15वे प्रकरण में अष्टावक्र मुनि जनक को बार-बार इस सत्य की ओर ले जाते हैं , लेकिन इस बार बात केवल किसी साधना , कर्म, पूजा या बाहरी परिवर्तन की नहीं है। यहां प्रश्न यह है कि तुम वास्तव में हो कौन ? क्या तुम यह शरीर हो ? क्या तुम मन हो ? क्या तुम्हारे भीतर उठने वाला राग द्वेष ही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है ? क्या सुख-दुख सफलता असफलता इच्छा और भय ही तुम्हारी पहचान है ?
अष्टावक्र का उत्तर अत्यंत सीधा है—नहीं।
तुम इन सबको जानने वाले हो। शरीर दिखाई देता है, मन के विचार दिखाई देते हैं, भावनाएँ आती-जाती हैं, इच्छाएँ उठती और समाप्त होती हैं, लेकिन इन सबके पीछे एक ऐसा चैतन्य है जो इन परिवर्तनों को जानता है और स्वयं परिवर्तन का विषय नहीं बनता। पन्द्रहवें प्रकरण का आरम्भ इसी बात से होता है कि किस प्रकार एक योग्य शिष्य थोड़े-से उपदेश से ही सत्य को पहचान सकता है, जबकि दूसरा व्यक्ति जीवनभर सुनता रहकर भी उसी भ्रम में रह सकता है। इसलिए यह अध्याय केवल श्लोकों का अर्थ नहीं है; यह हमें ज्ञान ग्रहण करने की पात्रता, बंधन-मोक्ष का वास्तविक कारण, आत्मज्ञान की शक्ति और साक्षीभाव की ओर ले जाता है।
थोड़े उपदेश से ही सत्य को पहचान लेना
यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान् ।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति ॥ १ ॥
जिस व्यक्ति की बुद्धि सात्त्विक और सत्य को ग्रहण करने योग्य है, वह यथार्थ उपदेश को सुनकर ही कृतार्थ हो जाता है। लेकिन जो व्यक्ति भीतर से तैयार नहीं है, वह जीवनभर जिज्ञासा करता रहे, सुनता रहे, प्रश्न करता रहे, फिर भी उसी सत्य के विषय में भ्रमित रह सकता है।
अष्टावक्र यहाँ ज्ञान की मात्रा से अधिक ज्ञान ग्रहण करने वाली बुद्धि की गुणवत्ता पर ध्यान दे रहे हैं। संसार में दो व्यक्ति एक ही गुरु के सामने बैठ सकते हैं, दोनों एक ही वाक्य सुन सकते हैं, दोनों एक ही पुस्तक पढ़ सकते हैं, लेकिन उनके भीतर उसका प्रभाव बिल्कुल अलग हो सकता है। एक व्यक्ति के लिए केवल इतना सुनना पर्याप्त हो सकता है—“तुम शरीर नहीं, चैतन्य हो।” वह उस वाक्य को केवल शब्दों की तरह नहीं सुनता, बल्कि भीतर देखता है—“यदि शरीर बदल रहा है और मैं उसके परिवर्तन को जानता हूँ, तो मैं शरीर कैसे हो सकता हूँ? यदि विचार बदल रहे हैं और मैं विचारों को जान रहा हूँ, तो मैं विचार कैसे हो सकता हूँ?” और अचानक उसके भीतर दृष्टि बदल जाती है। दूसरी ओर कोई व्यक्ति वर्षों तक आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ सकता है, सैकड़ों प्रवचन सुन सकता है, अनेक शास्त्रों के उद्धरण याद कर सकता है, लेकिन उसकी जीवन-दृष्टि वही रहती है—“मैं शरीर हूँ, मेरी इच्छाएँ ही मैं हूँ, मेरा सम्मान ही मैं हूँ, मेरी सफलता ही मैं हूँ।” यही अंतर श्रवण और आत्मबोध का है।
इसे आधुनिक जीवन के उदाहरण से समझिए। किसी व्यक्ति को कोई कहे कि “मोबाइल तुम्हारा उपकरण है, तुम मोबाइल नहीं हो।” यह बात सुनने में इतनी सरल है कि इसे समझने में एक सेकंड भी नहीं लगेगा। लेकिन आत्मज्ञान में कठिनाई यह है कि हम शरीर, मन, विचार और अहंकार को उपकरण मानने के बजाय उन्हीं को “मैं” मान बैठे हैं। इसलिए अष्टावक्र कहते हैं कि सत्त्वबुद्धिमान व्यक्ति थोड़े उपदेश से कृतार्थ हो जाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि वह व्यक्ति बिना किसी अभ्यास के जादुई रूप से मुक्त हो गया। अर्थ यह है कि उसके भीतर सत्य को देखने की तैयारी है। वह सत्य को अपने पुराने विचारों के अनुसार बदलने की कोशिश नहीं करता; बल्कि अपने पुराने भ्रम को सत्य के सामने छोड़ देता है।
यहाँ गुरु की बात से अधिक महत्वपूर्ण है शिष्य की ग्रहणशीलता। एक पात्र उल्टा रखा हो तो वर्षा कितनी भी हो, उसमें पानी नहीं भरेगा। उसी प्रकार ज्ञान चारों ओर उपलब्ध होने पर भी यदि मन अहंकार, पूर्वाग्रह, विषयासक्ति और अपने ही निष्कर्षों से भरा हुआ है, तो ज्ञान भीतर प्रवेश नहीं करता।
तीन प्रकार के अधिकारी — उत्तम, मध्यम और निकृष्ट
अष्टावक्र परंपरा में ज्ञान के साधकों को उनकी ग्रहणशीलता के आधार पर तीन प्रकार से समझाया जाता है।
पहला है उत्तम अधिकारी। वह सत्य को सुनकर तुरंत उसकी ओर देख सकता है। उसे केवल संकेत चाहिए। जैसे किसी व्यक्ति से कहा जाए—“जिसे तुम खोज रहे हो, वही तुम हो”—और वह भीतर मुड़कर देख ले।
दूसरा है मध्यम अधिकारी। उसे बार-बार श्रवण, मनन और चिंतन करना पड़ता है। वह समझता है, फिर संदेह करता है, फिर विचार करता है, फिर अनुभव से उसे स्पष्ट करता है।
तीसरा है निकृष्ट अधिकारी। वह वर्षों तक सुन सकता है, पढ़ सकता है, चर्चा कर सकता है, लेकिन यदि उसकी प्राथमिकता केवल विषयभोग, अहंकार और बाहरी उपलब्धियाँ हैं, तो ज्ञान उसके लिए केवल बौद्धिक जानकारी बनकर रह जाता है।
इसलिए समस्या हमेशा यह नहीं होती कि “मुझे ज्ञान नहीं मिला।” कभी-कभी समस्या यह होती है कि “मैं ज्ञान को अपने जीवन में प्रवेश ही नहीं करने देता।”
बंधन और मोक्ष का रहस्य केवल एक है
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः ।
एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २ ॥
विषयों के प्रति वैराग्य अर्थात् उनकी आसक्ति का समाप्त होना ही मोक्ष है और विषयों के प्रति आसक्ति एवं उनमें रस लेना ही बंधन है। इतना जान लेना ही बंधन और मोक्ष का ज्ञान है। अब जैसा तुम्हें उचित लगे, वैसा करो।
बंधन बाहर नहीं, मन की आसक्ति में है
यह श्लोक अष्टावक्र गीता के सबसे महत्वपूर्ण सूत्रों में से एक है। सामान्य मनुष्य सोचता है कि उसका बंधन परिस्थितियों के कारण है—“मेरे पास यह नहीं है इसलिए मैं दुखी हूँ”, “अगर मुझे पैसा मिल जाए तो मैं सुखी हो जाऊँगा”, “अगर लोग मेरी प्रशंसा करें तो मुझे शांति मिलेगी”, “अगर मेरी इच्छा पूरी हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा।”
लेकिन अष्टावक्र समस्या को बाहर नहीं खोजते। वे सीधे मन की ओर संकेत करते हैं।
वस्तु स्वयं बंधन नहीं है; वस्तु के प्रति मन की आसक्ति बंधन है।।
धन होना बंधन नहीं है। धन के बिना मैं कुछ नहीं हूँ—यह धारणा बंधन बन सकती है। परिवार होना बंधन नहीं है। परिवार के माध्यम से अपनी सम्पूर्ण पहचान और सुरक्षा को बाँध देना बंधन बन सकता है। भोजन बंधन नहीं है। भोजन के स्वाद के पीछे विवेक खो देना बंधन बन सकता है। मोबाइल बंधन नहीं है। मोबाइल के बिना बेचैनी और हर कुछ मिनट में उसे देखने की मजबूरी बंधन का रूप ले सकती है।
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि “मेरे पास क्या है?”
प्रश्न यह है कि “जो मेरे पास है, उसके प्रति मेरे मन की स्थिति क्या है?”
एक ही मन बंधन भी है और मुक्ति का साधन भी
” मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः “
अर्थात मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है । सब मन किसी विषय में कहता है कि – ” इसे बिना मैं अधूरा हूं , ” तब बंधन पैदा होता है । जब मन कहता है – यह वस्तु मेरे जीवन में है , लेकिन मेरी वास्तविक पहचान इस पर निर्भर नहीं है ” तब स्वतंत्रता जन्म लेने लगती हैं ।
यही वैराग्य है।
वैराग्य का अर्थ यह नहीं है कि तुम दुनिया छोड़कर जंगल चले जाओ वैराग्य का घर अर्थ है – ” दुनिया तुम्हारे पास हो सकती है , लेकिन दुनिया तुम्हारे भीतर मालिक बनकर न बैठे। ”
आत्मज्ञान अहंकार और विषयभोग की दिशा बदल देता हैं
वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगं जनं मूकजडालसम् ।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः ॥ ३ ॥
यह तत्वज्ञान अत्यधिक बोलने वाले को मौन कर देता है , बड़े-बड़े बौद्धिक ज्ञान वाले को भी बाहरी दिखाने की दृष्टि से जड़ जैसा बना देता है और अत्यधिक कर्म प्रवृत व्यक्ति को भी भीतर से शांत कर देता है । इसलिए जो व्यक्ति केवल विषय भोगों की इच्छा में लगा है ,वह इस आत्मज्ञान को स्वीकार नहीं करता ।
ज्ञान बोलने की क्षमता नहीं , भीतर की चुप्पी है
यहां अष्टावक्र एक बहुत गहरी बात कहते हैं । सामान्यतः हम विद्वान व्यक्ति की पहचान उसके बोलने से करते हैं । जो बहुत सारे श्लोक जानता है , बड़ी-बड़ी बातें करता है , दर्शन पर बहस करता है उसे हम ज्ञानी समझ लेते हैं।
लेकिन आत्मज्ञान का प्रभाव उल्टा हो सकता है ।
जब व्यक्ति वास्तव में देखा है कि जिससे मैं को लेकर और इतनी सारी बातें कर रहा था वही अहंकार कल्पना पर आधारित है तब अनावश्यक बोलते कम होने लगता है
यहाँ “मूक” होने का अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी व्यक्ति बोल ही नहीं सकता। अर्थ यह है कि उसके भीतर अनावश्यक वाणी का स्रोत सूखने लगता है। उसे हर बात पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने की जरूरत नहीं रहती ।।
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान् ।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर ॥ ४ ॥
तुम शरीर नहीं हो और शरीर तुम्हारा वास्तविक स्वरूप नहीं है। तुम न वास्तविक कर्ता हो और न भोक्ता। तुम चैतन्यस्वरूप, नित्य साक्षी और निरपेक्ष हो। इसलिए स्वतंत्र होकर सुखपूर्वक विचरण करो।
कल्पना करो कि तुम एक कमरे में बैठे हो। तुम्हारा शरीर कुर्सी पर बैठा है। तुम अपने शरीर को महसूस कर रहे हो। अब आँखें बंद करो। शरीर का अनुभव हो रहा है। फिर मन में विचार उठते हैं। तुम कहते हो—“मेरे मन में विचार चल रहे हैं।”
अब ध्यान दो—यदि तुम कहते हो “मेरे विचार”, तो विचार और “मैं” एक नहीं हुए।
फिर तुम कहते हो—“मेरा शरीर।”
तो शरीर और “मैं” भी एक नहीं हुए।
फिर कहते हो—“मेरा मन परेशान है।”
तो मन और “मैं” भी अलग दिखाई दे रहे हैं।
अष्टावक्र इसी सूक्ष्म अंतर को पकड़ते हैं।
जो जाना जा रहा है, वह जानने वाला नहीं हो सकता।
शरीर जाना जा रहा है।
विचार जाने जा रहे हैं।
भावनाएँ जानी जा रही हैं।
सुख-दुःख जाने जा रहे हैं।
इच्छाएँ जानी जा रही हैं।
तो फिर जानने वाला कौन है?
अष्टावक्र कहते हैं—चिद्रूपः असि — तुम चैतन्यस्वरूप हो।
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन ।
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर ॥ ५ ॥
राग और द्वेष मन के धर्म हैं, तुम्हारे नहीं। मन भी तुम्हारा वास्तविक स्वरूप नहीं है। तुम विकल्पों से परे, ज्ञानस्वरूप और विकाररहित आत्मा हो। इसलिए स्वतंत्र होकर सुखपूर्वक विचरण करो।
शत्रु और मित्र भी मन की रचना हैं
हम कहते हैं—
“यह मेरा मित्र है।”
“यह मेरा शत्रु है।”
लेकिन क्या कोई व्यक्ति जन्म से ही तुम्हारा मित्र या शत्रु बनकर आता है?
नहीं।
मन किसी व्यक्ति के साथ अपने अनुभव जोड़ता है। किसी से सुख मिला तो राग पैदा हुआ। किसी से दुख मिला तो द्वेष पैदा हुआ। फिर मन उस व्यक्ति के बारे में एक कहानी बनाता है।
अद्वैत दृष्टि कहती है—इन मानसिक विभाजनों को देखो।
इसका अर्थ यह नहीं कि व्यवहारिक जीवन में सही-गलत का भेद समाप्त कर दो। बल्कि इसका अर्थ है कि व्यवहार करो, लेकिन अपनी आत्मपहचान को राग-द्वेष के हवाले मत करो।
पन्द्रहवें प्रकरण के इन पाँच श्लोकों में अष्टावक्र हमें धीरे-धीरे एक बहुत गहरी जगह पर ले जाते हैं। पहले वे बताते हैं कि आत्मज्ञान केवल शब्द सुन लेने का नाम नहीं है; उसके लिए ऐसी बुद्धि चाहिए जो सत्य को अपने भीतर देखने के लिए तैयार हो। फिर वे बंधन और मोक्ष का सरलतम सूत्र देते हैं—विषयों के प्रति आसक्ति बंधन है और उनसे भीतर की स्वतंत्रता मोक्ष है। इसके बाद वे बताते हैं कि वास्तविक तत्त्वबोध व्यक्ति के अहंकार, अनावश्यक वाणी और बाहरी प्रदर्शन को शांत कर देता है। फिर सबसे बड़ा प्रहार करते हुए कहते हैं—“तुम शरीर नहीं हो।” तुम शरीर को जानते हो, इसलिए शरीर से अलग हो। तुम मन के विचारों को जानते हो, इसलिए तुम केवल मन नहीं हो। तुम राग-द्वेष को देखते हो, इसलिए राग-द्वेष तुम्हारा वास्तविक स्वरूप नहीं हो सकते। तुम्हारा स्वरूप चैतन्य, साक्षी और निर्विकार है।
इसलिए अष्टावक्र की शिक्षा संसार से भागने की शिक्षा नहीं है। यह गलत पहचान से जागने की शिक्षा है। शरीर अपना कार्य करता रहे, मन अपना कार्य करता रहे, संसार अपना कार्य करता रहे—लेकिन भीतर यह स्पष्टता बनी रहे कि “मैं इन सबको जानने वाला साक्षी चैतन्य हूँ।”
