” न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम्।
ऊर्ध्वरेता भवेद्यस्तु स देवो न तु मानुषः॥ “
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में ब्रह्मचर्य को सर्वोच्च तप कहा गया है । इसका आशय केवल इंद्रिय संयम नहीं बल्कि अपनी समस्त जीवन ऊर्जा विचारों और कर्मों को एक उच्च आदर्श की दिशा में लगाना है । ऐसे व्यक्ति का जीवन साधारण नहीं बल्कि प्रेरणादायक माना गया है
आज का युग सूचना का योग है । लेकिन साथ ही यह विचलित मन का योग भी है । मनुष्य के पास पहले से अधिक ज्ञान उपलब्ध है परंतु पहले से कहीं कम एकाग्रता है । हमारे पूर्वजों को अपनी इंद्रियों को विजय प्राप्त करने के लिए जंगलों में तप करना पड़ता था । जबकि आज हमें अपनी जेब में रख मोबाइल सोशल मीडिया अनंत मनोरंजन और क्षणिक सुख के आकर्षण से लड़ना पड़ता है । शत्रु बदल गया है लेकिन युद्ध आज भी वही है मन पर विजय का युद्ध
प्राचीन भारत में ब्रह्मचर्य को केवल अविवाहित रहने का नियम नहीं माना जाता था । यह संपूर्ण जीवन प्रद्धति थी । गुरुकुलों में विद्यार्थियों को सबसे पहले आत्म संयम सिखाया जाता था । क्योंकि यह माना जाता था कि जिस व्यक्ति का मन स्थिर नहीं है । वह न विद्या प्राप्त कर सकता , नहीं युद्ध जीत सकता है , ना राज्य चला सकता है और नहीं आत्मज्ञान प्राप्त कर सकता है। इसलिए प्रभु श्री राम , श्री कृष्ण , भीष्म , हनुमान , आदि शंकराचार्य , स्वामी विवेकानंद और अनेक महापुरुषों के जीवन में आत्मा संयम, अनुशासन और उद्देश्य पूर्ण जीवन को विशेष महत्व दिया है।
आज समस्या यह नहीं है कि लोगों में प्रतिभा कम है । समस्या यह है कि उनकी ऊर्जा बिखरी हुई है । कोई 5 मिनट भी बिना मोबाइल देख नहीं रह सकता । कोई अपने विचार को नियंत्रित नहीं कर पा रहा । कोई क्षणिक सुख के लिए अपने बड़े लक्ष्य भूल जाता है । आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि आत्म नियंत्रण अनुशासन और विलंबित संतुष्टि delayed gratification जीवन के अनेक क्षेत्रों जैसे शिक्षा स्वास्थ्य और करियर में सफलता से जुड़े हुए हैं यही ब्रह्मचर्य का व्यावहारिक पक्ष है अपने मां और इच्छाओं का स्वामी बन्ना है।
कल्पना कीजिए कि यदि सूर्य की किरणें पूरे आकाश में बिक्री रहे तो वह केवल प्रकाश देते हैं । लेकिन वही किरणे यदि एक लेंस के एक बिंदु पर केंद्रित कर दी जाए तो अग्नि उत्पन्न कर देती है । मनुष्य की ऊर्जा भी ऐसी ही है जब वह बिखर जाती हैं तो जीवन साधारण बन जाता है जब वही ऊर्जा संयम , साधना , अध्ययन और परिश्रम में लगती है तो और असाधारण उपलब्धियां जन्म लेते हैं ।
ब्रह्मचर्य का अर्थ जीवन में भागना नहीं है ।इसका अर्थ है कि जीवन को सर्वोच्च स्तर पर जीना । इसका अर्थ है कि अपनी इच्छाओं का दमन नहीं बल्कि उनका परिष्कार । अपनी ऊर्जा को व्यर्थ न बहकर उसे ज्ञान सेवा राष्ट्र निर्माण , परिवार , स्वास्थ्य , साधना , महान उद्देश्य में लगाना। यही वह दृष्टि है जिसने प्राचीन भारत में ऐसे ऋषि उत्पन्न किया जिन्होंने वेदों की रचना की , ऐसे वैज्ञानिक दिए जिन्होंने गणित और खगोल शास्त्र को नई दिशा दी , ऐसे योद्धा दिए जिन्होंने धर्म और राष्ट्र की सुरक्षा की और ऐसे संत दिए जिनकी वाणी आज भी करोड़ों लोगों का मार्गदर्शन करती है।
आज का प्रश्न यह नहीं है कि दुनिया कैसी है । प्रश्न यह है कि आप कैसे बनना चाहते हैं ? क्या आप क्षणिक सुख के पीछे भागने वाले व्यक्ति बनेंगे ? या अपने मन के स्वामी बनकर ऐसे चरित्र बनाएंगे की समाज के लिए प्रेरणा बने।
आज का अभ्यास
° आज पूरे दिन अपने डिजिटल उपयोग का समय लिखें
° कम से कम 60 मिनट बिना किसी डिजिटल व्यवधान के अध्ययन या गहन कार्य करें
° 30 min व्यायाम करें
° 20 min ध्यान या जप करे
° रात्रि के स्वयं से पूछे – ” क्या आज मैने अपनी ऊर्जा को उद्येश्य पूर्ण कार्यों में लगाया ?
” मै अपनी ऊर्जा को व्यर्थ नहीं बहाऊंगा। मेरा मन मेरा सेवक है , स्वामी नहीं । मै आत्म संयम , अनुशासन और उच्च उद्देश्य के साथ जीवन जीकर अपने चरित्र का निर्माण करूंगा । यही मेरा तप है , यही मेरी शक्ति है और यही मेरे जीवन की दिशा है। ”
