एकोऽहं असहायोऽहं कृशोऽहं अपरिच्छदः।
स्वप्नेप्येवंविधा चिन्ता मृगेन्द्रस्य न जायते॥
“सिंह कभी यह नहीं सोचता कि वह अकेला है , उसके पास साधन कम है या कोई इसका सहारा नहीं है । उसका आत्मविश्वास ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है । उसी प्रकार ब्रह्मचारी भी परिस्थितियों का दास नहीं होता । उसका बल बाहर की वस्तुओं से नहीं बल्कि भीतर के संयम आत्मविश्वास और ईश्वर में अटूट श्रद्धा से उत्पन्न होता है “
यह केवल 30 दिनों तक किसी आदत को रोकने की चुनौती नहीं है यह स्वयं को जीतने का अभियान है । ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ है अपने विचारों इंद्रियों समय ऊर्जा और जीवन शक्ति को उच्च उद्देश्य की ओर ले जाना ।
” ब्रह्मचर्य केवल इंद्रिय संयम नहीं बल्कि जीवन ऊर्जा को उच्च उद्देश्य की ओर मोड़ने की साधना है ”
समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसका युवा वर्ग होता है । जब युवा अनुशासित , संयमी और चरित्रवान होते हैं , तब परिवार समाज और राष्ट्र तीनों सशक्त बनते हैं । लेकिन जब जीवन में आत्मसंयम का स्थान , व्यसन और क्षणिक सुख ले लेते हैं , तब मनुष्य की एकाग्रता आत्मविश्वास और उद्देश्य बोध कमजोर होने लगता हैं ।
शिक्षा का उद्देश्य केवल , इतिहास , गणित , विज्ञान या भाषा का ज्ञान देना नहीं है । सच्ची शिक्षा वह है जो मनुष्य को चरित्रवान बनाएं उसे सत्य , सयंम , सेवा और आत्म अनुशासन का मार्ग दिखाएं । यदि शिक्षा में चरित्र निर्माण की उपेक्षा हो जाए तो ज्ञान होने पर भी जीवन अधूरा रह जाता है ।
माता-पिता और शिक्षक केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाने के लिए उत्तरदाई नहीं है । वे आने वाली पीढ़ी के चरित्र निर्माता भी है । यदि बच्चों को बचपन से आत्मसंयमी , सात्त्विक जीवन , श्रेष्ठ संगति , नियमित व्यायाम , स्वाध्याय और उच्च आदर्शों का अभ्यास कराया जाए तो वह मानसिक रूप से अधिक दृढ़ आत्मविश्वासी और जिम्मेदार नागरिक बन सकते हैं ।
यह ग्रंथ इस उद्देश्य से लिखा गया ताकि युवा अपने जीवन की दिशा पहचानें अपने चरित्र को ऊंचा उठाएं और अपने भीतर छिपे दिव्य शक्ति को जागृत करें इसका लक्ष्य केवल किसी आदत का त्याग नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति तक का निर्माण है जो तेजस्वी विनम्र साहसी कर्तव्यनिष्ट और सामाजिक में समर्पित हो ।
यदि इस ग्रंथ के सिद्धांतों का अध्ययन मनन के साथ किया जाए तो उन्हें जीवन में धैर्य पूर्वक अपनाया जाए तो व्यक्ति अपने विचारों व्यवहार और जीवन दृष्टि में सकारात्मक परिवर्तन अनुभव कर सकता है । आत्म विकास चरित्र बल और सच्ची आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है। आत्मसंयम का मार्ग कठिन अवश्य है , परंतु यही मार्ग आत्म विकास , चरित्बल और सच्ची आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाता है।
आइए , हम केवल ज्ञान प्राप्त करने का नहीं बल्कि अपने जीवन को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प है क्योंकि महान राष्ट्रों का निर्माण महान चरित्र वाले व्यक्ति से होते हैं और महान चरित्र का आधार है – आत्मा संयम , अनुशासन और उच्च आदेशों के प्रति अटूट निष्ठा ।
इस महीने हम ऐसा व्यक्तित्व बनाने का संकल्प लें जो—
. परम सन्माननीय एवं श्रद्धास्पद हो।
. योग्य, परिश्रमी तथा आत्मानुशासित हो।
. मल्ल तथा शस्त्रविद्या विशारद की भाँति शरीर और मन से सशक्त हो।
. सिंह के समान अत्यन्त निर्भय, शूर और बलवान हो।
. परम तेजस्वी, ओजस्वी तथा यशस्वी हो।
. पूर्ण सदाचारी और चरित्रवान हो।
. अतीव देशहितकारी तथा महत् परोपकारी हो।
. कर्मवीर, निस्सीम नम्र और आदर्श बालब्रह्मचारी बने।
इस अगस्त हमारा मंत्र है
मैं परिस्थितियों का दास नहीं अपने मन का स्वामी हूं । मैं अपनी ऊर्जा का संरक्षण करूंगा अपने चरित्र का निर्माण करूंगा और अपने जीवन को महान उद्देश्य के लिए समर्पित करूंगा ।
अगस्त पूरे महीने आत्म संयम , साधना , व्यायाम , स्वाध्याय , ज्ञान , सात्विक आहार , उत्तम संगति और ईश्वर स्मरण के साथ एक नई तेजस्वी और विजय जीवन की शुरुआत करेंगे
