नेतृत्व का चरित्र ही राष्ट्र का चरित्र बनाता हैनेतृत्व का चरित्र ही राष्ट्र का चरित्र बनाता है | राजा और ब्रह्मचर्य | 44 /180 days challenge transformation yourself

प्राचीन भारत में राजा को केवल सिंहासन पर बैठा हुआ व्यक्ति नहीं माना जाता था । राजा को पूरे राष्ट्र के चरित्र का प्रतिनिधि समझा जाता था ।  उसके निर्णय केवल राजमहल की चार दिवारी तक सीमित नहीं रहते उसका आचरण धीरे-धीरे समाज की दिशा निर्धारित करता था । इसी विचार को अथर्ववेद की एक प्रसिद्ध मंत्र में कहा गया है

“ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति।”

अर्थात ब्रह्मचर्य और तप के द्वारा राजा राष्ट्र की रक्षा करता है ।  यहां ब्रह्मचर्य को केवल यौन संयम के संकीर्ण अर्थ में समझना पर्याप्त नहीं है। राजा के लिए ब्रह्मचर्य का व्यापक अर्थ था इंद्रिय _ निग्रह , सदाचार , आत्मसंयम  , कर्तव्य निष्ठा  , विवेक और अपने व्यक्तिगत सुख के ऊपर राष्ट्रहित को रखना । क्योंकि जिस व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं वह दूसरे के जीवन और पूरे राज्य पर न्यायपूर्ण नियंत्रण कैसे रख सकता है ?

प्राचीन नीतिकारों ने इसी कारण कहा – ” यथा राजा तथा प्रजा” । अर्थात जैसा राजा होता है वैसे ही प्रजा बनने लगती है । इसे आज के युग में समझे तो नेतृत्व केवल भाषणों से नहीं बनता । नेतृत्व व्यवहार से बनता है एक पिता अपने बच्चों को जितना उपदेश देता है उससे कहीं अधिक प्रभाव उसके अपने व्यवहार का पड़ता है। एक शिक्षक विद्यार्थी को अनुशासन का पाठ पढ़ाएं लेकिन स्वयं समय का पालन न करें तो विद्यार्थी उनके शब्दों से अधिक उसके आचरण को सीखेंगे । इस प्रकार राष्ट्र का नेतृत्व करने वाला व्यक्ति यदि संयम ईमानदारी कर्तव्य  और मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तो समाज में भी इन गुणों का समान मिलता है ।

राजा धार्मिक होता है तो प्रजा भी धार्मिक होती है, राजा पापी होता है तो प्रजा भी पापी होती है। प्रजा तो राजा का अनुकरण करती है। जैसा राजा होता है प्रजा भी वैसी ही होती

छान्दोग्य उपनिषद् में राजा अश्वपति के राज्य का एक प्रसिद्ध वर्णन मिलता है, जहाँ वे अपने राज्य की नैतिक व्यवस्था पर गर्व करते हुए कहते हैं कि उनके जनपद में चोर, मद्यप, अज्ञानी और व्यभिचारी नहीं हैं। इस प्रसंग को केवल एक ऐतिहासिक रिपोर्ट की तरह नहीं, बल्कि आदर्श शासन की कल्पना के रूप में भी समझा जा सकता है—ऐसा शासन जहाँ राजा का व्यक्तिगत चरित्र और राज्य की सामाजिक व्यवस्था एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।

लेकिन अब इसी सिद्धांत को आधुनिक भारत के संदर्भ में देखिए ।  आज राजा का स्थान लोकतंत्र में किसी एक सम्राट से नहीं बल्कि अनेक प्रकार के नेतृत्व ने लिया है – राजनेता , शिक्षक ,  माता-पिता , उद्योगपति , अधिकारी , कलाकार ,  खिलाड़ी ,  धार्मिक गुरु और सोशल मीडिया पर प्रभाव रखने वाले लोग ।  आज जिसके पास लाखों लोगों का ध्यान है उसके पास एक प्रकार की नेतृत्व शक्ति है । उसके व्यवहार का प्रभाव केवल उसके निजी जीवन तक सीमित नहीं रहता इसलिए आज के युग में ” यथा राजा तथा प्रजा ” को हम थोड़ा व्यापक करके कह सकते हैं की “यथा नेतृत्व तथा समाज

यही कारण है कि ब्रह्मचर्य को केवल अविवाहित रहने या किसी एक शारीरिक नियम तक सीमित कर देना इसके व्यापक संदेश को छोटा कर देता है। गृहस्थ व्यक्ति भी ब्रह्मचर्य के व्यापक अर्थ में संयमित, मर्यादित और निष्ठावान जीवन जी सकता है। परिवार, विवाह और जिम्मेदारियों के भीतर रहते हुए भी व्यक्ति अपनी इन्द्रियों का स्वामी बन सकता है। ब्रह्मचर्य का एक महत्वपूर्ण आधुनिक अर्थ है—मैं अपनी इच्छाओं को अपने निर्णयों का मालिक नहीं बनने दूँगा।

आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है आधुनिक अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा हमारा ध्यान और हमारी इच्छाएं आकर्षित करने के लिए काम करता है । विज्ञापन हमें बताता है कि हमें क्या चाहिए मनोजरंजन हमें बताता है कि हमें किस चीज से सुख मिलेगा और सोशल मीडिया हमें लगातार दूसरे के जीवन से अपनी तुलना करने के लिए प्रेरित करता है । ऐसे समय में जो व्यक्ति अपने मन को नियंत्रित कर लेता है वह केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि व्यावहारिक दृष्टि से भी अत्यंत शक्तिशाली बन जाता है

एक युवा नेता यदि अपने समय का नियंत्रण नहीं कर सकता ,  तो वह बड़े संगठन को कैसे दिशा देगा ? 

यदि वह क्रोध का दास है तो संकट के समय में सही निर्णय कैसे लगा ?

यदि वह लालच का दास है तो सार्वजनिक धन की रक्षा कैसे करेगा ?

यदि वह प्रशंसा का भूखा है तो सत्य सोने सुनने का साहस कैसे करेगा ? 

और यदि वह अपनी इच्छाओं का गुलाम है तो वह समाज के आत्म संयम की अपेक्षा कैसे कर सकता है ?

इसलिए प्राचीन भारतीय चिंतन में राजा की शक्ति केवल उसकी सेवा में नहीं थी उसकी वास्तविक शक्ति उसके चरित्र में थी ।  तलवार राज्य की सीमा की रक्षा कर सकती है लेकिन राजा का चरित्र समाज की दिशा की रक्षा करता है ।

और यही शिक्षा आज एक साधारण व्यक्ति के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

आप राजा नहीं है, फिर भी अपने जीवन के राजा है । आपका शरीर आपका राज्य है ।  आपकी इंद्रियां उसे राज्य के द्वार हैं । आपका मन इसका सेनापति , आपकी बुद्धि मंत्री है , आपका विवेक न्यायाधीश है   और आपका चरित्र उसे पूरे राज्य का संविधान है । यदि इंद्रिय मन को नियंत्रित करने लगे , मन  इच्छाओं के पीछे भागने लगे और बुद्धि केवल इच्छाओं को सही साबित करने लगे तो भीतर अराजकता पैदा हो जाती है । लेकिन जब विवेक  दिशा देता है बुद्धि निर्णय लेती है मन उसका पालन करता है और इंद्रिय अनुशासन में रहती हैं तब भीतर एक प्रकार का आत्मा स्वराज स्थापित होता है

यही ब्रह्मचर्य का एक अत्यंत सुंदर आधुनिक अर्थ है – अपने ऊपर अपना शासन

प्राचीन भारत के आदर्शों में राजा से अपेक्षा थी कि वह पहले स्वयं पर विजय प्राप्त करे और उसके बाद दूसरे का नेतृत्व करे। आज भी किसी व्यक्ति की नेतृत्व क्षमता का वास्तविक परीक्षण तब होता है जब उसके पास शक्ति होती है ।  जिसके पास शक्ति नहीं है उसका संयम आसानी से दिखाई दे सकता है । लेकिन जिसके पास शक्ति धन प्रसिद्धि और अवसर सब कुछ हो और फिर भी वह मर्यादा में रहे – वही वास्तविक आत्म संयम का उदाहरण बनता है ।

पहले स्वयं पर शासन करो।
फिर अपने परिवार का मार्गदर्शन करो।
फिर समाज को प्रेरित करो।
और यदि अवसर मिले, तो राष्ट्र की सेवा करो।

यही आत्मसंयम से आत्मस्वराज्य और आत्मस्वराज्य से राष्ट्रनिर्माण की यात्रा है।

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