अष्टावक्र गीता का 14वां प्रखंडप्रकरण बहुत सूक्ष्म है । यहां जनक केवल यह नहीं बता रहे हैं कि ज्ञानि कैसे व्यवहार करता है , बल्कि वह उसे अंतिम आंतरिक अवस्था की ओर संकेत कर रहे हैं जहां मनुष्य के भीतर संसार को पकड़ने की प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है । यह अवस्था संसार से भागने की अवस्था नहीं है , ना ही शरीर , मित्र , शास्त्र या कर्म को जबरदस्ती छोड़ देने की अवस्था है ।
बल्कि यह उस स्पृहा के गल जाने की अवस्थाएं जो कहते हैं ” मुझे यह चाहिए तभी मैं पूर्ण होगा ” जब यह मूल चाह समाप्त होती है , तब संसार अपनी जगह रहता है , लेकिन उसकी मन पर अधिकार समाप्त हो जाता है। पहला श्लोक में बताया जाता है कि ज्ञानी के भीतर विषयों के प्रति , राग द्वेष के पकड़ नहीं रहती :; दूसरे में कहां जाता है कि जब इच्छा ही गल गई तो तो धन, मित्र , विषय और यहां तक के शास्त्र भी ” मेरे “होने की पकड़ खो देते हैं । तीसरे में साक्षी आत्मा और परमात्मा के स्वरूप का बोध तथा “तत्वमसि “के माध्यम से जीव – ब्रह्म की अभेद दृष्टि समझाई जाती है । और चौथे में बताए जाते हैं कि ऐसे ज्ञानी का भीतर विकल्पशून्य और बाहर सहज स्वतंत्रता होती है ।
प्रश्न 1 : “शून्य चित ” का क्या अर्थ है ?
प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाभावभावनः ।
निद्वितो बोधित इव क्षीणसंसरणो हि सः ॥ १ ॥
जो पुरुष स्वभाव से ही विषयों के प्रति शून्य चित है , जिसके भीतर राग द्वेष और विषय वासनाओं की पकड़ नहीं है , वह संसार में कर्म करता हुआ भी वास्तव में संसार से क्षीण अर्थात मुक्त हो चुका है । वह बाहर से जागे हुए व्यक्ति जैसा दिखाई देता है , लेकिन उसकी आंतरिक अवस्था उस व्यक्ति जैसी है जो सोकर उठाया गया है और किसी दूसरे की प्रेरणा से कर्म कर रहा हो।
उतर:- सबसे पहले यह समझना आवश्यक है यहां ” शून्य चित् ” का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि ज्ञानी के मन में कोई विचार नहीं आता । वह पत्थर या जड़ वस्तु नहीं बन जाता । वह बोल सकता है , सोच सकता है ,निर्णय ले सकता है , व्यापार कर सकता है , परिवार के साथ रह सकता है , समाज में अपना कर्तव्य कर सकता है । फिर उसका चित शून्य कैसे हुआ ?
यहाँ शून्य का अर्थ है विषय-वासनाओं की पकड़ से शून्य । सामान्य मनुष्य का मन किसी न किसी विषय से जुड़ा रहता है। कोई धन के पीछे दौड़ रहा है, कोई सम्मान के पीछे, कोई प्रेम और प्रशंसा के पीछे, कोई इंद्रिय-सुख के पीछे, कोई भविष्य की सफलता के पीछे और कोई अतीत की स्मृतियों में फँसा हुआ है। बाहर से देखने पर सब अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर एक ही प्रक्रिया चल रही है- “मुझे कुछ चाहिए, तभी मैं पूर्ण होऊँगा।” यही चाह मन को संसार से बाँधती
ज्ञानी के भीतर यह धारणा टूट जाती है। उसके सामने विषय आ सकते हैं, लेकिन विषय उसके भीतर वह पुरानी आग पैदा नहीं करते- “इसे किसी भी कीमत पर पाना है।” वह वस्तु का उपयोग करता है, लेकिन वस्तु उसे उपयोग नहीं करती। वह धन रख सकता है, लेकिन धन उसकी पहचान नहीं बनता। वह भोजन कर सकता है, लेकिन भोजन के स्वाद को अपनी शांति का आधार नहीं बनाता। वह संसार में रह सकता है, लेकिन संसार को अपने भीतर स्थायी स्वामी नहीं बनने देता।
इच्छा गल गई तो “मेरा” क्या बचा?
प्रश्न 2 : क्या ज्ञानी को विषयों का अनुभव नहीं होता?
क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः ।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ २ ॥
जब मेरी इच्छा ही गल गई , तब मेरा धन कहां है ? मेरे मित्र कहा है ? विषय रूपी चोर कहा है ? शास्त्र कहां है ? ज्ञान कहा है ? अर्थात अब इनमें से कोई भी वस्तु मेरे मन को बांधने वाली नहीं रही।
उतर:-
नहीं। यह श्लोक यह नहीं कह रहा कि ज्ञानी की इंद्रियाँ काम करना बंद कर देती हैं। आँखें देखेंगी, कान सुनेंगे, जीभ स्वाद लेगी, शरीर सुख-दुःख का अनुभव करेगा। अंतर यह है कि अनुभव और आसक्ति अलग-अलग चीजें हैं।
सामान्य व्यक्ति सुंदर वस्तु देखता है और मन तुरंत कहता है—“मुझे चाहिए।” फिर वह उसे पाने की योजना बनाता है। मिल जाए तो कुछ समय सुख मिलता है और फिर डर शुरू होता है—“यह कहीं छिन न जाए।” न मिले तो दुःख। इस प्रकार वस्तु मिलने से पहले इच्छा, मिलने के बाद भय और खोने के बाद शोक—मन तीनों तरफ से बंध जाता है।
ज्ञानी में अनुभव हो सकता है, लेकिन उसके पीछे वही मानसिक पकड़ नहीं रहती। वह जानता है—“यह अनुभव आया है और चला जाएगा; मैं अनुभव का साक्षी हूँ।”
यही कारण है कि वेदान्त में मुक्ति का अर्थ इंद्रियों का नष्ट होना नहीं है; मुक्ति का अर्थ है इंद्रियों के अनुभव को अपनी वास्तविक पहचान न मानना।
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यहाँ जनक किसी बाहरी वस्तु का त्याग नहीं कर रहे हैं; वे “स्पृहा” के गलने की बात कर रहे हैं। स्पृहा अर्थात् किसी वस्तु को पाने, पकड़ने, बचाने या उससे सुख प्राप्त करने की तीव्र इच्छा। यही मनुष्य को संसार से बाँधती है।
धन अपने आप में बंधन नहीं है। धन के प्रति “मेरा सुख इसी में है” यह धारणा बंधन है। मित्र अपने आप में बंधन नहीं हैं। “मेरी भावनात्मक पूर्णता इन्हीं लोगों पर निर्भर है” यह पकड़ बंधन है। विषय अपने आप में बंधन नहीं हैं। “इस विषय को प्राप्त किए बिना मैं अधूरा हूँ” यह मानसिक आग्रह बंधन है।
इसलिए जनक कहते हैं—“यदा मे गलिता स्पृहा”, जब मेरी स्पृहा गल गई, तब मेरा धन कहाँ? इसका मतलब यह नहीं कि धन गायब हो गया। महल में धन हो सकता है, राज्य हो सकता है, मित्र हो सकते हैं, परिवार हो सकता है, लेकिन अब उनके साथ “मेरी पूर्णता” की गाँठ नहीं है।
एक बहुत सरल उदाहरण लो। किसी व्यक्ति के पास मोबाइल है। मोबाइल हाथ में है, वह उसका उपयोग करता है। लेकिन यदि मोबाइल खो जाए तो उसका मन टूट जाए, बेचैनी हो, रातभर चिंता हो, बार-बार उसी के बारे में विचार आएँ—तो वस्तु हाथ में नहीं, मन के भीतर है। दूसरी ओर कोई व्यक्ति मोबाइल का उपयोग करता है, लेकिन उसके खो जाने पर उचित उपाय करके आगे बढ़ जाता है। वस्तु दोनों के पास थी, लेकिन बंधन केवल पहले व्यक्ति के पास था।
प्रकार जनक कहते हैं—“क्व विषयदस्यवः”—विषय रूपी चोर कहाँ हैं? विषयों को “चोर” इसलिए कहा गया है कि वे मनुष्य की शांति चुरा लेते हैं। आँख कोई सुंदर वस्तु देखती है और मन कहता है—“मुझे चाहिए।” कान कुछ सुनते हैं और मन कहता है—“फिर सुनना है।” जीभ स्वाद चखती है और मन कहता है—“फिर चाहिए।” समस्या इंद्रियों में नहीं है; समस्या है कि मन अनुभव को पकड़कर कहता है—“मुझे यही चाहिए, बार-बार चाहिए।”
और यहाँ एक और बहुत सूक्ष्म बात है—जनक कहते हैं “क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानम्”। यहाँ तक कि शास्त्र और ज्ञान भी अंतिम अवस्था में पकड़ने योग्य वस्तु नहीं रहते। इसका अर्थ शास्त्र का अपमान नहीं है। शास्त्र साधक को अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाता है। लेकिन जब सत्य का बोध हो जाता है, तब शास्त्र को भी एक साधन के रूप में देखा जाता है, अहंकार के आभूषण के रूप में नहीं।
एक व्यक्ति कह सकता है—“मैंने इतने ग्रंथ पढ़े हैं, मुझे वेदांत आता है, मुझे आत्मा का ज्ञान है।” यहाँ ज्ञान भी अहंकार की वस्तु बन गया। जनक कहते हैं कि जहाँ स्पृहा गल गई, वहाँ यह पकड़ भी नहीं रहती।
यह ठीक ऐसा है जैसे किसी नदी को पार करने के लिए नाव की आवश्यकता हो। नदी पार करने के बाद कोई व्यक्ति नाव को सिर पर उठाकर जीवनभर नहीं घूमता। नाव का सम्मान है, उसकी आवश्यकता थी, लेकिन उसका उद्देश्य पार कराना था। उसी प्रकार शास्त्र साधन है; अंतिम सत्य किसी पुस्तक के भीतर बंद वस्तु नहीं है।
आत्मा ज्ञान के बाद मुक्ति की चिंता भी क्यों?
विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्तामुक्तये मम ॥ ३ ॥
जब देह और इंद्रियों के साक्षी आत्मा का और परमात्मा का ज्ञान हो गया, और बंधन तथा मोक्ष दोनों के प्रति भी इच्छा समाप्त हो गई, तब मेरे लिए मुक्ति की कोई चिंता शेष नहीं रहती।
यह पूरे प्रकरण का सबसे दार्शनिक श्लोक है। यहाँ जनक उस अंतिम गाँठ को काटते हैं जिसे साधक बहुत बार पहचान ही नहीं पाता- “मुझे मुक्त होना है।”
पहली नजर में यह बात अजीब लगेगी। यदि कोई व्यक्ति आध्यात्मिक साधना कर रहा है तो वह स्वाभाविक रूप से कहेगा – “मुझे मोक्ष चाहिए।” फिर अष्टावक्र क्यों कह रहे हैं कि मुक्ति की इच्छा भी छोड़ दो ?
क्योंकि अष्टावक्र का प्रश्न है जिसे तुम बंधा हुआ मान रहे हो, वह वास्तव में कौन है?
शरीर बंधा हुआ हो सकता है। शरीर बीमारी, उम्र, भूख, थकान और परिस्थितियों के अधीन है। मन भी विचारों और भावनाओं से प्रभावित होता है। लेकिन जो इन सबको देख रहा है-वह साक्षी है। विचार बदलते हैं, लेकिन विचारों का ज्ञान बना रहता है। भावनाएँ आती हैं और चली जाती हैं, लेकिन उनके आने-जाने को जानने वाला बना रहता है। शरीर बचपन से युवा और फिर वृद्ध होता है, लेकिन “मैं हूँ” का मूल बोध हर अवस्था में उपस्थित रहता है।
अष्टावक्र साधक को इसी साक्षी की ओर ले जाते हैं।
फिर वेदान्त में आता है – “तत्त्वमसि “।
“तत्” अर्थात् वह परम सत्य ।
“त्वम्” अर्थात् तू जीव ।
“असि” अर्थात् है।
पहली दृष्टि में जीव और ईश्वर अलग दिखाई देते हैं। जीव सीमित है, ईश्वर असीम माना जाता है। जीव अल्पज्ञ दिखाई देता है, ईश्वर सर्वज्ञ । जीव शरीर के माध्यम से अनुभव करता है, जबकि ईश्वर जगत् का आधार माना जाता है। तो फिर “तू वही है” कैसे कहा जा सकता है?
यहीं भागत्यागलक्षणा की बात आती है।
मान लो एक ही व्यक्ति के बारे में कोई कहे – “यह वही राम है जिसे मैंने बचपन में देखा था।” बचपन का शरीर और आज का शरीर बिल्कुल समान नहीं है। उम्र, शरीर, रूप, ज्ञान, परिस्थितियाँ सब बदल गए। फिर भी पहचान का कोई मूल तत्व ऐसा है जिसके आधार पर कहा जाता है- “वही व्यक्ति है।”
इसी प्रकार “जीव” और “ईश्वर” के साथ जुड़े हुए उपाधिगत गुणों को हटाकर वेदान्त उस मूल चैतन्य की ओर संकेत करता है जो दोनों में आधारभूत है।
टीका में “गंगायां घोषः” का उदाहरण इसलिए दिया गया है। यदि कोई कहे – “गंगा में गाँव है”, तो शब्द का सीधा अर्थ लें तो गाँव गंगा के बहते हुए जल में होना चाहिए। लेकिन ऐसा संभव नहीं। इसलिए हम समझते हैं कि यहाँ “गंगा” से गंगा का तट अभिप्रेत है।
इसी तरह “तत्त्वमसि” का सीधा, उपाधि सहित अर्थ लेने पर विरोध दिखाई देता है। जीव और ईश्वर की सीमित विशेषताओं को लेकर उनकी समानता नहीं हो सकती। इसलिए उनके विरोधी उपाधिगत अंशों को छोड़कर चैतन्य स्वरूप ग्रहण किया जाता है। यही भागत्यागलक्षणा का सार है।
और जब यह बोध दृढ़ हो जाता है, तब जनक कहते हैं- “मुझे मुक्ति की चिंता भी नहीं ।”
क्यों?
क्योंकि यदि मेरा वास्तविक स्वरूप कभी बंधा ही नहीं था, तो “मैं कब मुक्त होऊँगा ?” यह प्रश्न भी गलत पहचान से पैदा हुआ था।
यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर समझना चाहिए -” मुझे मोक्ष नहीं चाहिए ” कहना और वास्तव में मोक्ष की चिंता से मुक्त होना दो अलग बातें हैं । कोई व्यक्ति केवल बोल सकता है मैं तो मुक्त हूं । ” लेकिन यदि अपमान होते ही क्रोध फूट पड़े , इच्छा पूरी न होने पर बेचैनी हो , विषय सामने आते ही मन खींच जाए , धन जाने पर भीतर टूट जाए – तो कभी स्पृहा और अहंकार मौजूद है । जनक जीस अवस्था की बात कर रहे हैं वह केवल दार्शनिक घोषणा नहीं , बल्कि आंतरिक स्वतंत्रता है ।
भीतर पूर्ण शांति , बाहर सहज स्वतंत्रता
अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ ४ ॥
जिसका अंतःकरण भीतर से संकल्प-विकल्प और वासनाओं से शून्य है और जो बाहर से स्वतंत्रतापूर्वक व्यवहार करता है, उसकी वास्तविक अवस्था को वही समझ सकता है जो स्वयं ऐसी अवस्था को जानता हो।
यह श्लोक ज्ञानी के बाहरी और आंतरिक जीवन के बीच का अंतर बताता है।
“अन्तर्विकल्पशून्यस्य” – अंदर कोई निरंतर संघर्ष नहीं। सामान्य मनुष्य का मन लगातार निर्णयों, इच्छाओं और विरोधों में उलझा रहता है – “यह चाहिए”, “यह नहीं चाहिए”, “यह व्यक्ति मुझे पसंद है”, “यह मुझे पसंद नहीं”, “लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?”, “अगर मुझे सफलता नहीं मिली तो?”, “अगर यह चीज़ मेरे हाथ से निकल गई तो?” मन लगातार भविष्य और अतीत में घूमता रहता है।
ज्ञानी का अर्थ यह नहीं कि वह व्यवहारिक निर्णय नहीं लेता। वह निर्णय लेता है, लेकिन निर्णयों के पीछे वासनात्मक बेचैनी नहीं होती। वह आवश्यक कर्म करता है, लेकिन कर्म उसके अस्तित्व का सहारा नहीं बनता।
फिर आता है- “बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।” बाहर से वह स्वतंत्रतापूर्वक चलता है। इसका अर्थ मनमानी नहीं है। इसका अर्थ है कि उसका जीवन भीतर की वासनाओं की गुलामी से मुक्त है। वह परिस्थितियों के अनुसार व्यवहार करता है, लेकिन हर परिस्थिति में अपनी आत्मिक शांति खो नहीं देता।
कभी वह बोलता है, कभी मौन रहता है। कभी किसी कार्य में सक्रिय होता है, कभी विश्राम करता है। कभी लोगों के बीच रहता है, कभी अकेला। बाहर से देखने वाला कह सकता है- “यह व्यक्ति तो हमारे जैसा ही जीवन जी रहा है।”
लेकिन अष्टावक्र कहते हैं-उसकी वास्तनिन् दशा को हर कोई नहीं समझ सकता।
क्योंकि सामान्य मनुष्य बाहर देखता है; ज्ञानी के जीवन का रहस्य भीतर है।
इसीलिए श्लोक में “भ्रान्तस्येव” अर्थात् किसी प्रकार उन्मत्त या सामान्य सामाजिक मानदंडों से अलग दिखाई देने वाले व्यक्ति का संकेत आता है। ज्ञानी कभी-कभी सामान्य अपेक्षाओं के अनुसार नहीं चलता, क्योंकि उसके भीतर वह मजबूरी नहीं है जो सामान्य मनुष्य को दूसरों की स्वीकृति के पीछे दौड़ाती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी जानबूझकर विचित्र व्यवहार करता है। वह बस स्वाभाविक होता है।
यहाँ एक सुंदर अंतर है-
अज्ञानी स्वतंत्र दिखना चाहता है; ज्ञानी स्वतंत्र होता है।
अज्ञानी कहता है- “मैं किसी की परवाह नहीं करता”, लेकिन भीतर दस लोगों की राय से प्रभावित होता है। ज्ञानी को अपनी स्वतंत्रता सिद्ध करने की आवश्यकता ही नहीं होती।
अज्ञानी विषयों को छोड़कर भी उनके बारे में सोच सकता है। ज्ञानी विषयों के बीच रहकर भी भीतर उनसे स्वतंत्र हो सकता है।
अज्ञानी संसार से भाग सकता है, लेकिन मन को साथ लेकर जाता है। ज्ञानी संसार में रह सकता है, लेकिन संसार को मन के भीतर जगह नहीं देता।
जब तक मन कहता है – मुझे कुछ पाना है , तब तक यात्रा चल रही है । जब मन देख लेता है कि जिसे पाने के लिए मैं दौड़ रहा था , उसका आधार मेरे अपने चैतन्य में ही है – तब दौड़ समाप्त होने लगती है । ”
अष्टावक्र यहां संसार विरोध नहीं सीखा रहे । वे संसार के साथ गलत पहचान का अंत सिखा रहे हैं। विषयों से भागना आवश्यक नहीं: विषयों के दासत्व से मुक्त होना आवश्यक है । धन छोड़ना आवश्यक नहीं ; धन में अपनी पूर्णता खोजने की भूल छोड़ना आवश्यक है । मित्र छोड़ना आवश्यक नहीं ; संबंधों की ओर अपनी आत्मा का आधार मानना छोड़ना आवश्यक है । शास्त्र छोड़ना आवश्यक नहीं , शास्त्र के ज्ञान को अहंकार का आभूषण बनाना छोड़ना आवश्यक है । यहां तक कि मुझे मोक्ष चाहिए इस अंतिम पकड़ को भी अंत: देखना है – क्योंकि अष्टावक्र की अंतिम दृष्टि में जिस आत्मा को मुक्ति चाहिए , उसी के वास्तविक स्वरूप की जांच करना ही सबसे बड़ा प्रश्न है
और तब ज्ञानी की स्थिति कुछ ऐसी होतीहै—–
भीतर कोई आग्रह नहीं , बाहर कोई बनावट नहीं ।
भीतर कोई पकड़ नहीं , बाहर कर्म चलता रहता है ।
भीतर कोई अधूरापन नहीं , बाहर जीवन जैसा है वैसा चलता रहता है
यही शांति हैं । यही वैराग्य है । यही साक्षी बोध है । और इसी को जनक इस प्रकरण में अपनी परम अवस्था के रूप में प्रकट करते हैं
