अवतार सिंह जी पटियाला से, महाराज जी आपके चरणों में कोटि-कोटि प्रणाम। महाराज जी, आपके सत्संग सुनकर भगवान जी और मां जगदंबा जी की कृपा से यह ज्ञान हुआ कि क्या करना है और कैसे करना है और क्या नहीं करना है। सब कुछ जानकर भी यह मन काबू में नहीं आता और भजन में ध्यान नहीं लगता। काफी समय बैठ भी जाते हैं पर रस नहीं आता। महाराज जी, इस मन को कैसे काबू में लाएं और कैसे मां जगदंबा के प्यार के, उनकी गोदी में सदा-सदा के लिए आने के लिए योग्य बनें? देखो, हम यह जानते हैं कि नहीं करना चाहिए और यह जानते हैं कि करना चाहिए, पर हम अपने को असमर्थ पाते हैं। उसमें होती है भजन की कमी। हमारे जीवन में बल, आध्यात्मिक बल जिसे कहते हैं, वह क्षीण हो चुका है। पांच ज्ञानेंद्रियां मन के साथ जो विषयों का सेवन राग पूर्वक किए हैं, उस से हमारी आध्यात्मिक शक्ति क्षीण हो गई है। हम जानते हैं कि नहीं करना चाहिए पर हम नहीं रुक पा रहे हैं। हम जानते हैं ये करना चाहिए पर हम उस पर नहीं टिक पा रहे हैं। तो दोनों में जो हमें बल चाहिए था, वह बल हमारा क्षीण हो चुका है। मना कष्टा इंद्रिया प्रकृति स्थान कर सती, शब्द स्पर्श रूप रस गंध, ये पांच प्रकृति, इसी में सब भोग आ जाते हैं। जितने सृष्टि के भोग हैं ये पांच में आ जाते हैं शब्द स्पर्श रूप रस गंध और इसकी भोगता पांच ज्ञानेंद्रियां हैं, मन सहित पांच ज्ञानेंद्रियां हैं जो देखना, सुनना, सूंघना, छूना, भोगना आदि है ना ये। अब क्या हुआ? अगर यह राग रहित होकर धर्म पूर्वक केवल भोगी जाती तो हमारी शक्ति क्षीण नहीं होती। राग का त्याग करके और धर्म युक्त भोगा जाता तो शक्ति क्षीण नहीं होती। लेकिन राग से युक्त होकर और शास्त्र विरुद्ध ईमानदारी से देखिए हृदय में, तो वह क्या हुआ कि हमारी जो पवित्रता थी, आध्यात्म शक्ति थी वह क्षीण हो गई। अब हम चाह करके भी नहीं संभाल पा रहे। अभी उपाय एक है जहाँ से शक्ति का स्रोत होता है, वो भगवान का आश्रय है, भगवान की शरण है और नाम से बल प्रकट होता है। श्री, श्री राम बोलो, कृष्ण बोलो, हरि बोलो, राधा बोलो, जो भी हमारे प्रभु के सब नाम। आप मां बोलो, अंबा बोलो, दुर्गा बोलो, वो एक ही प्रभु है अपने भक्तों के लिए विविध नाम रूप धारण किए हुए हैं। वह हरि अनंत, हरि कथा अनंता, हरि अनंत रूपों में, उनकी लीला अनंत रूपों में। अगर हम निष्ठा पूर्वक नाम जप करें, नाम जप और जो आचरण से हम गिरे हैं उन आचरण से जितना हम बच सकते हैं, बचने की चेष्टा करें और नाम जप करें तो हमारे हृदय में आत्म बल आ जाएगा, पावर आ जाएगा। फिर हम जो करना नहीं चाहते, फिर नहीं होगा और जो चाहते हैं वही होगा। वह पावर आ जाता है। जैसे अभी मन है, आप लगाना चाहते हो पर नहीं लगता है और एक आध्यात्मिक पावर ऐसा आ जाता है कि हजारों के बीच में समाधि हुआ जा सकता है जहाँ मन को चाहे वहीं मन को स्थित कर दिया क्योंकि अभ्यास किया और पावर अर्जित किया। हम लोग देखो समझ नहीं पाते, अपने पावर को व्यर्थ में नष्ट करते हैं। जैसे गांधारी जी ने जब सुना कि उनका ब्याह धृतराष्ट्र के साथ हो रहा है और वह आंखों से अंधे हैं, तो जिसका पति आंखों से अंधा हो तो फिर मुझे रूप देखने की जरूरत क्या? उसी समय अपनी नेत्र इंद्रिय में पट्टी बांध ली। देखने को तो एक सहज क्रिया है कि आंखों में पट्टी बांध ली, लेकिन उन्होंने अपनी आंखों की शक्ति को संचित किया। जब महायुद्ध महाभारत का चल रहा था और देखा कि विजय श्री पांडवों की होती चली जा रही है, अब दुर्योधन मारा जाएगा, तब गांधारी जी ने कहा, बुलाया दुर्योधन को और कहा बेटा जिस दिन से मेरा ब्याह तय हुआ था, आज तक मैंने आंख नहीं खोली। आज मैं खोलूंगी, जहां मेरी दृष्टि पड़ेगी, पूरे शरीर तेरा वज्र का हो जाएगा क्योंकि मैंने नेत्रों की शक्ति का संचय किया है। समझना, अब वो जा रहे थे तो भगवान तो सर्वांतर्यामी, मिले कहां जा रहे हो? बोले माता या तो बच्चे हो, तुम ऐसे जा रहे हो, ठीक है माता तो माता ही होती है पर मतलब कुछ तो। उसके भगवान समझाना चाहे तो समझ में ले वो। ऐसे जो ही पट्टी खोली, ऐसी अरे उनका बेटा यह क्या कर लिया? अब यह जगह तेरी कमजोर हो गई, यहीं से मारा जाएगा जंघा और इतना स्थान था, वहीं से। अगर वो ना हो तो एक इंद्री की शक्ति थी, एक इंद्री की शक्ति, नेत्र इंद्रिय को बांध रखा था, खोला तो बिल्कुल वज्र का शरीर कर दिया दुर्योधन का उतना जितने में। ऐसे हमारे पांच ज्ञान इंद्रियां हैं। अब जैसे पहले ऋषि मुनि मौन का आश्रय लेते थे, अगर वाणी से बोल दिया कि जा वृक्ष हो जा, तो हो गए वृक्ष उसमें देर नहीं लगेगी। जा पाषाण हो जा तो पाषाण, एक-एक इंद्रिय की शक्ति और हम व्यर्थ में नष्ट करें ना, व्यर्थ में देखना, व्यर्थ बोलना, व्यर्थ सुनना, व्यर्थ खाना, व्यर्थ की चेष्टाएं तो हमारी सारी शक्ति जा रही है ना। देखो जो साधक जन होते हैं वो शक्ति का संचय करते हैं, नेत्रों को संभालना, वाणी से मौन रहना, भगवत चिंतन करना, शरीर से वही चेष्टा होना जो धर्म युक्त है, तो वही महात्मा कहे जाते हैं। उनके दर्शन मात्र से स्पर्श मात्र से पापनाश की बात आती है, संत दरस जिम पातक टर, दरस परस अघ नास। तो आप में क्या कमी रह गई? वही पांच भौतिक शरीर आपका है और आप भी भगवान के अंश हैं पर आपने अपनी शक्ति को संभाला नहीं, बर्बाद कर दिया है। अब संभाल लीजिए, जब जागे तभी सवेरा। अगर आप संभाल लो तो अब भी संभल जाओगे। देखो अजामिल ने नारायण नाम बालक का उच्चारण किया और शरीर छूटा तो भगवान की प्राप्ति, बच गए ना। तो हम हर श्वास भगवत प्राप्ति के लिए तैयार कर लें कि आज से हम हर श्वास में राधा बोलेंगे, कृष्ण बोलें जो भाई जिसका नाम। हमारा तो हम तो आशिक हैं वृंदावन राधा उपासी तो हम तो राधा-राधा ही बोलेंगे तो राधा-राधा, तो मानो हमारी जैसे इस श्वास में हमने बोला राधा, अब हमारी आखिरी श्वास है, तो भगवत प्राप्ति हो जाएगी ना क्योंकि प्रमाण इस बात का कि अंतिम समय में मनुष्य भगवान ने कहा, मेरा जो स्मरण करता है उसे मेरी प्राप्ति होती है। वो पुत्र के बहाने बोला था नारायण, हम तो जानबूझ के राधा बोल रहे हैं किशोरी जी, तो भरा हमारा कल्याण क्यों नहीं होगा? अब हम लोग लंबे समय के लिए पहले धारणा बना लेते हैं कि 102 साल जप करेंगे तब कहीं ऐसा कुछ होगा, ऐसा 102 साल जिए कौन, ठेका है? ठेका ले कोई, अरे शाम तक हम जिए कि नहीं, इसका हमें भरोसा नहीं। तो अभी हम इसी श्वास से प्रारंभ करते हैं भगवत प्राप्ति की यात्रा। राधा, फिर अगली श्वास राधा, तो हमारा काम बन जाएगा। अच्छा और बात दूसरी कि जैसे अब हमसे आचरण नहीं संभल रहे, नहीं संभल रहे, क्योंकि बहुत बड़ी यह माया का विचित्र खेल है। तो हमने कई बार सत्संग में कहा है कि आपको पता चल जाए कि पुराना किराएदार है, बरसों वर्ष रहता हो गया और गुंडा है, हटाए हट नहीं रहा, तो अब आप उससे बड़े बलवान के नाम कुछ दिन के लिए चाहे करें, पर मकान करना पड़ेगा, नाम नहीं। अब वो जब उसके हाथ में रजिस्ट्री आएगी, अब वो देख लेगा उन गुंडों को, देख लेगा। तो इसीलिए शरणागति का मतलब सबसे बड़े बलवान भगवान हैं। अब काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर हमारी धज्जियां उड़ा रहे हैं, हम कह रहे निकल जाओ भैया, वो कह रहे बहुत जन्म से अधिकार के, हम कैसे जाएंगे? तो प्रभु के नाम में रजिस्ट्री तन्वा मनो रमल सोहम त हे हरि आपके, वो सब निकल जाएंगे जितने काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर है, भगवान के शरणागत के हृदय से स्वयं निकल जाते हैं। तो भगवान की शरण में होकर हर श्वास नाम जप करें, हमारा जीवन व्यर्थ नहीं होगा, हमें भगवत प्राप्ति हो जाएगी। हम कहीं ऐसे विचार पर हो कि हम जितेंद्र हो जाएं, निर्विकार हो जाएं, फिर भजन तो नहीं हो पाएगा। देखो खुली बात है, कलिकाल है और अपने लोगों की दशा देख लो क्या है, अभी कुछ सोचते, थोड़ी देर में कुछ सोचते हैं, क्या भरोसा इस अपनी बुद्धि मन का? तो भरोसा प्रभु का और राधा-राधा। हम पापी हैं, नीच हैं, कामी हैं, क्रोधी हैं, जैसे भी हैं प्रभु आपके हैं और आपका ही नाम जपेंगे, राधा राधा। अब आप देख लेना, पक्का कल्याण हो जाएगा, पक्का कल्याण हो जाएगा।
इस पूरे प्रवचन को मैं आपके लिए सरल भागों (Sections) में divide कर देता हूँ, ताकि आप इसे आसानी से समझ सकें और अपने जीवन में लागू कर सकें:
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🔶 1. समस्या क्या है?
हमें पता है क्या सही है और क्या गलत
फिर भी:
मन काबू में नहीं आता
भजन में ध्यान नहीं लगता
बैठने पर भी रस नहीं आता
👉 कारण: आध्यात्मिक शक्ति (Spiritual Power) कम हो गई है
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🔶 2. शक्ति क्यों कम हुई?
5 ज्ञानेंद्रियां (आंख, कान, नाक, त्वचा, जीभ)
इनके विषय:
शब्द (सुनना)
स्पर्श (छूना)
रूप (देखना)
रस (स्वाद)
गंध (सूंघना)
👉 जब इनका उपयोग:
राग (आसक्ति) के साथ
और शास्त्र-विरुद्ध तरीके से होता है
➡️ तब हमारी आत्मिक शक्ति कमजोर हो जाती है
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🔶 3. सही उपयोग क्या था?
अगर:
बिना आसक्ति (राग रहित)
और धर्म के अनुसार भोग करते
👉 तो शक्ति कम नहीं होती
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🔶 4. अब समस्या क्या हो गई?
हम:
गलत छोड़ना चाहते हैं → छोड़ नहीं पाते
सही करना चाहते हैं → कर नहीं पाते
👉 क्योंकि अंदर का बल (willpower) खत्म हो चुका है
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🔶 5. समाधान क्या है? (मुख्य उपाय)
👉 भगवान का आश्रय + नाम जप
राम नाम
कृष्ण नाम
राधा नाम
माँ दुर्गा/अंबा नाम
👉 कोई भी नाम लो, निष्ठा से लो
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🔶 6. नाम जप से क्या होगा?
अंदर आध्यात्मिक शक्ति (Power) आएगी
फिर:
जो नहीं करना चाहते → नहीं होगा
जो करना चाहते → वही होगा
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🔶 7. शक्ति संचय का उदाहरण (गांधारी)
गांधारी ने आंखों पर पट्टी बांध ली
अपनी नेत्र शक्ति बचाई
जब खोली → दुर्योधन का शरीर वज्र जैसा बना दिया
👉 शिक्षा: ➡️ इंद्रियों की शक्ति को बचाओ, व्यर्थ मत खर्च करो
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🔶 8. हम क्या गलती कर रहे हैं?
व्यर्थ देखना 👀
व्यर्थ बोलना 🗣️
व्यर्थ सुनना 👂
व्यर्थ खाना 🍔
👉 इससे: ➡️ पूरी शक्ति नष्ट हो रही है
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🔶 9. संत क्या करते हैं?
इंद्रियों को नियंत्रित करते हैं
मौन रखते हैं
भगवान का चिंतन करते हैं
धर्मयुक्त जीवन जीते हैं
👉 इसलिए: ➡️ उनके दर्शन से ही पाप नष्ट होते हैं
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🔶 10. अभी क्या करें? (Practical Step)
👉 आज से ही शुरू करें:
हर श्वास में नाम जप:
“राधा… राधा…”
या “राम… राम…”
👉 सोचो:
अगर यह आखिरी श्वास हो
➡️ और उसमें भगवान का नाम हो
👉 तो भगवत प्राप्ति निश्चित है
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🔶 11. जल्दी करो (Time Reality)
100 साल का इंतजार मत करो
किसी को नहीं पता:
शाम तक जिएंगे या नहीं
👉 इसलिए: ➡️ अभी से शुरू करो
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🔶 12. एक और गहरी बात (मन के दुश्मन)
काम
क्रोध
लोभ
मोह
मद
मत्सर
👉 ये पुराने “किरायेदार” हैं
➡️ खुद नहीं जाएंगे
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🔶 13. असली उपाय (शरणागति)
👉 भगवान को “मालिक” बना दो
“हे प्रभु, मैं आपका हूँ”
👉 फिर: ➡️ भगवान खुद इन दुश्मनों को निकाल देंगे
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🔶 14. अंतिम सूत्र (Golden Formula)
👉 चाहे जैसे हो:
पापी हो
कामी हो
क्रोधी हो
👉 फिर भी: ➡️ भगवान का नाम मत छोड़ो
“राधा राधा जपो, कल्याण पक्का है”
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🔥 निष्कर्ष (Conclusion)
👉 मन को सीधे कंट्रोल करने की कोशिश मत करो
👉 पहले नाम जप से शक्ति लाओ
फिर:
मन खुद नियंत्रण में आएगा
भजन में रस आएगा
जीवन बदल जाएगा
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अगर आप चाहो तो मैं इसे Y
