पिछले भाग में हमने सीखा की समस्या आते ही घबराना नहीं है , बल्कि अपने दृष्टिकोण को बदलना है ।
लेकिन अब सवाल यह है – अगर समस्या सचमुच बहुत बड़ी हो तो क्या करें ?
अगर कर्ज हो , व्यापार में भारी नुकसान हो , नौकरी चल गई हो , परिवार में संकट हो , कोई बड़ा सपना टूट गया हो या जीवन अचानक ऐसी दिशा में चला गया हो जिसकी आपने कभी कल्पना ही नहीं की थी तब सकारात्मक कैसे रहे ?
इसके लिए सबसे पहले एक बार समझ में होगी – समस्या को नाकरना सकारात्मक सोच नहीं है । समस्या को स्वीकार करके उसके समाधान की तलाश करना सकारात्मक सोच है ।
एक युवक की कल्पना कीजिए । उसके ऊपर कई जिम्मेदारी थी । व्यापार में नुकसान हुआ , कुछ लोगों से पैसा लेना था , कुछ लोगों को पैसा देना था और ऊपर से परिवार की जिम्मेदारी अलग थी । रात को वह बिस्तर पर जाता तो उसका दिमाग लगातार चलता रहता अब क्या होगा ? अगर पैसा नहीं आया तो ? अगर व्यापार नहीं चला तो ? अगर मैं असफल हो गया तो ? जितना वह सोचता समस्या उतनी ही बड़ी दिखाई देती । एक दिन उसने कागज और कलम उठाई और पहली बार अपनी समस्या को दिमाग से निकाल कर कागज पर लिखना शुरू किया।
उसने लिखा —-
कुल समस्या क्या है ?
फिर उसने उस छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया !
कितना पैसा देना है
कितना पैसा लेना है ?
कहां नुकसान हो रहा है ?
कौन सा खर्च कम किया जा सकता है ?
कौन सा ग्राहक दोबारा संपर्क करने योग्य है ?
कौन सा काम तुरंत करना जरूरी है ?
और कौन सा काम कुछ समय के लिए रोका जा सकता है ?
कुछ देर बाद उसने कागज को देखा और महसूस किया
“समस्या वही है लेकिन अब यह पहले जितनी डरावनी नहीं लगा रही”
क्यों?
क्योंकि पहले उसके सामने एक विशाल अस्पष्ट डर था । अब उसके सामने छोटे-छोटे प्रश्न थे और छोटे-छोटे प्रश्नों के उत्तर खोजे जा सकते हैं । यही से समस्या पर उसका नियंत्रण वापस आना शुरू हुआ ।
उसने समस्या को एक नाम देने के बजाय उसके छोटे-छोटे हिस्से बनाए—
क्या हुआ, ? क्यों हुआ,।? मेरे नियंत्रण में क्या है ? मेरे नियंत्रण से बाहर क्या है ? अभी सबसे जरूरी क्या है ? और आज मैं कौन-सा एक कदम उठा सकता हूँ। ?
धीरे-धीरे उसे समझ आया कि जिस समस्या को वह एक विशाल पहाड़ समझ रहा था, उसमें कई छोटे-छोटे पत्थर थे और हर पत्थर को अलग-अलग हटाया जा सकता था।
” समस्या को देखकर डरने के बजाय उसे तोड़कर समझो। ”
अगर आर्थिक संकट है तो पहले खर्च और आय को अलग-अलग देखो; अगर व्यापार में नुकसान है तो ग्राहक, कीमत, उत्पाद और बिक्री की समस्या अलग-अलग पहचानो; अगर पढ़ाई में असफलता है तो यह मत कहो कि “मैं बुद्धिमान नहीं हूँ”, बल्कि देखो कि तैयारी, समय, ध्यान या अभ्यास में कमी कहाँ थी। याद रखिए, समस्या को सही नाम देना ही समाधान की शुरुआत है।
इसके बाद अगला प्रश्न होना चाहिए—“अब मैं क्या कर सकता हूँ?”
यही प्रश्न एक साधारण इंसान को समाधान खोजने वाला इंसान बनाता है। “अगर मैंने ऐसा नहीं किया होता”, “अगर मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ होता”, “अगर मेरे पास पैसे होते”, “अगर दूसरे लोगों ने मेरा साथ दिया होता”—ये प्रश्न आपको अतीत में घुमाते रहते हैं, ।
लेकिन “अब कैसे?” आपको भविष्य की ओर ले जाता है।
एक युवा ने छोटा व्यवसाय शुरू किया और शुरुआत में लगातार नुकसान हुआ। उसके मित्रों ने कहा, “तुमसे व्यापार नहीं होगा।” लेकिन उसने हार मानने के बजाय अपने पिछले तीन महीनों के आँकड़े निकाले और पाया कि समस्या उसके उत्पाद में नहीं बल्कि ग्राहकों तक पहुँचने के तरीके में थी। उसने बिक्री का तरीका बदला, ग्राहकों से सीधे बात की, उनकी जरूरत समझी और धीरे-धीरे वही व्यवसाय चलने लगा जिसे लोग असफल मान चुके थे।
असफलता हमेशा यह नहीं बताती कि आप योग्य नहीं हैं; कई बार वह सिर्फ यह बताती है कि आपका वर्तमान तरीका काम नहीं कर रहा। इसलिए असफलता को अपनी पहचान मत बनाइए, उसे feedback बनाइए। लेकिन यहाँ एक और शक्ति की आवश्यकता होती है—विश्वास।
जब रास्ता दिखाई न दे, तब अपने ऊपर और ईश्वर पर विश्वास रखना पड़ता है। विश्वास का अर्थ यह नहीं कि समस्या अपने आप समाप्त हो जाएगी; विश्वास का अर्थ है—“मैं इस परिस्थिति से भागूँगा नहीं, मैं सीखूँगा, प्रयास करूँगा, सही लोगों से सलाह लूँगा और ईश्वर से मार्गदर्शन माँगूँगा।”
जब मनुष्य पूरी ईमानदारी से प्रयास करता है और प्रार्थना करता है, तब उसके भीतर एक अद्भुत शांति आती है, क्योंकि उसे पता होता है कि वह परिस्थिति का गुलाम नहीं है। वह परिस्थिति का सामना करने वाला व्यक्ति है।
कल्पना कीजिए कि एक नाव तूफान में फँस गई है; नाविक तूफान को रोक नहीं सकता, लेकिन वह दिशा बदल सकता है, पाल संभाल सकता है, नाव को संतुलित कर सकता है और किनारे तक पहुँचने का प्रयास कर सकता है। जीवन में भी तूफान हमेशा हमारे नियंत्रण में नहीं होते, लेकिन तूफान के बीच हमारा व्यवहार हमारे हाथ में होता है।
आप हर परिस्थिति को नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन हर परिस्थिति में अपना अगला कदम नियंत्रित कर सकते हैं। और यही सकारात्मक मानसिकता की असली परीक्षा है। जब सब अच्छा चल रहा हो तब सकारात्मक रहना आसान है; असली सकारात्मकता तब दिखाई देती है जब परिस्थितियाँ आपके विरुद्ध हों और फिर भी आप कहें—“मैं हार नहीं मानूँगा, मैं रास्ता खोजूँगा।” एक और बात हमेशा याद रखिए—कई बार हमारी सबसे बड़ी समस्या हमारी सबसे बड़ी शिक्षा बन जाती है।
जिस असफलता ने आपको गिराया, वही आपको अनुशासन सिखा सकती है; जिस नुकसान ने आपको परेशान किया, वही आपको धन का महत्व सिखा सकता है; जिस व्यक्ति ने आपको धोखा दिया, वही आपको लोगों को समझना सिखा सकता है; जिस कठिन समय ने आपको अकेला किया, वही आपको अपने भीतर की शक्ति से परिचित करा सकता है। इसलिए समस्या से केवल यह मत पूछिए कि “यह मेरे साथ क्यों हुआ?” उससे यह भी पूछिए—“यह मुझे क्या सिखाने आई है?” यही प्रश्न आपके जीवन की दिशा बदल सकता है।
कभी-कभी ईश्वर हमें वह नहीं देते जो हम चाहते हैं, लेकिन वह परिस्थिति दे देते हैं जिसके माध्यम से हम वह इंसान बन सकते हैं जो हमें बनना चाहिए।
इसलिए अगली बार जब जीवन आपके सामने कोई कठिन समस्या रखे, तो तुरंत शिकायत मत कीजिए; कुछ क्षण शांत बैठिए, गहरी साँस लीजिए और कहिए—“ठीक है, समस्या सामने है। अब देखते हैं इसके भीतर कौन-सा समाधान छिपा है।” फिर समस्या को लिखिए, छोटे हिस्सों में बाँटिए, सबसे आसान हिस्से से शुरुआत कीजिए, जो आपके नियंत्रण में है उस पर काम कीजिए, आवश्यकता हो तो किसी योग्य व्यक्ति की सहायता लीजिए, प्रार्थना कीजिए और लगातार आगे बढ़ते रहिए। क्योंकि कोई भी समस्या आपकी पूरी जिंदगी नहीं होती; वह आपकी जिंदगी का केवल एक अध्याय होती है।
आज का कठिन अध्याय कल आपकी सबसे बड़ी कहानी बन सकता है। आज का संघर्ष कल आपका अनुभव बन सकता है। आज की असफलता कल किसी दूसरे व्यक्ति के लिए आपकी सीख बन सकती है। इसलिए समस्या देखकर खुद को छोटा मत समझिए। खुद से कहिए—“मैं अपनी समस्या से बड़ा हूँ। परिस्थिति कठिन हो सकती है, लेकिन मेरे भीतर सोचने की शक्ति है, सीखने की शक्ति है, प्रयास करने की शक्ति है और ईश्वर पर विश्वास रखने की शक्ति है।” और अंत में इस अध्याय की सबसे बड़ी सीख अपने मन में उतार लीजिए—“समस्या से भागना नहीं है, समस्या के सामने टूटना नहीं है और समस्या को अपनी पहचान नहीं बनाना है; समस्या को समझना है, उसे छोटे हिस्सों में बाँटना है, समाधान खोजना है और उससे पहले से अधिक मजबूत होकर बाहर निकलना है।” जब अगली बार जीवन पूछेगा—“क्या तुम इस कठिनाई के सामने टिक सकते हो?” तब आपका उत्तर होना चाहिए—“हाँ, मैं डर सकता हूँ, मैं कुछ समय के लिए गिर सकता हूँ, लेकिन मैं रुकूँगा नहीं। मैं सीखूँगा, उठूँगा, प्रयास करूँगा और रास्ता खोजूँगा।” यही सकारात्मक जीवन-दृष्टि है और यही इस पूरे अध्याय का संदेश है—कोई समस्या इतनी बड़ी नहीं कि उसे समझा, बाँटा, सीखा और अंततः सुलझाया न जा सके।
