करना है, न कुछ नष्ट करना है।
यह अष्टावक्र गीता की सबसे क्रांतिकारी शिक्षाओं में से एक है। सामान्य साधक सोचता है कि मुक्ति के लिए संसार छोड़ना होगा, इच्छाओं का दमन करना होगा या किसी विशेष अवस्था को प्राप्त करना होगा। लेकिन जनक कहते हैं कि जब आत्मा का सत्य ज्ञात हो जाता है, तब कुछ करने की आवश्यकता नहीं रहती।
जिसे त्यागना था वह भ्रम था। जिसे प्राप्त करना था वह पहले से ही प्राप्त था। जिसे मिटाना था वह कभी वास्तविक था ही नहीं।
