अष्टावक्र गीता – अध्याय 11 (ज्ञानाष्टक) –

यह अध्याय ज्ञानाष्टक कहलाता है। इसमें अष्टावक्र मुनि राजा जनक को बताते हैं कि मन की वास्तविक शांति बाहर की परिस्थितियाँ बदलने से नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने से मिलती है। यह पहला श्लोक पूरे अध्याय की नींव है।


बेचैनी को लेकर वे अष्टावक्र मुनि के पास पहुँचते हैं। अष्टावक्र मुस्कुराते हैं। वे जनक के चेहरे को देखते हैं और बिना कुछ पूछे ही कहते हैं—”जनक, तुम्हारी समस्या संसार नहीं है, तुम्हारी समस्या यह है कि तुम स्वयं को संसार के बदलते हुए दृश्यों से जोड़ बैठे हो।”
फिर वे पहला श्लोक कहते हैं—


भावाभावविकारश्च स्वभावदिति निश्चयी।
निर्विकारी गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥”

कल्पना कीजिए कि राजा जनक एक दिन अष्टावक्र के सामने बैठे हैं |  राजमहल हैं , वैभव है ,  सम्मान है , लेकिन भीतर एक प्रश्न बार-बार उठ रहा है – ” यदि मैं आत्मा हूं , तो फिर मेरे भीतर इतने विचार ,  इतनी इच्छाएं , इतना दुख और इतनी बेचैनी क्यों उठाती है ?  कभी मन प्रसन्न हो जाता है , कभी बिना कारण उदास हो जाता है  । कभी किसी की प्रशंसा से अहंकार बढ़ जाता है ,  और कभी किसी की निंदा से मन टूट जाता है  । जनक सोचते हैं कि यही यदि यही मेरा स्वरूप है ,  तो मैं कभी भी स्थिर नहीं रह सकता

अष्टावक्र मुस्कुराते हैं और कहते हैं  – ” राजन ,  यही तुम्हारा सबसे बड़ा भ्रम है । जो बदल रहा है वह तुम नहीं हो । जो आता – जाता है ,  वह तुम्हारा स्वभाव नहीं है ।

वे समझते हैं कि भाव का अर्थ है किसी वस्तु , विचार , व्यक्ति या परिस्थिति का उपस्थित होना ,  और अभाव का अर्थ है कि उसका ना रहना ।

जब धन मिलता है तो खुशी होती है , जब चला जाता है तो दुख होता है । जब प्रिय व्यक्ति साथ होता है तो आनंद होता है जब दूर चला जाता है तो शौक होता है ।  यही भाव और अभाव है इनसे जो मानसिक परिवर्तन उत्पन्न होता है – खुशी , क्रोध ,  भय , मोह , ईर्ष्या , आशा और निराशा  – उन्हें विकार कहा गया है । अष्टावक्र कहते हैं कि यह सभी परिवर्तन केवल प्रकृति माया और मन के स्तर पर होते हैं आत्मा में इनमें से कुछ भी नहीं होता है ।

फिर  जनक के मन में गहरा प्रश्न उठता है  – ” यदि आत्मा कुछ नहीं करती है,  तो यह संसार चलता कैसे है? यह शरीर कैसे कार्य करता है  ? यह मन कैसे सोचता है ?

अष्टावक्र एक सुंदर उदाहरण देते हैं । वह कहते हैं कि _ ”  राजन क्या तुमने कभी चुंबक और लोहे को देखा है? चुंबक स्वयं दौड़ता नहीं , लेकिन उसकी उपस्थिति से लोहा चलने लगता है । उसी प्रकार आत्मा स्वयं कुछ नहीं करती , फिर भी उसकी चेतना की उपस्थिति से मन बुद्धि शरीर और माया कार्य करने लगते है

एक और उदाहरण देते हुए वे कहते हैं – ”  कि शरीर में नाखून और बाल उगते रहते हैं  , लेकिन क्या आत्मा के भीतर नाखून उगते हैं ?  नहीं ।  शरीर बदलता है आत्मा नहीं  । शरीर जन्म लेता है बढ़ता है बूढ़ा होता है और नष्ट हो जाता है लेकिन आत्मा ना जन्म लेती है न मरती है।

संसार में जो कुछ बदल रहा है ,  वह प्रकृति का खेल है ।  मन का बदलना , भावनाओं का उठाना – गिरना , सफलता और असफलता , लाभ और हानि – यह सब माया के क्षेत्र में गठित हो रहा है ।

आत्मा केवल साक्षी है जैसे आकाश में बादल आते जाते रहते हैं , लेकिन आकाश भीगता नहीं है , वैसे ही मन में विचार आते जाते रहते हैं , लेकिन आत्मा कभी प्रभावित नहीं होती ।

अष्टावक्र कहते हैं कि जिस दिन यह निश्चित दृढ़ हो जाएगा कि ”  मैं मन नहीं हूं , मैं शरीर नहीं हूं , मैं भावनाएं नहीं हूं ,  मैं तो शुद्ध निरीकर नित्य साक्षी आत्मा हूं। ” उसी दिन जीवन का सबसे बड़ा बोझ उतर जाएगा ।  फिर शांति पाने के लिए जंगल भागने की आवश्यकता नहीं होगी , कठिन तपस्या की आवश्यकता नहीं होगी।   संसार छोड़ने की आवश्यकता नहीं होगी । शांति प्रयास से नहीं सही पहचान से मिलेगी।

इस स्लोक का सार यही है कि दुख इसलिए नहीं है क्योंकि संसार बदलता है दुख इसलिए है क्योंकि हम स्वयं को बदलने वाली वस्तु के साथ जोड़ लेते हैं। 

जिस क्षण यह पहचान हो जाते हैं कि परिवर्तन प्रकृति का स्वभाव और मैं शुद्ध निर्विकार साक्षी हूं ।  इस क्षण क्लेश समाप्त होने लगता है । तब शांति किसी साधना का परिणाम नहीं रहती बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप में विश्राम बन जाती है यही अष्टावक्र ज्ञान है यही ज्ञानअष्टक का आरंभ है । और यही आत्मज्ञान की पहली सीढ़ी है

ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते॥

यह श्लोक अष्टावक्र गीता के सबसे गहन अद्वैत सिद्धांतों में से एक है। यहाँ अष्टावक्र केवल ईश्वर की चर्चा नहीं कर रहे, बल्कि जीव, ईश्वर और ब्रह्म के रहस्य को खोल रहे हैं। प्रश्न और उत्तर के माध्यम से वे जनक की हर शंका मिटाते हैं।

राजा जनक पहले श्लोक को सुन चुके थे । उन्हें समझ में आ गए हैं की आत्मा निर्विकार हैं और संसार के सारे परिवर्तन माया के स्तर पर होते हैं । लेकिन अब उनके मन में एक नई जिज्ञासा उठी ।उन्होंने विनम्रता से अष्टावक्र से पूछा कि – ” गुरुदेव , यदि आत्मा कुछ नहीं करती तो फिर यह विराट संसार किसने बनाया यह पृथ्वी,  आकाश , पर्वत , नदियां शरीर , मन और अनगिनत्  जीव कहां से आय?

क्या इन्हें जीव बनाता है या ईश्वर ?

यदि सबका आधार चेतना है , तो फिर जीव और ईश्वर में अंतर क्या है ? “

अष्टावक्र मुस्कुराए वे जानते थे कि जब तक यह भ्रम दूर नहीं होगा , तब तक आत्मज्ञान अधूरा रहेगा ।  उन्होंने कहा _” राजन इस संपूर्ण जगत का कारण ईश्वर है।  जीव नहीं  । लेकिन इस उत्तर को केवल शब्दों में मत समझो , इसके पीछे रहस्य को समझो । ” 

उन्होंने समझाया कि जैसे एक विशाल सूर्य पूरे संसार को प्रकाश देता है और इस सूर्य का प्रतिबिंब हजारों तालाब में अलग-अलग दिखाई देता है वैसे ही  एक ही शुद्ध चेतना विभिन्न उपाधियों के कारण अलग-अलग प्रतीत होता है । सूर्य एक है , लेकिन प्रतिबिंब अनेक दिखाई देते हैं । 

क्या वास्तव में हजारों सूर्य है नहीं उसकी प्रकार चेतना एक है लेकिन जीव अनेक दिखाई देते हैं ।

जनक ने पूछा _ “तो क्या जीव और ईश्वर दो अलग-अलग चेतनाएं हैं” ?

अष्टावक्र बोले _ “नहीं राजन । वास्तव में चेतना कभी दो नहीं होती।  भेद केवल उपाधि का है।  ”

फिर उन्होंने एक अत्यंत सुंदर उदाहरण दिया । कल्पना करो कि एक ही आकाश है ।  अब इस आकाश में 100 घड़ों रख दिया जाए । हर घड़ों के भीतर का आकाश अलग दिखाई देगा ।  कोई कहेगा _ यह इस घड़े का आकाश है , यह दूसरे घड़े का आकाश है ।  लेकिन क्या वास्तव में आकाश टुकड़ों में बट गया ? नहीं । घड़ा टूटा नहीं की” घटकाश” फिर महाकाश ही है . ठीक इसी प्रकार शरीर और मन केवल घड़े हैं उनके कारण एक ही चेतना अनेक जीवों के रूप में दिखाई देती हैं ।

इसके बाद अष्टावक्र ईश्वर और जीव का अंतर स्पष्ट करते हैं ।  वह कहते हैं कि जब वही शुद्ध चेतना माया में प्रतिबिंब होती है ,  तब उसे ईश्वर कहा जाता है ।  और जब वही चेतन किसी एक व्यक्ति के मन और अंतकरण में प्रतिबिंब होती है तब उसे जीव कहा  जाता है ।

इसका अर्थ यह नहीं की दो चेतनाएं हैं ।  जैसे ही एक ही सूर्य पूरे आकाश में है और वही एक छोटी से जलकुंड में भी दिखाई देता है , वैसे ही एक ही ब्रह्मा माया में ईश्वर और अंतकरण में जीव के रूप में अनुभव होता है ।

जनक ने फिर पूछा – ” यदि ईश्वर सबका निर्माता है तो क्या वह वास्तव में सब कुछ करताहै?

अष्टावक्र ने कहा -”  व्यवहार की दृष्टि से लोग ईश्वर को सृष्टि का कर्ता कहते हैं लेकिन परमार्थ की दृष्टि से ईश्वर भी अकर्ता है ।

यह सुनकर जनक चकित रह गए।

अष्टावक ने समझाया कि _ जैसे चुंबक से कुछ नहीं करता,  फिर भी उसकी उपस्थिति से लोहा चलने लगता है ।  वैसे ही ईश्वर की सत्ता से प्रकृति कार्य करती है ईश्वर से स्वयं कर्म नहीं करता । माया उसकी शक्ति है , और इस शक्ति के माध्यम से यह संपूर्ण जगत चलता हुआ दिखाई देता है ।

इसलिए कर्तापन भी केवल व्यावहारिक सत्य है अंतिम सत्य नहीं  ।

फिर उन्होंने जीव की स्थिति बताई । जीव स्वयं को शरीर मान लेता है ।  इसलिए वह कहता है _ ” मैं किया , मैं सफल हुआ ,  मैं असफल हो गया ,  मेरा परिवार मेरी संपत्ति मेरा सम्मान ! यही अहंकार उसे बांध देता है ।  जबकि वास्तव यह है की आत्मा ना कभी करती है ना बंधती है ।

इसके बाद अष्टावक्र तीन प्रकार की चेतना का वर्णन करते हैं

* पहली विषय चेतना – जब चेतना किसी वस्तु जैसे घट  ,  वृक्ष या शरीर के साथ जुड़ी हुई प्रतीत होती है उसे विषय चेतना कहा जाता है ।

दूसरी – प्रमाण चेतना। जब मन किसी वस्तु को जानने के सक्रिय होता है और ज्ञान की प्रक्रिया चलती है तब चेतन प्रमाण के रूप में प्रकट होता है

तीसरी –प्रमाता  चेतना। जब व्यक्ति कहता है ,_ ”  मैं जान रहा हूं , तब वही चेतन जानने वाले के रूप में दिखाई देता है

लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि यह तीनों भेद वास्तविक नहीं है . यह केवल मन और उपाधि के कारण दिखाई देते हैं ।  जैसे एक ही बिजली से पंखा घूमता है,  बल्ब जलता है और फ्रिज ठंडा करता है वैसे ही एक ही चेतना विभिन्न माध्यमों  में अलग-अलग कार्य करती हुई प्रतीत होती है ।

अब अष्टावक्र श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण संदेश देते हैं वह कहते हैं कि जिस मनुष्य को यह दृढ़ निश्चित हो जाता है इस संपूर्ण जगत का आधार एक ही परमचेतन है

आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी ।

तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति ॥ ३ ॥

इस श्लोक जीवन के सबसे कठिन प्रश्नों का उत्तर देता है -” अच्छे लोगों के साथ बुरा क्यों होता है ? ईश्वर यदि न्यायकारी है तो दुख क्यों है ? क्या सब भाग्य है या कर्म ?” 

अष्टावक्र इन प्रश्नों का उत्तर केवल तर्क से नहीं बल्कि आत्म ज्ञान के प्रकाश में देते हैं

राजा जनक के मन में अभी भी एक गहरी शंका थी । उन्होंने अष्टावक्र से पूछा_ “ गुरुदेव यदि ईश्वर ही इस संसार का आधार है तो फिर संसार में इतना भेदभाव क्यों दिखाई देता है ? कोई जन्म से ही धनी है कोई , अत्यंत निर्धन ।कोई स्वस्थ शरीर लेकर जन्म लेता है ,  कोई जन्म से ही रोगों से गिरा होता है ,  कोई बिना अधिक प्रयास के सफलता प्राप्त कर लेता है तो कोई जीवन भर संघर्ष करता रहता है ।

  यदि सब ईश्वर की इच्छा से हो रहा है तो क्या ईश्वर पक्ष पाती हैं ?  ।

  क्या उसे किसी से अधिक प्रेम है और किसी से कम ?

अष्टावक्र शांत स्वर में बोले –  ” राजन यह प्रश्न हर युग में मनुष्य को परेशान करता रहता है । लेकिन इसका उत्तर तभी मिलेगा जब तुम ईश्वर ,  कर्म और जीवन के संबंध को सही प्रकार से समझोगे। ”

उन्होंने कहां – ” ईश्वर किसी को दुखी या सुखी बनाने के लिए बैठा हुआ शासक नहीं है इस बार ना किसी को पाप करने के लिए मजबूर करता है या ना किसी को पुण्य करने के लिए । वह केवल चेतना का आधार है।”

फिर उन्होंने भगवद्गीता का सिद्धांत स्मरण कराया—


‘न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥’

अर्थात ईश्वर न किसी का कर्तापन बनता है ,  ना कर्म करवाता है और ना ही मनमर्जी से कर्मों का फल बनता है । जीव अपने संस्कारों और कर्मों के अनुसार फल प्राप्त करता है ।

जनक ने फिर पूछा लेकिन – ”  गुरुदेव कर्म तो जड़ है । जड़ कर्म अपने आप फल कैसे देगा ? और जीव भीस्वयं फल बांटने में समर्थ नहीं है तो फल कौन देता है ?

अष्टावक ने एक अत्यंत उदाहरण दिया है  – ” उन्होंने कहां कल्पना करो कि !  एक किसान है ,  अलग-अलग खेतों में अलग-अलग खेत में गेहूं ,  दूसरे में चना , तीसरे में मटर  ,।। फिर वर्षा हुई वर्षा ने किसी खेत से भेदभाव नहीं किया । पानी सब पर समान रूप से बरसा लेकिन जहां गेहूं का बीज था वह होगा जहां जाना था  । वहां चना और जहां कुछ भी नहीं बोया गया वहां कुछ भी नहीं होगा ।

फिर उन्होंने कहा इस उदाहरण में वर्षा ईश्वर है  , खेत जीव का अंत: करण है और बीज उसके संचित कर्म है । ईश्वर सब पर समान रूप से अपनी सत्ता प्रदान करता है।  लेकिन फल वही मिलता है जो कर्म का बीज पहले से बोया गया है ।”

यही कारण है कि एक ही परिवार में जन्म लेने वाले दो भाई भी अलग-अलग जीवन जीते हैं । एक का स्वभाव शांत होता है ,  दूसरा क्रोधी । एक समृद्ध होता है दूसरा संघर्ष करता है।  इसका कारण ईश्वर का पक्षपात नहीं बल्कि कर्मों का भिन्न-भिन्न बीज।है ।

जनक ने पूछा _  यदि ईश्वर न्यायकारी है तो उसे लोग उसे दयाल क्यों कहते हैं ? ”

अष्टावक्र बोले _” यह प्रश्न भी बड़ा सूक्ष्म है । “

उन्होंने कहां की यदि न्याय पूर्ण होगा तो दया सीमित हो जाएगी और यदि केवल दया होगी तो न्याय समाप्त हो जाएगा  । सोचो यदि कोई राजा हत्यारे को केवल दया के कारण छोड़ दे तो निर्दोष के साथ न्याय कैसे होगा ? 

उसी प्रकार यदि  ईश्वर बिना कर्म का फल दिए सबको क्षमा कर देंगे , तो कर्म का नियम ही समाप्त हो जाएगा। ”

फिर उन्होंने एक और रहस्य बताया ।  उन्होंने कहा -” भक्त जब ईश्वर को दयालु कृपालु और करुणामय कहते हैं , तो उसका उद्देश्य ईश्वर में दोष या गुण सिद्ध करना नहीं होता । भक्ति में मन प्रेम चाहता है ।  इसलिए भक्त ईश्वर में करुणा ,  प्रेम और वात्सल्य का अनुभव करता है यह भावना मन को शुद्ध करती हैं । और अंत: इस मन को आत्मज्ञान की योग्य बनाती है ।  परमार्थ की दृष्टि से ईश्वर गुणों से परे हैं ,  गुण तो माया के क्षेत्र में है :।

अब अष्टावक्र श्लोक का वास्तविक संदेश देते हैं।

वे कहते हैं कि -” जिस मनुष्य दृढ़ विश्वास हो जाता है कि जीवन में आने वाले आपत्तियां और संपत्ति आए उचित समय पर पारब्ध कर्मों के अनुसार आती हैं वह भीतर से संतोष रहने लगता है । इसका अर्थ यह नहीं है कि वह कर्म करना छोड़ देता है या आलसी बन जाता है ,  वह पूरी निष्ठा से कर्म करता है लेकिन फल आने पर अहंकार नहीं करता और विपति आने पर टूटता नहीं ।

यही कारण है – की श्लोक में कहा गया – तृप्त: अर्थात जो भीतर से संतुष्ट हैं। स्वस्थेन्द्रियः” अर्थात् जिसकी इंद्रियाँ उसके वश में हैं, वह विषयों का दास नहीं है। “न वाञ्छति” अर्थात् जो हर समय नई-नई इच्छाओं के पीछे नहीं भागता। “न शोचति” अर्थात् जो खोई हुई वस्तुओं के लिए निरंतर शोक नहीं करता।

आज के समय में यह शिक्षा उतनी ही प्रासंगिक है । किसी का व्यवसाय अचानक सफल हो जाता है और कोई वर्षों की मेहनत के बाद भी संघर्ष करता है ।  कोई छोटी आय में भी प्रसन्न रहता है कोई अपार धन होने पर भी बेचैन रहता है ।

अष्टावक्र कहते हैं कि सुखद धन में नहीं , दृष्टि में है । जो हर घटना को कर्म के नियम का परिणाम समझकर स्वीकार करता है और भीतर से शांत रहता है । उसका मन इच्छाएं और पछतावों से बीच नहीं झूलता।

सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी।
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥4

प्रश्न _: पूर्वोक्त निश्चय करने वाले ज्ञानी भी तो कर्म करते हुए दिखाई देते हैं । क्या उन्हें भी कर्मों का फल मिलता है



उतर – अष्टावक्र  कहते हैं कि यथार्थ आत्मज्ञान प्राप्त ज्ञानी को कर्मों का बंधन नहीं होता है क्योंकि

1. वह फल की इच्छा से कर्म नहीं करता । इसका उद्देश्य केवल कर्तव्य होता है लाभ हानि नहीं
2. वह श्रेष्ठ आचरण के लिए कर्म करता है उसका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है

3. वह जानता है कि कर्म शरीर और इंद्रियों के हैं , आत्मा के नहीं । आत्मा ना करती है ना भोगती हैं वह केवल साक्षी है ।

4. उसमें अहंकार नहीं रहता । वह “मै करता हूं ” ऐसा नहीं मानता।

इन्हीं चार कारणों कर्म से कम करते हुए भी वह कर्म के फल से नहीं बाँधता।

इसी बात को भगवद्गीता में भी कहा गया है—

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥”


अर्थात जिस व्यक्ति में  ” मैं कर्ता हूं” का अहंकार नहीं है और जिसकी बुद्धि कर्मों में लिप्त नहीं होती , वह यदि पारब्धवश बड़े से बड़ा कर्म भी कर दे , तब भी कर्म उसे बांध नहीं पाते

अतः जो यह दृढ़ निश्चित कर लेता है सुख  दुख जन्म मृत्यु और जीवन की घटनाएं प्रारब्ध के अनुसार होती है और बिना मानसिक तनाव के अपना कर्तव्य करता है वह कर्म करता है पर कर्म फल में आसक्त नहीं होता इसलिए कर्म करते हुए भी कर्म से लिप्त नहीं होता ।

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेह इति निश्चयी।
तथा हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः ॥ ५ ॥

अष्टावक्र कहते हैं—इस संसार में दुःख का मूल कारण चिंता है। जो व्यक्ति यह दृढ़ता से समझ लेता है कि चिंता के कारण ही मन दुःख पैदा करता है, वह धीरे-धीरे चिंता का त्याग कर देता है। फिर उसका मन शांत और सुखी हो जाता है तथा संसार की वस्तुओं के प्रति उसकी तृष्णा समाप्त होने लगती है।

प्रश्न – कर्म करते हुए मनुष्य को दुख क्यों होता है?

उतर – केवल कर्म करने से दुख नहीं होता,  बल्कि कर्म के परिणाम की चिंता करने से दुख उत्पन्न होता है । ” क्या होगा “? ” मुझे क्या मिलेगा ?” ” अगर मैं असफल हो गया तो?” ” जो मेरे पास है वह चला गया तो ? ऐसी चिंताएं मन को अशांत करती हैं ।  जो व्यक्ति यह समझ जाता है की चिंता ही दुख का कारण है।  वह परिणाम की अत्यधिक चिंता और इच्छाओं को छोड़कर शांत रहता है।

एक किसान बीज बोता है उसका काम खेत तैयार करना और बीज बोना है ।  लेकिन यदि वह हर घंटे मिट्टी खोदकर यह देखने लगे की बीज अंकुरित हुआ या नहीं ,  तो उसकी चिंता ही उसकी परेशानी बन जाएगी । कर्म करना उसके हाथ में है , लेकिन परिणाम को लगातार चिंता करना उसके दुख का कारण

चिंता छोड़ो, कर्म मत छोड़ो। इच्छा और परिणाम की पकड़ जितनी कम होगी , मन उतना ही शांत और सुखी होगा।”

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ६॥

जिस ज्ञानी को यह दृढ़ निश्चय हो गया कि ”  मैं शरीर नहीं हूं यह शरीर मेरा भी नहीं है मैं शुद्ध चेतना हूं ” वह जीव मुक्त अवस्था को प्राप्त हो जाता है ।  उसके भीतर में और मेरा का भाव समाप्त हो जाता है इसलिए वह अपने किए या न किए हुए कर्मों को लेकर लगातार सोचता या पछताते नहीं रहता

प्रश्न –  ज्ञानी कर्मों से कैसे मुक्त हो जाता है?

उतर – क्योंकि ज्ञानी अपने आप को शरीर मन और कर्मों का कर्ता नहीं मानता ।  वह जानता है कि शरीर कर्म करता है , इंद्रियां अपने विषय में कार्य करती हैं लेकिन मेरा वास्तविक स्वरूप शुद्ध चेतना है।  इसलिए उसके भीतर मैंने यह किया मैंने यह नहीं किया मेरे साथ यह हुआ जैसे कर्तापन और ममता की भावना धीरे-धीरे समाप्त हो जातीहैं

अब इस श्लोक की कहानी समझिये

अष्टावक्र इस बात को समझने के लिए बहुत गहरी कहानी बताते हैं

एक मंदिर में एक महात्मा रहते थे पहले लंबे समय से आत्मा विद्या का अभ्यास कर रहे थे .  उनकी अवस्था ऐसी हो गई थी कि उनका मन हमेशा अपने आत्म स्वरूप में स्थित रहता था शरीर की गतिविधियों ने उनकी आसक्ति लगभग समाप्त हो गई थी .  कोई उन्हें भोजन दे देता तो वह खा लेते कोई पानी पिला देते तो पानी पी लेते और वह एक ही स्थान पर शांत बैठे रहते उनके अधिकांश समय अपने आत्मानंद में बीतता था .

एक दिन कुछ बच्चे मंदिर में खेलने आए | उन्होंने सोचा कि महात्मा के शरीर के पास खेलते हैं एक लड़का चाकू लेकर आया और खेल-खेल में महात्मा के शरीर पर लकीर खींचने लगा . उस शरीर पर चोट लगी और रक्त बहने लगा .

लेकिन अच्छे की बात यह थी कि महात्मा इस प्रकार शांत बैठे रहे उन्होंने न बच्चों को पकड़ा ना क्रोध किया ना चलाएं बच्चे डर कर भाग गए .

कुछ समय बाद एक व्यक्ति वहां आया उसने महात्मा के शरीर से रक्त निकलते देखा उसने लोगों से पूछा तो पता चला कि बच्चों ने चोट पहुंचाई है लोगों ने एक जर्राह चिकित्सक को बुलाया ताकि घाव को सिलचर ठीक किया जा सके। 

लेकिन जब चिकित्सक घाव को सीने लगा , तो महात्मा ने उसे रोक दिया।

कुछ दिनों बाद वही घाव बिगड़ गया और उसमें कीड़े पड़ गए । फिर भी महात्मा के चेहरे पर क्रोध घृणा या बेचैनी दिखाई नहीं दी

कुछ दिनों बाद वही गांव बिगड़ गया और उसमें कीड़े पड़ गए फिर भी महात्मा के चेहरे पर क्रोध घृणा या बेचैनी नहीं दिखाई दी

यहां कहानी का असली अर्थ क्या है ?

यहां अष्टावक्र यह नहीं कह रहे है कि शरीर को चोट पहुंचने पर चिकित्सा नहीं करनी चाहिए। आधुनिक जीवन में शरीर की देखभाल करना आवश्यक है।

कहानी का उद्देश्य यह दिखाना है कि उसे महात्मा की आंतरिक पहचान शरीर से अलग हो चुकी थी

सामान्य व्यक्ति के मन में होता हैं —-

मेरे शरीर को चोट लगी “?

मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ  ?

मुझे इतना दर्द क्यों हो रहा है ?!

उसने मेरे साथ ऐसा कैसे किया ?

लेकिन आत्मज्ञानी की दृष्टि बदल जाती है। वह जानता है—
मैं शरीर नहीं हूँ। शरीर में परिवर्तन हो रहा है, लेकिन मैं उसका साक्षी हूँ।”
यही “नाहं देहो” का अर्थ है।

दूसरी महात्मा की बात ओर भी गहरी है

इस नगर में एक दूसरे मंदिर में एक और महात्मा रहते थे जब उन्हें पहले महात्मा की स्थिति का पता चला तो उन्होंने संदेश भेजो – 

जिस मकान में आदमी रहता है ,उसकी सफाई और मरम्मत करना आवश्यक है ।”

यह सुनने में साधारण बात लगती है लेकिन पहले महात्मा ने बहुत गहरा उत्तर दिया ।

उन्होंने कहा __

महात्मा जी से कहना कि आप जब आप तीर्थ की यात्रा करते थे और रास्ते में जिन-जिन धर्मशालाओं में रात बिताते थे , वे धर्मशालाएं अब गिर चुकी है । अब जाकर उनकी मरम्मत करिए । हमें तो इस शरीर रूपी धर्मशाला में आयु रूपी रात भर ही रहना है “।

इसका अर्थ यहां शरीर को धर्मशाला कहा गया है ।  जैसे यात्री किसी धर्मशाला में कुछ समय के लिए रुकता है और फिर आगे चल जाता है वैसे ही आत्मा इस शरीर में कुछ समय के लिए रहती हुई प्रतीत होती हैं

शरीर हमारा स्थायी घर नहीं है।

जन्म → शरीर मिलता है → जीवन चलता है → शरीर बूढ़ा होता है → मृत्यु आती है → शरीर छूट जाता है।


लेकिन आत्मा के विषय में अद्वैत कहता है कि वह इन परिवर्तनों की साक्षी है।


इसीलिए ज्ञानी शरीर की उपेक्षा करने के कारण शांत नहीं है; वह इसलिए शांत है क्योंकि उसने शरीर को अपना अंतिम स्वरूप मानना छोड़ दिया है।

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी।
निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः॥ ७॥

जिस ज्ञानी को यह दृढ़ निश्चित  हो गया कि ब्रह्मा से लेकर तिनके तक इस संपूर्ण जगत में वही एक आत्मा व्याप्त है । उसके मन में भेद और विकल्प समाप्त हो जाते हैं वह शुद्ध और शांत हो जाता है तथा प्राप्त और अप्राप्त वस्तुओं की चिंता से मुक्त होकर संतुष्ट रहता है ।

प्रश्न — “यदि आत्मा का साक्षात्कार हो गया, तो क्या ज्ञानी के मन के सारे संकल्प-विकल्प अपने आप समाप्त हो जाते हैं?”

उतर – हा। जब आत्मा का वास्तविक ज्ञान हो जाता है ,तब अज्ञान के कारण बनी हुई अनेकता की भावना समाप्त होने लगती है । पहले मनुष्य सोचता है कि मैं अलग हूं दूसरा अलग है यह मेरा है वह पराई है लेकिन आत्मज्ञान होने पर उसे अनुभव होता है कि सभी नाम रूपों के पीछे एक ही चेतन है ।

जैसे एक ही आकाश अलग-अलग कमरों और घरों में अलग-अलग दिखाई देता है लेकिन वास्तव में आकाश एक ही है उसी प्रकार शरीर और मन अलग दिखाई देते हैं लेकिन उनके भीतर प्रकाशित चेतन एक ही है

नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शान्तये॥ ८॥

जो व्यक्ति यह निश्चित कर लेता है कि यह दिखाई देने वाला संसार अनेक प्रकार का और आश्चर्यपूर्ण  होते हुए भी परम सत्य में स्वतंत्र अस्तित्व नहीं रखता उसकी सांसारिक वासना समाप्त हो जाती हैं ।  वह केवल शुद्ध चेतना के रूप में स्थित होकर अत्यंत शांत हो जाता है ।

प्रश्न — “यदि ज्ञानी को संसार मिथ्या दिखाई देता है, तो क्या वह संसार को बिल्कुल देखता ही नहीं

संसार दिखाई देता रहता है, लेकिन उसकी दृष्टि बदल जाती है ।  अज्ञानी संसार को अंतिम सत्य मानकर उसे चिपकता हे ।  लेकिन ज्ञानी जानता है कि संसार नाम रूप का परिवर्तनशील अनुभव है और इसका आधार चेतना है।

इससे सपना के उदाहरण से समझिए । जब हम सपना देखते हैं तब सपना के भीतर का संसार बिल्कुल वास्तविक लगता है । उसमें लोग होते हैं , घटनाएं होती हैं , सुख-दुख होता है  ,लेकिन जागने के बाद समझ में आता है कि पूरा सपना मन में ही दिखाई दे रहा था । 

इस प्रकार अष्टावक्र की दृष्टि में आत्मज्ञान के बाद व्यक्ति समझता है कि यह संसार दिखाई तो दे रहा है लेकिन इसका स्वतंत्र और स्थाई अस्तित्व नहीं है । ब्रह्म की सत्ता के कारण ही या नाम रूप का संसार अनुभव होता है ।

प्रश्न — “फिर ज्ञानी की इच्छाएँ क्यों समाप्त हो जाती हैं?”

उतर – क्योंकि इच्छा की जड़ है – ”  मुझे कुछ मिलेगा तभी मैं पूर्ण हो जाऊंगा । “

जब व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है कि मैं स्वयं पूर्ण चेतना हूं , तब बाहर  की वस्तुओं से पूर्णता पाने की आवश्यकता समाप्त होने लगती है।

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