“त्याग से भी आगे , ग्रहण से भी आगे , केवल अपने स्वरूप में विश्राम ”
तेरहवाँ प्रकरण बहुत गहरा है। यहाँ राजा जनक किसी साधना की शुरुआत नहीं कर रहे, बल्कि आत्मज्ञान प्राप्त होने के बाद की अपनी अंतिम अवस्था बता रहे हैं। पहले के अध्यायों में उन्होंने जाना कि “मैं शरीर, मन, बुद्धि या इंद्रियाँ नहीं हूँ; मैं शुद्ध चैतन्य आत्मा हूँ।” अब उसका परिणाम क्या हुआ? परिणाम यह हुआ कि उन्हें न किसी वस्तु को पाने की बेचैनी है, न किसी वस्तु को छोड़ने का अहंकार, न कर्म करने की जिद है, न कर्म छोड़ने की जिद, न सफलता का उत्साह और न असफलता का दुःख। वे संसार से भागकर नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए भी अपने आत्मस्वरूप में स्थित हैं। यही इस पूरे प्रकरण का केंद्र है।
त्याग और ग्रहण दोनों से परे
अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् ।
त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ १ ॥
जनक कहते हैं—जिस मन की स्थिरता किसी भी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं है, ऐसी आंतरिक शांति केवल वस्तुओं को छोड़ देने से भी प्राप्त नहीं होती। इसलिए मैं त्याग और ग्रहण दोनों की आसक्ति छोड़कर अपने आत्मानंद में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
हम अक्सर सोचते हैं कि शांति पाने के लिए हमें संसार की चीजें छोड़नी पड़ेंगी—पैसा छोड़ दो, घर छोड़ दो, वस्तुएँ छोड़ दो, संबंध छोड़ दो। लेकिन अष्टावक्र यहाँ उससे भी गहरी बात बताते हैं।
समस्या वस्तु नहीं है, वस्तु के प्रति हमारी आसक्ति है।
एक व्यक्ति के पास करोड़ों रुपये हैं और वह उनके पीछे परेशान है। दूसरा व्यक्ति केवल एक वस्त्र रखता है लेकिन उसी बात का अहंकार करता है कि “मैं बहुत बड़ा त्यागी हूँ।” दोनों के मन में किसी न किसी चीज की पकड़ है।
इसलिए जनक कहते हैं—मैं केवल वस्तुओं का त्याग नहीं करता, बल्कि त्याग करने और ग्रहण करने की मानसिक प्रवृत्ति को भी छोड़ चुका हूँ।
यही वास्तविक स्वतंत्रता है।
शरीर, वाणी और मन के कर्मों से परे
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते ।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ २ ॥
शरीर के कर्मों से शरीर थकता है, वाणी के कर्मों से जिह्वा थकती है और मन के संकल्प-विकल्पों से मन थकता है। इन सबको छोड़कर मैं अपने वास्तविक पुरुषार्थ अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित होकर सुखपूर्वक रहता हूँ।
हमारा पूरा जीवन तीन स्तरों पर चलता है—
शरीर → वाणी → मन
शरीर लगातार कुछ न कुछ कर रहा है। चलना, काम करना, खाना, सोना, उठना—इनसे शरीर थकता है।
वाणी भी लगातार चलती रहती है—बोलना, समझाना, बहस करना, प्रशंसा करना, आलोचना करना।
लेकिन सबसे ज्यादा थकाने वाली चीज है मन।
मन लगातार सोचता है—
“ऐसा क्यों हुआ?”
“कल क्या होगा?”
“मुझे यह चाहिए।”
“उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?”
“मैं सफल कब होऊँगा?”
जनक कहते हैं कि आत्मज्ञान में व्यक्ति इन गतिविधियों को अपना वास्तविक स्वरूप नहीं मानता।
ध्यान दें—इसका अर्थ यह नहीं कि ज्ञानी शरीर से कोई काम ही नहीं करता या बोलता नहीं है। शरीर अपना स्वाभाविक कार्य करता रहता है। अंतर केवल इतना है कि ज्ञानी भीतर से जानता है—
“ये सब शरीर और मन के स्तर पर हो रहा है; मैं इनका साक्षी हूँ।”
इसलिए कर्म होते हुए भी भीतर शांति बनी रहती है।
—
कर्म कौन करता है?
कृतं किमपि नैव स्यादिति संचिन्त्य तत्त्वतः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वाऽऽसे यथासुखम् ॥ ३ ॥
वास्तविकता को समझकर मैं जानता हूँ कि आत्मा वास्तव में कोई कर्म नहीं करती। इसलिए शरीर और इंद्रियों के द्वारा जब जो कर्म करना आवश्यक होता है, उसे करके भी मैं अपने आत्मस्वरूप में सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ।
❓ प्रश्न
अगर ज्ञानी कर्मों का त्याग कर देता है, तो क्या वह खाना-पीना, चलना-फिरना आदि भी छोड़ देगा?
✅ उत्तर
नहीं।
यहाँ बहुत महत्वपूर्ण अंतर है।
कर्म का होना और “मैं कर्म करता हूँ” का अहंकार—दो अलग चीजें हैं।
मान लीजिए आप भोजन कर रहे हैं। शरीर भोजन कर रहा है। हाथ भोजन उठा रहा है। जीभ स्वाद ले रही है। पेट पचा रहा है। लेकिन आत्मा इन सबका साक्षी है।
अज्ञानी कहता है—
“मैं कर रहा हूँ।”
ज्ञानी जानता है—
“शरीर-इंद्रियों के स्तर पर कर्म हो रहा है; मैं शुद्ध साक्षी चैतन्य हूँ।”
इसलिए ज्ञानी कर्म से भागता नहीं, बल्कि कर्तापन के अहंकार से मुक्त होता है।
“कर्म करना या कर्म छोड़ना, दोनों में आसक्ति नहीं”
“कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनः ।
संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥”
जो व्यक्ति शरीर से अपनी पहचान रखता है, उसी में यह आग्रह रहता है कि “मुझे कर्म करना ही है” या “मुझे कर्म बिल्कुल नहीं करना है।” लेकिन मैं शरीर के साथ संयोग या वियोग—दोनों में आसक्ति से रहित होकर अपने स्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
यहाँ अष्टावक्र एक बहुत सूक्ष्म बंधन दिखाते हैं।
हम सोचते हैं—
“मुझे कर्म करना ही है।”
लेकिन दूसरी तरफ कोई व्यक्ति कह सकता है—
“मैं कुछ नहीं करूँगा, मैं सब कर्म छोड़ चुका हूँ।”
दोनों में एक समानता है—दोनों में मन की पकड़ है।
पहले व्यक्ति को कर्म करने का अहंकार है।
दूसरे को कर्म छोड़ने का अहंकार हो सकता है।
ज्ञानी इन दोनों से मुक्त है।
अगर शरीर से कर्म होना है—होने देता है।
अगर शरीर विश्राम करेगा—विश्राम करने देता है।
अगर परिस्थितियाँ बदलेंगी—उन्हें बदलने देता है।
वह भीतर से कहता है—
“मैं इन अवस्थाओं से पहले भी था और इनके बाद भी हूँ।”
—
” चलूँ, बैठूँ या सोऊँ, आत्मा वही है “
अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या वा शयनेन वा ।
तिष्ठन् गच्छन् स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५ ॥
बैठने, चलने या सोने से मुझे वास्तविक लाभ या हानि नहीं होती। इसलिए मैं खड़ा रहूँ, चलूँ या सोऊँ—हर अवस्था में अपने आत्मस्वरूप में सुखपूर्वक स्थित रहता हूँ।
आज हम कहते हैं—
“आज मैंने कुछ नहीं किया, मेरा दिन खराब हो गया।”
या—
“आज मैंने बहुत काम किया, इसलिए मैं बहुत सफल हूँ।”
लेकिन जनक का दृष्टिकोण इससे अलग है।
उनकी पहचान काम की मात्रा से नहीं, आत्मस्वरूप से है।
शरीर काम कर रहा है या आराम कर रहा है—यह शरीर का विषय है।
मन सोच रहा है या शांत है—यह मन का विषय है।
लेकिन आत्मा दोनों की साक्षी है।
इसलिए ज्ञानी की शांति बाहरी गतिविधियों पर निर्भर नहीं रहती।
सफलता और असफलता से परे
स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा ।
नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६ ॥
मैं सोता रहूँ तो भी मेरी वास्तविक कोई हानि नहीं है और बहुत प्रयास करूँ तो भी आत्मा को कोई विशेष सिद्धि प्राप्त नहीं होती। इसलिए लाभ-हानि, सफलता-असफलता के हर्ष और शोक को छोड़कर मैं अपने स्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
यह श्लोक हमें सफलता की हमारी गलत पहचान दिखाता है।
हम कहते हैं—
“मैं सफल हुआ तो मैं कुछ बन गया।”
“मैं असफल हुआ तो मैं कुछ नहीं हूँ।”
लेकिन अद्वैत कहता है—
आपकी वास्तविक पहचान सफलता या असफलता से नहीं बनती।
आप सफल हों या असफल, जाग रहे हों या सो रहे हों, धनवान हों या निर्धन—इन सब अवस्थाओं को जानने वाला जो चैतन्य है, वह वही रहता है।
इसलिए जनक सफलता का विरोध नहीं कर रहे।
वे केवल यह कह रहे हैं कि सफलता को अपनी पहचान मत बनाओ।
प्रयत्न करो, कर्म करो, लेकिन अपनी आत्म-मूल्य को परिणाम से मत बाँधो।
सुख दुख दोनों अनित्य को
सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः ।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥
मैंने बार-बार देखा है कि संसार के सभी सुख-दुःख और अवस्थाएँ परिवर्तनशील हैं। इसलिए शुभ-अशुभ कर्मों के फल की आसक्ति छोड़कर मैं अपने आत्मस्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।
🧠 गहरी समझ
यह श्लोक पूरे प्रकरण को बहुत गहराई देता है।
संसार का सुख स्थायी नहीं है।
बचपन का सुख अलग था।
युवावस्था का सुख अलग है।
धन मिलने का सुख अलग है।
प्रशंसा मिलने का सुख अलग है।
और हर सुख के साथ उसके समाप्त होने का भय भी जुड़ा हुआ है।
जिस चीज से सुख मिला, उसके खोने का डर भी पैदा हो जाता है।
इसलिए संसार का सुख परिस्थिति-निर्भर है।
लेकिन आत्मानंद किसी वस्तु से पैदा नहीं होता।
वह आपके अपने स्वरूप का आनंद है।
यही कारण है कि अष्टावक्र कहते हैं—संसार के शुभ-अशुभ, सुख-दुःख और परिवर्तनशील परिणामों को देखते हुए मैं उस चीज में टिकता हूँ जो स्वयं परिवर्तनशील नहीं है।
—
🌿 कल्पना कीजिए एक राजा है—राजा जनक। उनके पास राज्य है, धन है, परिवार है, महल है, जिम्मेदारियाँ हैं। बाहर से देखने वाला व्यक्ति कह सकता है—“यह व्यक्ति संसार में पूरी तरह डूबा हुआ है।” लेकिन आत्मज्ञान के बाद जनक की दृष्टि बदल जाती है। उन्हें समझ आता है कि जिस शरीर को वे “मैं” समझते थे, वह भी बदल रहा है; जिस मन को “मैं” समझते थे, उसमें विचार आते-जाते रहते हैं; सुख आता है और चला जाता है; दुःख आता है और चला जाता है; सफलता आती है और चली जाती है; असफलता आती है और चली जाती है। लेकिन इन सब परिवर्तनों को जानने वाला साक्षी चैतन्य कभी नहीं बदलता। तब जनक संसार छोड़ने के लिए नहीं भागते, बल्कि संसार के प्रति अपनी आसक्ति छोड़ देते हैं। अब शरीर अपना काम करता है, वाणी अपना काम करती है, मन अपनी गति से चलता है; जनक उनके साक्षी बने रहते हैं। उन्हें कर्म करने का अहंकार नहीं और कर्म छोड़ने का अहंकार भी नहीं। उन्हें सफलता प्राप्त करने की बेचैनी नहीं और असफलता से टूटने का दुःख भी नहीं। वे वस्तुओं को पकड़ने में भी स्वतंत्र हैं और छोड़ने में भी स्वतंत्र। उनका सुख किसी परिस्थिति से नहीं आता, क्योंकि उन्होंने जान लिया है कि सच्चा सुख बाहर की वस्तु में नहीं, अपने आत्मस्वरूप में है। इसलिए वे कहते हैं—“मैं जैसा हूँ, अपने उसी स्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हूँ।”
—
तेरहवाँ अध्याय हमें यह नहीं सिखाता कि “काम मत करो”, बल्कि यह सिखाता है—
> काम करो, लेकिन कर्तापन मत पकड़ो।
वस्तुओं का उपयोग करो, लेकिन उनमें अपनी पहचान मत खोओ।
सफलता मिले तो ठीक, असफलता मिले तो भी आत्मा वही है।
शरीर बदले, मन बदले, परिस्थितियाँ बदलें—लेकिन अपने साक्षी स्वरूप को पहचानो।
अंततः जनक की अवस्था यह है—
न त्याग में आसक्ति, न ग्रहण में आसक्ति।
न कर्म में बंधन, न निष्कर्म में बंधन।
न सफलता का अहंकार, न असफलता का दुःख।
न सुख को पकड़ना, न दुःख से भागना।
बस अपने शुद्ध आत्मस्वरूप में स्थित रहना।
यही जीवन्मुक्ति की अवस्था है—संसार के बीच रहकर भी भीतर से पूर्णतः स्वतंत्र होना।
