एक बार एक व्यक्ति ने अपनी जिंदगी को पीछे मुड़कर देखा तो उसे महसूस हुआ कि उसकी सबसे बड़ी समस्या उसकी परीस्थिति नहीं थी , बल्कि उसका डर था । उसे असफल होने का डर था , लोगों की राय का डर था , भविष्य को लेकर चिंता थी , पैसे को लेकर चिंता थी और सबसे बड़ा डर यह था कि कहीं वह अपनी जिंदगी में वह न बन पाए जिसकी उसने कभी कल्पना की थी ।
बाहर से देखने पर उसकी जिंदगी सामान्य थी । लेकिन उसके भीतर हर दिन एक छोटा – सा संघर्ष चलता रहता – कुछ करने की इच्छा और असफल हो जाने के डर के बीच । वह कई बार किसी अवसर के सामने खड़ा होता लेकिन अंतिम शरण में पीछे हट जाता कोई नया काम शुरू करने का विचार आता तो मन कहता ” अगर असफल हो गया तो “? किसी के सामने अपनी बात रखने का अवसर मिलता तो भीतर से आवाज आती” लोग क्या सोचेंगे ‘ धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि डर हमेशा किसी वास्तविक खतरे से पैदा नहीं होता कई बार डर हमारे मन द्वारा भविष्य की बनाई हुई एक कहानी होता है ।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है की डर कोई ऐसी चीज नहीं जिसके साथ आपको पूरी जिंदगी जीना ही पड़े । क्रोध बदला जा सकता है , नफरत बदली जा सकती है , पूर्वाग्रह बदले जा सकते हैं और उसी तरह डर भी बदला जा सकता है । डर को बदलने की शुरुआत उसे क्षण होती हैं जब मनुष्य पहली बार स्वयं से कहता है ” मैं डर के अधीन होकर नहीं जाऊंगा “! यह छोटा सा निर्णय प्रत्येक बड़ी क्रांति की शुरुआत कर सकता है । हमें अक्सर लगता है कि अगर हमारे माता-पिता चिंतित हैं , अगर हमारे परिवार में हमेशा भविष्य को लेकर डर रहा , अगर अपने बचपन से असफलता को बहुत बड़ा खतरा माना तो शायद हमें भी ऐसा ही रहना पड़ेगा । लेकिन मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह अपने मानसिक संस्कारों को पहचान कर उन्हें बदल सकता है । आपका अतीत आपके व्यवहार को प्रभावित कर सकता है लेकिन वह आपके भविष्य का अंतिम निर्णय नहीं है
जब हम डर से भगाने के बजाय उसका सामना करते हैं , तो इस अनुभव से शक्ति ,साहस और आत्मविश्वास पैदा होता है । सोचिए , पहली बार जब कोई व्यक्ति मंच पर बोलने जाता है तो उसके हाथ काँप सकते हैं , आवाज अटक सकती हैं और मन में हजारों विचार आ सकते हैं । लेकिन अगर वह उसे डर के कारण मंच छोड़कर भाग जाए , तो अगले बार उसका डर और बड़ा हो जाएगा । इसके विपरीत अगर वह काँपते हुए भी मंच पर खड़ा हो जाए और अपनी बात पूरी कर दे , तो शायद उससे कोई महान उपलब्धि ना मिले लेकिन उसके भीतर एक महत्वपूर्ण विश्वास जन्म लेगा _____” मै डरते हुए भी आगे बढ़ सकता हूं।” यही साहस है । साहस का अर्थ डर का पूरी तरह समाप्त हो जाना नहीं है साहस का अर्थ है की डर मौजूद होने के बावजूद सही दिशा में कदम बढ़ाना।
इस बात को समझने के लिए एक बुड्ढे cowboy की कहानी बहुत गहरी सीख देती है।
उसने अपना पूरा जीवन मवेशियों के साथ बिताया था और उसने देखा था कि सर्दियों के भयंकर तूफ़ान किस तरह पशुओं की जान ले लेते थे। जब बर्फीली हवाएँ चलतीं, तापमान तेजी से गिरता और चारों ओर बर्फ का तूफ़ान छा जाता, तब कई मवेशी सहज रूप से हवा से बचने के लिए हवा की दिशा में चलना शुरू कर देते। वे तूफ़ान से बचने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ते जाते, लेकिन अंततः जब उनके सामने बाड़ आ जाती, तो वे उसी बाड़ से टिककर खड़े हो जाते और पीछे से आती बर्फीली हवा उन्हें कमजोर करती जाती। लेकिन उस काउबॉय ने देखा कि हियरफोर्ड गायें अलग तरह से व्यवहार करती थीं। वे तूफ़ान से भागती नहीं थीं। वे अपने शरीर को हवा की दिशा के विपरीत मोड़तीं, सिर झुकातीं और तूफ़ान का सामना करतीं। परिणाम यह होता कि तूफ़ान गुजर जाने के बाद वे अक्सर जीवित और सुरक्षित मिलतीं। उस बूढ़े काउबॉय ने जीवन का एक बड़ा सत्य समझ लिया—जीवन के तूफ़ानों से हमेशा भागना आपको सुरक्षित नहीं बनाता; कई बार तूफ़ान का सामना करना ही सुरक्षा का रास्ता बन जाता है।
हमारी जिंदगी में भी ऐसे ही तूफान आते हैं । कभी असफलता का तूफान आता है , कभी आर्थिक संकट आता है , कभी रिश्तो की समस्या का , कभी आलोचना का , कभी अकेलेपन का और कभी अपने ही मन के भीतर से डर उठता है । हमारा पहला स्वभाव होता है कि हम उसे बचे। हम काम टाल देते हैं , कठिन बातचीत से बचते हैं , नए अवसर को छोड़ देते हैं और अपने सपने को यह कहकर छोटा कर देते हैं कि ” अभी सही समय नहीं है “। लेकिन कई बार समस्या यह नहीं होती कि हमारे सामने तूफान बहुत बड़ा है समस्या यह होते हैं कि हमने जीवन पर तूफान से बचने की आदत बना ली है
एक व्यक्ति अपने जीवन में जिन चीज़ों से डरता है, उनमें से बहुत-सी चीज़ें कभी होती ही नहीं। हम अपने मन में भविष्य की ऐसी-ऐसी परिस्थितियाँ बना लेते हैं जो वास्तविकता में कभी सामने नहीं आतीं। और जिन कुछ कठिन परिस्थितियों का सामना वास्तव में करना पड़ता है, उनमें से भी अधिकांश को इंसान किसी न किसी तरह संभाल लेता है। जिस असफलता को कल हम जीवन का अंत समझ रहे थे, कुछ वर्षों बाद वही हमें एक महत्वपूर्ण अनुभव लग सकती है। जिस आलोचना से हमें बहुत डर लगता था, कुछ समय बाद वही महत्वहीन लगने लगती है। जिस समस्या के सामने आज हम टूटते हुए महसूस कर रहे हैं, वही कल हमारी शक्ति की कहानी बन सकती है। इसलिए डर के सामने सबसे पहला प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “अगर यह हुआ तो क्या होगा?” बल्कि यह होना चाहिए—“अगर यह हुआ भी, तो क्या मैं इसका सामना कर सकता हूँ?”
यहीं से साहस का जन्म होता है।
डर को नियंत्रित करने के लिए सबसे पहले अपने भीतर एक स्पष्ट संकल्प पैदा करना आवश्यक है। स्वयं से कहिए—“मैं चिंता और डर के नियंत्रण में अपनी ज़िंदगी नहीं जीना चाहता। मैं अपने मन को डर का गुलाम नहीं बनने दूँगा। मैं डर को पहचानूँगा, उसे समझूँगा और धीरे-धीरे उसका सामना करूँगा।” केवल शब्द बोलने से जीवन नहीं बदलता, लेकिन जब शब्द निर्णय बन जाते हैं और निर्णय व्यवहार में उतरता है, तब परिवर्तन शुरू होता है। आपको यह घोषणा अपने मन में बार-बार करनी होगी कि परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, मेरा जीवन मेरे डर से संचालित नहीं होगा।
लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण बात समझनी होगी—आप एक ही दिन में अपने सारे डर समाप्त नहीं कर सकते। इसलिए एक समय में एक डर पर काम कीजिए। एक कागज़ उठाइए और ईमानदारी से लिखिए कि आपको किन-किन चीज़ों से डर लगता है। असफलता? पैसे की कमी? लोगों की आलोचना? भविष्य? अकेलापन? नया काम शुरू करना? किसी से अपनी बात कहना? अपने सपने का पीछा करना? जब आप अपने डर को मन के अंधेरे कोने में छिपाकर रखते हैं, तो वह बहुत बड़ा दिखाई देता है। लेकिन जब आप उसे कागज़ पर लिख देते हैं, तो वह एक ऐसी समस्या बन जाता है जिसे देखा, समझा और धीरे-धीरे हल किया जा सकता है। फिर अपनी सूची में से सबसे बड़े या सबसे अधिक परेशान करने वाले डर को चुनिए और केवल उसी पर काम शुरू कीजिए।
“अपने डरों से कभी सलाह न लें।” कल्पना कीजिए कि कोई व्यक्ति किसी महत्वपूर्ण निर्णय के सामने खड़ा है। उसका मन कहता है, “मत करो, असफल हो जाओगे।” दूसरा विचार आता है, “लोग हँसेंगे।” तीसरा कहता है, “अगर नुकसान हो गया तो?” अगर वह हर निर्णय अपने डर से पूछकर लेगा, तो उसका डर हमेशा उसे सुरक्षित जगह पर ही रखेगा। लेकिन जीवन में विकास अक्सर उस सीमा के दूसरी तरफ होता है जहाँ हमारा डर हमें जाने से रोकता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर जोखिम उठा लेना चाहिए या बिना सोचे-समझे कोई निर्णय लेना चाहिए। बुद्धिमानी से जोखिम को समझना अलग बात है और केवल डर के कारण पीछे हट जाना अलग बात है।
जब आप एक डर को जीतते हैं, तो केवल एक समस्या हल नहीं होती—आपके भीतर आत्मविश्वास की एक नई परत बनती है। आज आपने लोगों के सामने बोलने का डर जीता, कल किसी कठिन व्यक्ति से बातचीत करने का साहस बढ़ेगा। आज आपने असफलता के बावजूद काम शुरू किया, कल बड़ा निर्णय लेने की क्षमता बढ़ेगी। आज आपने आलोचना को सहना सीखा, कल आप अपने लक्ष्य पर अधिक स्वतंत्रता से काम कर पाएँगे। इसी तरह छोटे-छोटे साहस मिलकर एक बड़े व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। जैसे एक योद्धा हर विजय के साथ अधिक अनुभवी और शक्तिशाली होता जाता है, वैसे ही मनुष्य भी हर जीते हुए डर के साथ मानसिक रूप से मजबूत होता जाता है।
और अंत में आती है आस्था। आस्था का अर्थ केवल धार्मिक विश्वास नहीं है; आस्था का अर्थ है यह गहरा विश्वास कि जीवन की कठिनाइयों से बड़ा आपके भीतर का साहस है। जब मन डर से भर जाए, तब अपने जीवन के महान मूल्यों को बार-बार याद करना चाहिए। धर्मग्रंथों के प्रेरणादायक वचनों को पढ़िए, प्रार्थना कीजिए, ध्यान कीजिए और स्वयं को याद दिलाइए कि आप केवल अपनी वर्तमान परिस्थिति नहीं हैं। कठिन समय स्थायी नहीं होता। तूफ़ान हमेशा नहीं चलता। रात हमेशा नहीं रहती। लेकिन उस तूफ़ान के बीच आपका चरित्र बनता है।
इसलिए अगली बार जब जीवन आपके सामने कोई कठिन परिस्थिति लेकर आए, तो तुरंत पीछे मत हटिए। कुछ क्षण रुकिए, गहरी साँस लीजिए और स्वयं से पूछिए—“क्या मैं वास्तव में खतरे में हूँ, या मेरा मन मुझे डरा रहा है?” फिर जो उचित और आवश्यक हो, वह कदम उठाइए। शायद आपके हाथ काँपें, शायद मन में डर हो, शायद रास्ता साफ दिखाई न दे—फिर भी एक कदम आगे बढ़ाइए। क्योंकि साहस का अर्थ यह नहीं कि आपके भीतर डर नहीं है। साहस का अर्थ है कि डर आपके भीतर है, लेकिन निर्णय आपके हाथ में है।
जीवन में तूफ़ान आएँगे। असफलताएँ आएँगी। आलोचनाएँ आएँगी। कभी परिस्थितियाँ आपके विरुद्ध होंगी। लेकिन आपको तय करना है कि आप हवा के साथ बहेंगे या तूफ़ान के सामने खड़े होंगे। उस हियरफोर्ड गाय की तरह सिर झुकाकर तूफ़ान का सामना कीजिए। हर डर को एक-एक करके पहचानिए, उसका सामना कीजिए और उसे अपने जीवन का मालिक मत बनने दीजिए। क्योंकि जिस दिन इंसान अपने डर को पैरों के नीचे रखकर आगे बढ़ना सीख जाता है, उसी दिन उसके भीतर एक नया इंसान जन्म लेता है—साहसी इंसान।
” मै अपने डर से भागूंगा नहीं। मै अपने डर को पहचानूंगा, समझूंगा और एक एक करके उस पर विजय प्राप्त करूंगा। परिस्थितिय मेरे जीवन का निर्णय नहीं करेगी। मेरा निर्णय, मेरा साहस और मेरी आस्था मेरे जीवन की दिशा तय करेंगे। मै डर का गुलाम नहीं हूं – मैं अपने जीवन का स्वामी हूं। “
