ऋषियों ने ब्रह्मचर्य को केवल शरीर का अनुशासन नहीं माना , बल्कि संपूर्ण जीवन का विज्ञान कहा है । उनके लिए ब्रह्मचर्य का अर्थ था – विचारों की पवित्रता , इंद्रियों का संयम ,लक्ष्य के प्रति निष्ठा और आत्मा की ओर निरंतर यात्रा । इसलिए अनेक संस्कृत ग्रंथ में कहा गए हैं कि जो मनुष्य शांति , स्मृति , ज्ञान , आत्ममल और तेजस्वी जीवन चाहता है , उसमें आत्मा संयम का मार्ग अपनाना चाहिए । इन कथनों का उद्देश्य मनुष्य को यह स्मरण करना है की महान जीवन का निर्माण भीतर से होता है बाहर से नहीं ।
तप क्या है ?
भीष्म पितामह कहते है कि ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा तप है । तप का अर्थ केवल जंगल में जाकर कठिन कष्ट सहना नहीं है । वास्तविक तप वह है जिसमें मनुष्य अपनी इच्छाओं का स्वामी बनता है । भूखा रहना तप नहीं बल्कि क्रोध पर विजय प्राप्त करना तप है । कम बोलना तप नहीं बल्कि असत्य ना बोलना तप है । अकेले रहना तप नहीं बल्कि भीड़ के बीच भी अपने चरित्र की रक्षा करना तप है । आधुनिक युग में यही तप सबसे कठिन हो गए हैं क्योंकि आज मनुष्य का सबसे बड़ा युद्ध किसी बाहरी शत्रु से नहीं बल्कि भीतर अपने ही मन से हैं ।
कल्पना कीजिए कि आपके हाथ में एक अत्यंत शक्तिशाली दीपक है । यदि उसकी लौ हर क्षण हवा इधर-उधर डगमगाती रहे , तो वह किसी का मार्ग प्रकाशित न कर पाएगी । लेकिन वही लौ यदि स्थिर हो जाए तो अंधकार को दूर कर सकती है । मनुष्य का मन भी इस दीपक के समान है जब वह इच्छाओं विकर्षण और अस्थिर में भटकता है तब उसकी क्षमता बिखर जाती है । जब वही मन संयमित होता है , तब ज्ञान रचनात्मक और नेतृत्व का स्त्रोत बन जाता है ।
इतिहास में अनेक महापुरुषों के जीवन को आत्म संयम के आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है । भीष्म पितामह , महर्षि दयानंद , हनुमान , गार्गी और अनेक ऋषियों की कथाएं हमें यह बताती है कि चरित्र ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है । इन प्रसंगों को केवल चमत्कार की दृष्टि से नहीं बल्कि प्रेरणा की दृष्टि से समझना चाहिए । उनका संदेश स्पष्ट है जिसने अपने मन पर विजय प्राप्त कर ली उसके लिए जीवन की कठिनाइयां छोटी हो जाती हैं
महर्षि दयानंद आत्मा संयम को शरीर और बुद्धि – दोनों की शक्ति से जोड़ा है । आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि आत्म नियंत्रण , नियमित जीवन , पर्याप्त नींद , व्यायाम और स्वस्थ आदतें सीखने की क्षमता , निर्णय लेने की शक्ति और दीर्घकालिक सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है । इसलिए ब्रह्मचर्य का व्यावहारिक अर्थ केवल किसी एक विषय तक सीमित नहीं है। यह संपूर्ण जीवन को अनुशासित और उद्देश्य पूर्ण बनाने की साधना है।
आज का संसार हमे हर क्षण तत्काल सुख (instant Gratification) बेच रहा है । एक क्लिक में मनोरंजन, एक स्पर्श में विकर्षण और एक क्षण में ध्यान भंग हो जाता है। ऐसे समय में आत्मसंयम केवल धार्मिक आदर्श नहीं , बल्कि एक rare skills बन गया है। जो युवा अपने मन को नियंत्रित करना सीख लेता है , वही अपने समय, career , health , relationship ओर भविष्य का स्वामी बन जाता है।
उपनिषदों की एक सुंदर शिक्षा है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विजय बाहर नहीं ,भीतर होती है । संसार को जीतने से पहले स्वयं को जितना आवश्यक है । यदि मन अस्थिर है तो बाहरी सफलता भी स्थाई संतोष नहीं दे सकती । लेकिन यदि मन स्थिर है तो कठिन परिस्थितियों भी मनुष्य को महान बनने से नहीं रोक सकती।
इसीलिए ब्रह्मचर्य का वास्तविक उद्देश्य किसी भय का निर्माण करना नहीं , बल्कि स्वतंत्रता देना है – इच्छाओं की गुलामी से स्वतंत्रता , आलस्य से स्वतंत्रता , विकर्षण से स्वतंत्रता और दुर्बलताओं से स्वतंत्रता । यही स्वतंत्रता मनुष्य को अपने सर्वोच्च स्वरूप तक पहुंचने की शक्ति देते हैं ।
मैं अपने जीवन का प्रहरी हूँ। मेरा चरित्र मेरी सबसे बड़ी शक्ति है। मैं अपने विचारों, समय, ऊर्जा और कर्मों को महान उद्देश्य के लिए समर्पित करूँगा। मैं आत्मसंयम के मार्ग पर चलकर अपने भीतर ज्ञान, साहस, धैर्य और तेज को जागृत करूँगा। यही मेरी विजय है, यही मेरा धर्म है।“
