ब्रह्मचर्य:- जीवन का सार और शक्ति का रहस्य | Day 35/ 180 days challenge transformation yourself

” ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत | “

वैदिक ऋषियों ने ब्रह्मचर्य को केवल एक नियम नहीं बल्कि ऐसी साधना माना है जो मनुष्य को आत्मबल धैर्य और उच्च जीवन की ओर ले जाती है। ”

कल्पना कीजिए कि  आपके सामने दो व्यक्ति खड़े हैं । दोनों की आयु समान है ,  दोनों ने एक जैसी शिक्षा प्राप्त किया और दोनों के पास समान अवसर है ।  फिर भी वर्षों बाद यह व्यक्ति अपने तेज आत्मविश्वास अनुशासन और नेतृत्व कारण हजार लोगों के लिए प्रेरणा बन जाता है । जबकि दूसरा व्यक्ति छोटी-छोटी आदतें इच्छाओं और असंयम का दास बनकर अपने ही जीवन में हार जाता है । यह अंतर कहां से आता है ? , केवल प्रतिभा से नहीं केवल भाग्य से नहीं बल्कि उसे अदृश्य शक्ति से जिसे हमारे ऋषियों मुनियों ने ब्रह्मचर्य कहा है।

प्राचीन भारत में ब्रह्मचर्य को जीवन का सार माना गया ।  जैसे दूध का सार घी है , तिल का सार तेल है ,  और गाने का सार रस  है ,  उसी प्रकार मनुष्य के जीवन का कर उसका संयम उसका ओज और उसका चरित्र है ।  यह उपमा केवल शरीर के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण व्यक्ति तत्व के लिए जब मनुष्य अपने ऊर्जा को व्यर्थ के आकर्षणों में नहीं बहता है । तब वही ऊर्जा उसकी बुद्धि को तीक्ष्ण उसके संकल्प को अटल और उसके व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाते हैं

आज के युग में लोग अपने सबसे मूल्यवान वस्तु की रक्षा करते हैं ।  कोई अपने बैंक खाते की सुरक्षा करता है । कोई अपने मोबाइल को पासवर्ड से सुरक्षित रखता है , कोई अपने महंगे आभूषणों को तिजोरी में रखता है ।  लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी जीवन ऊर्जा अपने समय अपने ज्ञान और अपने चरित्र की भी उतनी ही रक्षा करते हैं  ? यदि किसी व्यक्ति की एकाग्रता ही समाप्त हो जाए उसक मन हर समय भटकता रहेगा और उसका लक्ष्य धुंधला पड़ जाएगा तो  बाहरी संपत्ति भी उसे स्थाई सफलता नहीं दे सकती

प्राचीन गुरुकुलों में विद्यार्थियों का सबसे पहले आत्म संयम सिखाया जाता था  । कारण स्पष्ट जिस व्यक्ति को मन उसके नियंत्रण में नहीं है पर किसी भी महान कार्य को पूरा नहीं कर सकता ।  इसलिए भारत के शिक्षा केवल जानकारी देने पर सीमित नहीं थ और चरित्र का निर्माण भी करते थे ।  इस चरित्र ने भीष्म को अडिग बनाया हनुमान को महाबली बनाया ,  गार्गी को महान विदुषी बनाया और स्वामी विवेकानंद को विश्व मंच पर भारत की आत्मा का प्रतिनिधि बनाया 

आज भी सिद्धांत नहीं बदला है, केवल चुनौतियां बदल गई है ।  पहले मनुष्य को जंगल के विकर्षणों से लड़ना पड़ता था , आज उसे मोबाइल स्क्रीन अनंत video  , मनोरंजन और क्षीणक सुख की आदतों से लड़ना पड़ता है । पहले बहरी शत्रु अधिक थे, आज सबसे बड़ा शत्रु हमारे भीतर का असंयम है। जिसने इस शत्रु को जीत लिया ,  उसके लिए जीवन के बड़े युद्ध जीतना आसान हो जाता है ।

ब्रह्मचर्य का अर्थ जीवन के आनंद से दूर भागना नहीं है । इसका अर्थ है कि छोटे सुखों का त्याग करके बड़े उद्देश्य को चुना । यह अपने मन को दबाना नहीं , बल्कि उसे प्रशिक्षित करना है ।  जैसे एक खिलाड़ी वर्षों तक कठोर अभ्यास करता है ताकि एक दिन विश्व विजेता बन सके ,  वैसे ही आत्म संयम का अभ्यास मनुष्य को भीतर से इतना मजबूत बना देता है की परिस्थितियों उसे डिगा नहीं पाती ।

इतिहास में भीष्म पितामह महर्षि दयानंद हनुमान और अनेक महापुरुषों के जीवन को आत्म संयम और तपस्या का प्रतीक माना गया ।  इन कथाओं का उद्देश्य केवल चमत्कार दिखाना नहीं बल्कि यह संदेश देना है कि जब मनुष्य अपने चरित्र को सर्वोच्च स्थान देता है , तब उसमें असाधारण साहस , धैर्य और कर्तव्य निष्ठा विकसित होती है।

आज दुनिया को केवल बुद्धिमानी लोगों का आवश्यकता नहीं है । दुनिया को ऐसे लोगों की आवश्यकता है जिनका चरित्र मजबूत हो जिनके मन स्थिर हो और जिनके जीवन किसी उच्च उद्देश्य के लिए समर्पित हो । धन, प्रसिद्धि और शक्ति समय के साथ बदल सकते हैं ,  लेकिन चरित्र  वह संपत्ति है जो मनुष्य को हर परिस्थिति में महान बनाती हैं ।

“मैं अपने समय, ध्यान, ऊर्जा और चरित्र को अपनी सबसे बड़ी संपत्ति मानता हूँ। मैं उन्हें व्यर्थ नहीं गँवाऊँगा। मैं प्रतिदिन आत्मसंयम का अभ्यास कर अपने भीतर के तेज, साहस और महानता को जागृत करूँगा।”

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