” मैं ” ही बंधन है| बंधन और मोक्ष को समझो | अष्टावक्र गीता अध्याय 8 explain

यह अध्याय न साधना सीखता है  , ना नियम , न तपस्या ,  यह केवल बताता है कि बंधन कब है और मोक्ष कब है ?

जिस काल में चित विषयों में आसक्त होता है तब बंधन होता है और जब अनासक्ति होता है तब मुक्त हो जाता है”

बंधन कब है?

जब चित विषयों की इच्छा वाला होकर किसी पदार्थ की प्राप्ति की इच्छा करता है और उसके अप्राप्त होने से फिर सोच करता है और कष्ट होता है तब उसके त्याग की इच्छा करता है , | और जब चित में लोभ उत्पन्न होता है तब ग्रहण की इच्छा करता है तथा पदार्थ की प्राप्ति होने पर हर्ष को प्राप्त होता है और प्राप्ति होने पर क्रोधित होता है इस प्रकार जबकि अनेक वासनाएं करके चित युक्त होता है तब जीव को बंधन होता है।

स्त्री पुत्र आदि में धन के लोग करके मानो और स्त्री आदि को के लाभ करके चित्र दीनता को प्राप्त होता है

जब चित कुछ चाहता है,  कुछ सोचता है , कुछ छोड़ना है ,  कुछ पकड़ता है,  सुखी दुखी होता है , तब बंधन है

चित् में अनेक प्रकार के भोगों की वासना ही पुरुष के बंधन का कारण है ।

जो समग्र वासनाओं से रहित है , वही ज्ञानी है वासना वाला ही बंधन को प्राप्त होता है

जब मन किसी भी भाव में फसता है वह बंधन है

मोक्ष क्या है ?

समग्र रूप से वासना के क्षय हो जाने का नाम ही मोक्ष है। जब तुम वासना का त्याग करोगे और मोक्ष की इच्छा ना करोगे तब सुखी हो जाओगे

जिस काल में चित ना भोगो की प्राप्ति की इच्छा करता है और ना शौकों की त्याग की इच्छा करता है अर्थात पदार्थ के पाने पर ना उसको हर्ष होता है और ना प्यार संबंधियों के नष्ट या वियोग हो जाने पर शोक करता है किंतु एक रस सदा ज्यों का क्यों बना रहता है उसे काल में वह पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है

जब चित ____

ना चाहता है  ,ना दुखी होता है , ना पकड़ता है , ना छोड़ना है , ना सुखी होता है,  ना क्रोधित होता है ।

तभी मुक्ति है

मुक्ति कोई अवस्था नहीं है मुक्ति चित की शांति है  , भाव आए या जाए फर्क ना पड़े  , स्थिति बदले भीतर कुछ ना हिले , यही मुक्ति है यह जड़ता नहीं है यह साक्षी भाव है।

आसक्ति ही बंधन है ।

जब चित किसी भी दृष्टि किसी भी विषय में आ सकते हैं तब बंधन है, जब चित सभी दृष्टि से अनासक्त  हैं तब मोक्ष है।

” विषय छोड़ने की जरूरत नहीं ,  आसक्ति छोड़ने की जरूरत है। “

अनासक्ति का अर्थ है _ सब कुछ हो, पर भीतर कोई पकड़ ना हो

जब चित अनात्मक पदार्थ में अनात्माकार वृत्तिवाला होता है तभी इसको बंधन होता है जब चित विषयकर नहीं होता है अर्थात आसक्ति से रहित होकर सर्वत्र आत्म दृष्टि वाला होता है तभी जीव मुक्त कहा जाता है

आत्मज्ञान की प्राप्ति के पूर्व जितने कल तक पुरुष का चित् विचार से शून्य होकर विषयों में आसक्त रहता है उतने कल तक जीव बंधन में ही पड़ा रहता है पश्चात जब विचार करके युक्त हुआ रचित दोष दृष्टि करके विषय में आसक्ति से रहित हो जाता है और फिर विषयों वासना का बीज भी चित् में नहीं रहता है तो फिर वह मुक्त होकर कदापि बंधन को नहीं प्राप्त होता है ।

” मैं ” ही सबसे बड़ा बंधन

जब” मैं “ है _ बंधन है।

ब “मै” नहीं है _ मोक्ष है।

यह देह _ विनाश नहीं यह अहम विनाश है

ना कुछ ग्रहण करना है ना कुछ त्याग क्योंकि ग्रहण त्याग दोनों” में “को मजबूत करते हैं

जब तक पुरुष में अहंकार बैठा है  _ मैं ब्राह्मण हूं मैं जानी हूं मैं त्यागी हूं तब तक वह मुक्ति कदापि नहीं हो सकता है

जब तक जीव का संबंध दुरात्मा अहंकारी के साथ बना रहता है तब तक मुक्तिलेश मात्र इसको प्राप्त नहीं होता है।

जब तक जीव का शरीर आदि को में अहंकारध्यास बना है तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती जिस काल में अहंकारध्यास इसका निवृत हो जाता है उसे काल में बिना ही परिश्रम  अकर्ता , अभोक्ता होकर मुक्त हो जाता है

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