क्या आपने कभी सोचा है कि आपका पूरा जीवन इसी क्षण में घट रहा है?
फिर भी आप इसी क्षण में नहीं जी रहे?
अभी इस समय जब आप मेरी आवाज सुन रहे हैं। आपका शरीर यहां है।
लेकिन क्या आपका मन भी यहां है?
शायद नहीं।
वह या तो बीते हुए कल में भटक रहा है या आने वाले कल की चिंता में खोया हुआ है और यही वह सबसे बड़ा रहस्य है जिसे अष्टावक्र गीता बार-बार उजागर करती है। मनुष्य का सबसे बड़ा दुख गरीबी नहीं है। असफलता नहीं है। अकेलापन भी नहीं है। उसका सबसे बड़ा दुख है वर्तमान क्षण से उसका बिछड़ जाना।
जरा अपने जीवन को देखिए। जब आप बच्चे थे तब जल्दी बड़े होना चाहते थे। जब बड़े हुए तब बचपन याद आने लगा जब पढ़ाई कर रहे थे तब नौकरी चाहिए थी जब नौकरी मिली तब छुट्टियां चाहिए थी जब अकेले थे तब साथी चाहिए था । जब साथी मिला तब अकेले रहने की इच्छा होने लगी यानी जीवन हमेशा वहीं था जहां आप नहीं थे क्या यह अजीब नहीं है जिस क्षण को आप जी रहे हैं उसी क्षण को आपका मन स्वीकार नहीं करता । वह हमेशा किसी और समय में भागता रहता है।
लेकिन क्या आपने कभी अपने मन से पूछा कि आखिर वह भाग क्यों रहा है? अष्टावक्र कहते हैं मन इसलिए भागता है क्योंकि उसे लगता है कि सुख कहीं और है। उसे लगता है कि यदि भविष्य बदल जाए तो मैं खुश हो जाऊंगा। यदि अतीत वैसा ना होता तो मैं शांत होता। लेकिन यह केवल भ्रम है और यही भ्रम मनुष्य को जन्मों तक भटकाता है।
कल्पना कीजिए आप समुद्र किनारे खड़े हैं। लहरें आ रही हैं। जा रही हैं। सूरज धीरे-धीरे डूब रहा है। हवा आपके चेहरे को छू रही है। लेकिन उसी समय आपका मन ऑफिस की किसी मीटिंग में उलझा है। किसी पुराने झगड़े को दोहरा रहा है या आने वाले कल की किसी चिंता में फंसा हुआ है।
अब बताइए क्या आपने सच में उस सुंदर सूर्यास्त को देखा?
नहीं।
आपकी आंखों ने देखा लेकिन आपने नहीं। क्योंकि देखने वाला मन वहां था ही नहीं। यही कारण है कि दुनिया की सबसे सुंदर चीजें भी हमें आनंद नहीं दे पाती। समस्या दुनिया में नहीं है। समस्या हमारे मन की अनुपस्थिति में है। और अष्टावक्र कहते हैं जिस दिन तुम वर्तमान में पूरी तरह उपस्थित हो जाओगे उसी दिन तुम्हारी खोज समाप्त हो जाएगी।
अब यहां एक बहुत बड़ा प्रश्न उठता है। यदि वर्तमान इतना शक्तिशाली है तो हमारा मन उससे भागता क्यों है?
यही प्रश्न राजा जनक ने भी अपने भीतर महसूस किया था। उनके पास सब कुछ था, राज्य था, धन था, शक्ति थी, सम्मान था। फिर भीतर एक खालीपन था और यही खालीपन उन्हें अष्टावक्र के चरणों तक ले गया।
क्यों? क्योंकि बाहर की हर उपलब्धि के बाद भी मन भविष्य में ही भागता रहा। यही हमारी कहानी भी है। हम सोचते हैं बस यह एक काम हो जाए। बस थोड़ा और पैसा आ जाए। बस यह समस्या खत्म हो जाए। फिर मैं शांति से जिऊंगा। लेकिन जैसे ही एक इच्छा पूरी होती है, दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है और वर्तमान फिर छूट जाता है।
क्या आपने कभी ध्यान दिया कि जब आप किसी लक्ष्य को पाने की कोशिश करते हैं तो मन कहता है बस यह मिल जाए। फिर आराम करूंगा। लेकिन जैसे ही वह मिल जाता है। मन कहता है अब अगला लक्ष्य यानी मन कभी संतुष्ट होने के लिए बना ही नहीं। वह केवल दौड़ने के लिए बना है और जब तक आप मन के पीछे भागते रहेंगे आप वर्तमान तक कभी नहीं पहुंच पाएंगे।
अष्टावक्र गीता का पहला और सबसे कठोर सत्य यही है। तुम मन नहीं हो। यह वाक्य सुनने में छोटा है। लेकिन यदि इसे समझ लिया जाए तो पूरा जीवन बदल सकता है।
सोचिए यदि आप मन नहीं है तो फिर वह कौन है जो मन के विचारों को देख रहा है। जब आपके भीतर क्रोध आता है तो आपको पता चलता है कि क्रोध आया है। जब दुख आता है तो आपको पता चलता है कि दुख आया है। यदि आपको पता चल रहा है तो जानने वाला कोई और है। वही आपका वास्तविक स्वरूप है। वही साक्षी है और साक्षी हमेशा वर्तमान में रहता है।
” अतीत केवल स्मृति है। भविष्य केवल कल्पना है।”
लेकिन साक्षी केवल अभी में है।
यही कारण है कि अष्टावक्र बार कहते हैं जो अभी में जाग गया। वही मुक्त हो गया। लेकिन रुकिए। यही सबसे बड़ा भ्रम शुरू होता है क्योंकि वर्तमान में जीना इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि आप भविष्य की योजना बनाना छोड़ दें या जीवन की जिम्मेदारियों से भाग जाए नहीं वर्तमान में जीने का अर्थ है काम भविष्य के लिए करो लेकिन मन वर्तमान में रखो योजना बनाओ लेकिन चिंता मत बनाओ कर्म करो लेकिन परिणाम में मत खो जाओ यही वह रहस्य है जिसे अगले भाग में अष्टावक्र एक ऐसे उदाहरण से समझाते हैं जो शायद आपकी पूरी सोच बदल देगा और जब आप उसे समझेंगे तो आपको महसूस होगा कि वर्षों से जिस शांति को आप बाहर खोज रहे थे वह हमेशा से आपके भीतर ही बैठी थी ।
तो अब सबसे बड़ा प्रश्न सामने आता है यदि वर्तमान ही जीवन है यदि इसी क्षण में शांति छिपी है तो फिर मन इस क्षण से भागता क्यों है?
अष्टावक्र कहते हैं क्योंकि मन का पूरा अस्तित्व ही समय पर टिका है। मन को जीवित रहने के लिए या तो अतीत चाहिए या भविष्य। वर्तमान में उसका कोई घर नहीं है। यही कारण है कि जैसे ही आप शांत बैठते हैं, मन तुरंत कोई पुरानी घटना उठा लाता है। कोई अपमान, कोई असफलता, कोई अधूरा रिश्ता या फिर भविष्य की कोई चिंता। आपने कभी गौर किया होगा कि जब सब कुछ ठीक चल रहा होता है तब भी मन कोई ना कोई समस्या ढूंढ लेता है। जैसे उसे शांति से डर लगता हो और सच भी यही है।
मन शांति से डरता है क्योंकि शांति में उसका अस्तित्व समाप्त होने लगता है। कल्पना कीजिए कि आपके हाथ में एक मशाल है। लेकिन आप उसे लेकर दिन के उजाले में खड़े हैं। उस समय उस मशाल का कोई महत्व नहीं रह जाता। उसी तरह वर्तमान क्षण सूर्य के प्रकाश जैसा है और मन उस छोटी सी मशाल की तरह जब आप पूरी तरह वर्तमान में आ जाते हैं तब मन की आवाज धीमी होने लगती है।
इसलिए मन आपको कभी वर्तमान में टिकने ही नहीं देता। वह लगातार आपको किसी ना किसी विचार में उलझाए रखता है। वह कहता है यह सोच लो वह कर लो। अगर ऐसा हो गया तो अगर वैसा हो गया तो और धीरे धीरे आप भूल जाते हैं कि जीवन विचारों में नहीं अनुभव में घट रहा है।
अष्टावक्र राजा जनक से कहते हैं राजन संसार ने तुम्हें नहीं बांधा है। तुम्हारे विचारों ने तुम्हें बांधा है। इस एक वाक्य में पूरी आध्यात्मिक क्रांति छिपी हुई है। हम जीवन भर लोगों को दोष देते हैं। परिस्थितियों को दोष देते हैं। किस्मत को दोष देते हैं। लेकिन कभी अपने विचारों को नहीं देखते।
सोचिए एक ही बारिश में कोई व्यक्ति नाच रहा होता है और दूसरा उसी बारिश को देखकर दुखी हो जाता है। बारिश तो दोनों के लिए एक जैसी है। फिर अंतर कहां है? अंतर बाहर नहीं भीतर है। अंतर घटना में नहीं घटना की व्याख्या में है। और यही व्याख्या मन करता है। मन हर घटना को अच्छा या बुरा नाम देता है। जबकि जीवन स्वयं किसी भी नाम से मुक्त है। यही कारण है कि अष्टावक्र बार कहते हैं साक्षी बनो।
साक्षी बनने का अर्थ है अपने विचारों से लड़ना नहीं। उन्हें रोकना नहीं। बल्कि उन्हें आते जाते देखना। जैसे आकाश बादलों से नहीं लड़ता। बादल आते हैं, बरसते हैं और चले जाते हैं। लेकिन आकाश वैसा का वैसा रहता है। उसी प्रकार आपका वास्तविक स्वरूप भी वैसा ही है। विचार आएंगे, भावनाएं आएंगी, क्रोध आएगा, भय आएगा। लेकिन यदि आप केवल देखने वाले बन जाए तो धीरे-धीरे आपको अनुभव होगा कि इनमें से कोई भी आप नहीं है। आप केवल उनके साक्षी हैं।
लेकिन यहां एक और गहरा भ्रम है जिसे समझे बिना कोई भी वर्तमान में नहीं जी सकता। हम सोचते हैं कि हमारी पहचान हमारे विचारों से बनती है। अगर मेरे विचार बदल गए तो मैं बदल जाऊंगा। लेकिन अष्टावक्र कहते हैं विचार बदलते रहते हैं। इसीलिए वे तुम नहीं हो सकते। बचपन में तुम्हारे विचार अलग थे। युवावस्था में अलग हो गए और वृद्धावस्था में फिर बदल जाएंगे। लेकिन जो इन सभी परिवर्तनों को देख रहा है, क्या वह बदला? नहीं। वही तुम्हारा वास्तविक अस्तित्व है। वही चेतना है, वही आत्मा है और वही हमेशा वर्तमान में रहती है।
जरा अपनी पूरी जिंदगी पर नजर डालिए। कितने लोग आए, कितने चले गए, कितनी चीजें मिली, कितनी छिन गई, कितनी बार आप हंसे, कितनी बार आप रोए? लेकिन इन सबके बीच एक चीज कभी नहीं बदली। वह है देखने वाला। जब आप 5 साल के थे तब भी वही देखने वाला था। आज भी वही है। शरीर बदल गया, चेहरा बदल गया। रिश्ते बदल गए लेकिन देखने वाला नहीं बदला। अष्टावक्र कहते हैं जिस दिन तुम इस देखने वाले को पहचान लोगे, उसी दिन वर्तमान तुम्हारा स्वभाव बन जाएगा। प्रयास नहीं। यही कारण है कि संसार की कोई भी उपलब्धि आपको स्थाई आनंद नहीं दे पाती। नई कार कुछ दिनों तक खुशी देती है। फिर सामान्य लगने लगती है। नया मोबाइल कुछ सप्ताह बाद पुराना लगने लगता है। प्रमोशन मिलता है। फिर अगली पदोन्नति की चाह पैदा हो जाती है। मन का नियम ही यही है जो मिल गया उसका मूल्य कम कर दो और जो नहीं मिला उसकी इच्छा बढ़ा दो। इसलिए मन के साथ चलने वाला व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। उसकी पूरी जिंदगी एक अंतहीन दौड़ बन जाती है। वह दौड़ता रहता है। लेकिन पहुंच कहीं नहीं पाता और शायद यही आपकी कहानी भी है। आपने बहुत कुछ पाया होगा। बहुत कुछ खोया भी होगा। लेकिन क्या कभी आपने अपने मन को ध्यान से देखा है? क्या वह आज भी वैसा ही नहीं है जैसा 10 साल पहले था। तब भी वह कहता था बस यह मिल जाए। और आज भी वही कह रहा है। अंतर केवल इच्छाओं का है। मन का स्वभाव नहीं बदला। इसलिए अष्टावक्र कहते हैं मन को संतुष्ट करने की कोशिश मत करो। उसे समझो क्योंकि जिसे समझ लिया जाता है उसका प्रभाव अपने आप समाप्त होने लगता है। लेकिन अब एक और रहस्य सामने आता है।
यदि मन ही समस्या है तो क्या मन को पूरी तरह समाप्त करना होगा?
क्या विचारों का अंत ही मुक्ति है?
या फिर अष्टावक्र कुछ और कहना चाहते हैं?
उनका उत्तर इतना आश्चर्यजनक है कि पहली बार सुनने पर विश्वास करना कठिन लगता है क्योंकि वे कहते हैं मुक्ति विचारों के समाप्त होने से नहीं बल्कि विचारों के साथ अपनी पहचान समाप्त होने से मिलती है और यही रहस्य अगले भाग में हम गहराई से समझेंगे
जहां अष्टावक्र बताएंगे कि कैसे बिना संसार छोड़े बिना जिम्मेदारियों से भागे एक व्यक्ति हर क्षण पूर्ण शांति में जी सकता है। यही वह बिंदु है जहां आध्यात्मिक ज्ञान केवल दर्शन नहीं रहता बल्कि जीने की कला बन जाता है। अब तक आपने समझ लिया कि मन वर्तमान में नहीं जी सकता क्योंकि उसका पूरा अस्तित्व अतीत और भविष्य पर टिका है। लेकिन अब अष्टावक्र एक ऐसा रहस्य प्रकट करते हैं जो सुनने में जितना सरल लगता है उतना ही गहरा है।
वे कहते हैं मुक्ति का अर्थ विचारों को समाप्त करना नहीं बल्कि यह जान लेना है कि तुम विचार नहीं हो। यही वह बिंदु है जहां अधिकांश साधक भटक जाते हैं।
वे सोचते हैं कि ध्यान का अर्थ है मन को पूरी तरह शांत कर देना। एक भी विचार ना आने देना। लेकिन जितना वे विचारों को रोकने की कोशिश करते हैं, विचार उतनी ही ताकत से लौटते हैं। जैसे किसी गेंद को पानी के भीतर दबाओ, वह और अधिक वेग से ऊपर आती है। मन के साथ भी यही होता है। जितना उससे लड़ोगे, वह उतना ही शक्तिशाली बनेगा। अष्टावक्र कहते हैं मन से युद्ध मत करो क्योंकि युद्ध में जीत कभी नहीं होती। केवल देखने की कला सीखो। कल्पना कीजिए कि आप एक नदी के किनारे बैठे हैं। नदी में लकड़ियां बह रही हैं। पत्ते बह रहे हैं। कभी फूल बह रहे हैं। कभी कचरा भी बह रहा है। क्या नदी किनारे बैठा व्यक्ति हर चीज को पकड़ने के लिए नदी में कूद जाता है? नहीं। वह केवल देखता है।
