“मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम्॥
भगवान की कृपा से गूँगा भी वाणी का धनी बन सकता है और लंगड़ा भी पर्वत लांघ सकता है । जब ईश्वर की कृपा और दृढ़ संकल्प साथ हो तब असंभव भी संभव हो जाता है
ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल किसी एक प्रवृत्ति का त्याग नहीं है । इसका वास्तविक अर्थ है अपने विचारों , इंद्रियों , समय और जीवन ऊर्जा को व्यर्थ ना गंवाकर किसी महान उद्देश्य की ओर लगाना है ।
प्राचीन भारतीय ग्रंथ में कहा गया है कि हर व्यक्ति अपने जीवन शक्ति का संरक्षण करता है । वह तेज , साहस , धैर्य और आत्मविश्वास में वृद्धि अनुभव करता है । इन ग्रन्थ की भाषा प्रतीकात्मक और प्रेरणात्मक है इनका उद्देश्य मनुष्य को आत्मा से और चरित्र निर्माण की ओर प्रेरित करना होता है
आज का सबसे बड़ा शत्रु बाहर नहीं बल्कि हमारे हाथ में रखा मोबाइल , अनियंत्रित मनोरंजन , अशुद्ध विचार आलसी और क्षणिक सुख की आदतें हैं । हर बार जब हम इन पर विजय प्राप्त करते हैं तब हमारा मन पहले से अधिक मजबूत बनता है
याद रखिए शक्ति केवल शरीर में नहीं होती बल्कि निर्णय में होती है । जब मनुष्य यह निश्चित कर लेता है चाहे परिस्थिति कैसे भी हो वह अपने चरित्र से समझौता नहीं करेगा उसी क्षण उसके वास्तविक उन्नति प्रारंभ हो जाती है।
आज का अभ्यास
* प्रातः ब्रह्ममुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें।
* कम से कम 20 मिनट ध्यान या जप करें।
* 45 मिनट व्यायाम करें।
* अश्लील सामग्री और अनावश्यक सोशल मीडिया से पूर्ण दूरी रखें।
* एक प्रेरणादायक पुस्तक के 10 पृष्ठ पढ़ें।
* रात्रि में लिखें—”आज मैंने किस प्रलोभन पर विजय प्राप्त की?”
आज का संकल्प
” में क्षणिक सुख का दास नहीं , अपने जीवन का निर्माता हूं । मेरा चरित्र मेरी सबसे बड़ी संपत्ति है । मैं अपनी ऊर्जा को ज्ञान , सेवा , साधना और महान उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखूँगा मेरा संकल्प ही मेरी विजय है। ”
