उत्साही बनो: जब जीवन को देखने का नज़रिया बदलता है, तो जीवन बदलने लगता है | winner to looser

जीवन केवल समस्याओं ,  जिम्मेदारियां और संघर्षों का नाम नहीं है । जीवन में अपने आप में एक अद्भुत रोमांच है लेकिन इस रोमांस को महसूस करने के लिए हमारे भीतर उत्साह होना चाहिए ।

उत्साह के बिना कोई महान चीज कभी हासिल नहीं हुई । ”  वास्तव में किसी भी बड़ी उपलब्धि की शुरुआत बाहर की परिस्थितियों से नहीं बल्कि भीतर कि उसे आग से होती हैं जो इंसान को बार-बार उठने , प्रयास करने और आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है ।  प्रतिभा आपके पास हो सकती हैं ,  बुद्धि आपके पास हो सकती है , संसाधन भी आपके पास हो सकते हैं लेकिन यदि भीतर उत्साह नहीं है तो यह सारी शक्तियां निष्क्रिय पड़ी रह सकती हैं । इसके विपरीत ,  जिस व्यक्ति के भीतर उसका उत्साह जीवित है , वह सीमित  साधनाओं के बावजूद रास्ते खोज लेता है ।  उत्साह व्यक्ति के व्यक्तित्व को जीवित बना देते हैं उसकी सोई हुई शक्तियों को जगाता है और उसे उन कामों के लिए भी तैयार कर देता है जिन्हें वह पहले असंभव समझता था

उत्साह क्या है ?

उत्साह और आस्था में बहुत कम अंतर है ।  हम कह सकते हैं कि उत्साह वह आस्था है जो भीतर प्रज्वलित हो चुकी है । जब किसी व्यक्ति को अपने काम अपने जीवन और अपने उद्देश्य पर विश्वास होता है ,  तो वही विश्वास ऊर्जा बनाकर उसके व्यवहार में दिखाई देने लगता है ।  उत्साही व्यक्ति केवल यह नहीं कहता है कि “सब अच्छा होगा ”  , वह उस विश्वास के आधार पर काम भी करता है । उसके भीतर एक प्रकार की जीवंतता होती है ।

वह सुबह उठकर दिन को बोझ की तरह नहीं देखता बल्कि एक नए अवसर की तरह देखा है।  कोई भी उतना बूढ़ा नहीं है जितना वह व्यक्ति जिसका उत्साह समाप्त हो चुका है। शरीर की उम्र बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन मन की उम्र तब बढ़ती है जब इंसान जीवन के प्रति अपना आश्चर्य खो देता है। एक छोटा बच्चा इसीलिए इतना उत्साही होता है क्योंकि उसके लिए दुनिया अभी भी नई है। वह बारिश को देखकर खुश होता है, किसी पक्षी को देखकर रुक जाता है, चाँद को देखकर आश्चर्य करता है और छोटी-सी चीज़ में भी आनंद खोज लेता है। धीरे-धीरे बड़ा होते-होते हम संसार को देखना बंद कर देते हैं और केवल उसकी समस्याओं को देखना शुरू कर देते हैं। शायद जीवन की सबसे बड़ी भूल यही है।


बच्चे की आँखों से दुनिया को फिर से देखना

किसी छोटे बच्चे का सबसे अद्भुत गुण क्या है?

उसका उत्साह। उसके लिए दुनिया शानदार है। हर चीज़ उसे आकर्षित करती है क्योंकि उसके भीतर देखने की संवेदनशीलता अभी मरी नहीं होती। हम बड़े होते-होते इतने व्यस्त हो जाते हैं कि सूर्यास्त दिखाई नहीं देता, बारिश केवल ट्रैफिक की समस्या बन जाती है, चाँद केवल आसमान में एक वस्तु रह जाता है और किसी अच्छे इंसान से मिलना भी सामान्य घटना लगने लगता है। लेकिन जिस दिन हम इन साधारण चीज़ों में फिर से सुंदरता देखना सीख लेते हैं, उसी दिन जीवन का रंग बदलने लगता है। हक्सले का विचार था कि बुद्धिमानी का रहस्य बालपन की भावना को बुढ़ापे तक बनाए रखना है। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें बचकाना बनना है; इसका अर्थ है कि हमारी जिज्ञासा, आश्चर्य और जीवन के प्रति प्रेम जीवित रहना चाहिए। उम्र बढ़े, अनुभव बढ़े, जिम्मेदारियाँ बढ़ें, लेकिन भीतर का वह बच्चा पूरी तरह मरना नहीं चाहिए जो कहता है—“देखो, जीवन कितना अद्भुत है!”

कोहरे में भी सुंदरता देखने वाली माँ



एक घटना इस बात को बहुत गहराई से समझाती है। एक व्यक्ति अपनी माँ के साथ एक कोहरे भरी रात में न्यू जर्सी से न्यूयॉर्क की ओर नाव में यात्रा कर रहा था। चारों ओर घना कोहरा था। उसे उस दृश्य में कोई खास सुंदरता दिखाई नहीं दे रही थी। उसके लिए यह केवल एक यात्रा थी जिसे जल्द से जल्द पूरा करना था। लेकिन उसकी माँ का अनुभव बिल्कुल अलग था। वह कोहरे को देखकर उत्साहित थीं। उन्होंने कहा, “कितना रोमांचक है!” बेटे ने पूछा, “क्या रोमांचक है?” माँ ने कहा—“देखो तो सही, कोहरा, रोशनियाँ, दूसरी नाव की बत्तियाँ, जो धुंध में रहस्यमय तरीके से गायब हो रही हैं!” तभी दूर से किसी नाव के भोंपू की आवाज़ आई और उनका चेहरा एक उत्साहित बच्चे की तरह खिल उठा। बेटा वही कोहरा देख रहा था, वही नदी देख रहा था, वही रोशनियाँ देख रहा था, लेकिन दोनों की दुनिया अलग थी। अंतर बाहर की दुनिया में नहीं था; अंतर उसे देखने वाली आँखों में था।

उस रात उसकी माँ ने उसे एक ऐसी बात कही जो जीवन भर उसके साथ रही—दुनिया को सुंदरता और रोमांच से भरा हुआ समझो। उसके प्रति संवेदनशील रहो। संसार से प्रेम करो, उसकी सुंदरता से प्रेम करो और उसके लोगों से प्रेम करो। यही उत्साह का मूल है। जब हम जीवन से प्रेम करना शुरू करते हैं, तब जीवन की छोटी-छोटी घटनाएँ भी हमें ऊर्जा देने लगती हैं। उत्साह केवल किसी बड़ी सफलता के बाद मिलने वाली भावना नहीं है; उत्साह वह दृष्टिकोण है जिसके कारण हम सामान्य जीवन में भी असाधारण आनंद खोज पाते हैं।

“मैं कोई नहीं हूँ” से “मैं बहुत कुछ हूँ” तक



एक बार एक व्याख्यान के बाद एक युवा महिला किसी लेखक से मिलने आई। उसने बहुत धीमी और कातर आवाज़ में कहा कि वह उनसे हाथ मिलाना चाहती थी, लेकिन उसे लगा कि उसे परेशान नहीं करना चाहिए क्योंकि वहाँ इतने महत्वपूर्ण लोग थे और वह स्वयं “कोई नहीं” थी। यह केवल एक वाक्य नहीं था; यह उसके भीतर बैठे हीनभावना के वर्षों का परिणाम था। उसने स्वयं को इतना छोटा मान लिया था कि दूसरों की मौजूदगी में उसे अपनी कोई कीमत दिखाई ही नहीं देती थी। लेकिन उसे यह समझाया गया कि उसका मूल्य दूसरों की तुलना से तय नहीं होता। उसे प्रतिदिन तनकर खड़े होकर स्वयं से कहना चाहिए—“मैं ईश्वर की संतान हूँ। मेरे जीवन का मूल्य है। मेरे भीतर क्षमता है।”

कुछ समय बाद वही महिला दोबारा मिली। इस बार उसके चेहरे पर चमक थी, आवाज़ में आत्मविश्वास था और व्यक्तित्व में एक अलग ऊर्जा थी। उसने मुस्कुराकर कहा—“आपने मुझे पहचाना? मैं वही पुरानी ‘मिस नोबडी’ हूँ।” लेकिन वह अब वास्तव में मिस नोबडी नहीं थी। वह बदल चुकी थी। इस घटना की सबसे बड़ी सीख यही है—मनुष्य बदल सकता है। जो व्यक्ति आज स्वयं को कमजोर, नीरस या महत्वहीन समझता है, वह कल आत्मविश्वासी और उत्साही बन सकता है। हमारी वर्तमान मानसिक स्थिति हमारा अंतिम परिचय नहीं है।

उत्साह की शुरुआत सुबह से होती है



यदि आप अपने उत्साह को बढ़ाना चाहते हैं तो सबसे पहले दिन की शुरुआत बदलनी होगी। सुबह जागने के बाद के शुरुआती मिनट बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। यदि आँख खुलते ही आपका हाथ फोन पर चला जाता है, आप नकारात्मक समाचार देखने लगते हैं, सोशल मीडिया की तुलना में फँस जाते हैं और दिन की शुरुआत शिकायतों से करते हैं, तो आपका मन पहले ही कुछ घंटों के लिए गलत दिशा पकड़ लेता है। इसके विपरीत यदि सुबह उठकर आप अपने जीवन की अच्छी चीज़ों को याद करें, अपने उद्देश्य को याद करें, प्रार्थना करें और स्वयं से कहें कि “आज मेरे पास फिर से प्रयास करने का अवसर है,” तो आपकी मानसिक दिशा बदल सकती है।

हेनरी थोरो के बारे में बताया जाता है कि वे सुबह अपने मन में अच्छी बातों को याद करते थे। यही अभ्यास आपके लिए भी शक्तिशाली हो सकता है। सुबह उठते ही अपने जीवन की तीन अच्छी चीज़ें याद कीजिए। अपने परिवार के बारे में सोचिए, अपने लक्ष्य के बारे में सोचिए, उस अवसर के बारे में सोचिए जो आज आपके सामने है। शरीर को सीधा कीजिए, गहरी साँस लीजिए और स्वयं से कहिए—“आज मैं उत्साह के साथ काम करूँगा। आज मैं शिकायत नहीं, समाधान खोजूँगा। आज मैं अपने जीवन को पूरी तरह जीऊँगा।” धीरे-धीरे आपका मन उसी दिशा में ढलने लगेगा।

उत्साह केवल सोचने से नहीं, करने से पैदा होता है



डब्ल्यू. क्लेमेंट स्टोन ने उत्साह के बारे में एक महत्वपूर्ण बात कही थी—भावनाएँ हमेशा तुरंत तर्क के अधीन नहीं होतीं, लेकिन वे हमारे कार्यों के अधीन हो सकती हैं। इसका अर्थ बहुत सरल है। कई बार हम सोचते हैं कि पहले हमारा मन उत्साहित होगा और फिर हम काम करेंगे। लेकिन वास्तविक जीवन में अक्सर इसका उल्टा होता है—पहले काम शुरू कीजिए, फिर उत्साह पैदा होता है।

मान लीजिए आपको सुबह व्यायाम करने का मन नहीं है। अगर आप मन के उत्साह का इंतजार करते रहेंगे तो शायद आप कभी शुरू नहीं करेंगे। लेकिन यदि आप जूते पहनकर बाहर निकल गए और केवल पाँच मिनट चलना शुरू कर दिया, तो शरीर सक्रिय होगा और मन भी धीरे-धीरे साथ आने लगेगा। इसी तरह पढ़ाई में मन नहीं लग रहा? किताब खोलिए और केवल दस मिनट पढ़िए। काम शुरू करने का मन नहीं है? केवल पहला छोटा काम कीजिए। कई बार उत्साह रास्ते की शुरुआत में नहीं, रास्ते पर चलने के बाद मिलता है।

यही कारण है कि स्व-प्रेरणा इतनी शक्तिशाली है। स्वयं से बार-बार कही गई सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण बातें धीरे-धीरे हमारे व्यवहार को प्रभावित करती हैं। यदि आप रोज़ अपने आपसे कहते हैं—“मैं कमजोर हूँ, मुझसे नहीं होगा, मेरी किस्मत खराब है”—तो आपका मन उसी दिशा में प्रमाण खोजने लगेगा। लेकिन यदि आप लगातार कहते हैं—“मैं सीख सकता हूँ, मैं सुधार सकता हूँ, मैं प्रयास कर सकता हूँ, मैं कठिनाइयों का सामना कर सकता हूँ”—तो धीरे-धीरे आपके व्यवहार में भी उसका प्रभाव दिखाई देने लगेगा।

जीवन और लोगों से प्रेम कीजिए



उत्साह को स्थायी बनाने का एक सबसे बड़ा तरीका है—जीवन से प्रेम करना। आसमान से प्रेम कीजिए। प्रकृति से प्रेम कीजिए। अपने काम से प्रेम करने की कोशिश कीजिए। अपने आसपास के लोगों को केवल उपयोग करने वाले या परेशान करने वाले लोगों की तरह मत देखिए। हर व्यक्ति की अपनी कहानी है, अपना संघर्ष है और अपनी आवश्यकता है। जब आप दूसरों के जीवन में थोड़ा-सा प्रकाश डालते हैं, तो आपके भीतर भी प्रकाश पैदा होता है।

एक छोटे से रेस्तराँ का मालिक फ्रेड इसका सुंदर उदाहरण था। उसका रेस्तराँ बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन उसमें आने वाले बुजुर्ग लोगों के लिए वह जगह किसी घर जैसी थी। एक बुजुर्ग व्यक्ति उदास बैठा था। फ्रेड ने उसके कंधे पर हाथ रखा और प्रेम से कहा कि सब ठीक हो जाएगा और उसके लिए उसका पसंदीदा गरम सूप बना दिया। दूसरे बुजुर्ग व्यक्ति को विदा करते समय उसने उसे केवल बिल नहीं दिया, बल्कि यह भी कहा कि सड़क पर कारों से सावधान रहना और रात में नदी पर पड़ने वाली चाँदनी को देखना—आज वह बहुत सुंदर लग रही है। सोचिए, कितनी छोटी बात थी! लेकिन उस छोटे-से वाक्य ने उस व्यक्ति को यह महसूस कराया कि दुनिया में अभी भी कोई ऐसा इंसान है जो उसकी परवाह करता है।

यही उत्साह है। उत्साह केवल जोर से बोलना या हर समय मुस्कुराना नहीं है। उत्साह का वास्तविक अर्थ है जीवन के प्रति हाँ कहना। दूसरों के भीतर जीवन जगाना। जहाँ निराशा हो वहाँ आशा ले जाना। जहाँ उदासी हो वहाँ प्रेम ले जाना। जहाँ कोई स्वयं को महत्वहीन समझ रहा हो, वहाँ उसे उसकी कीमत याद दिलाना।

अपनी ऊर्जा की रक्षा कीजिय



उत्साह बनाए रखने के लिए केवल ऊर्जा खर्च करना पर्याप्त नहीं है; ऊर्जा को पुनः प्राप्त करना भी आवश्यक है। यदि आप लगातार तनाव में रहते हैं, हर बात की चिंता करते हैं, हर परिणाम को अपने नियंत्रण में रखने की कोशिश करते हैं और हर छोटी असफलता को व्यक्तिगत हार समझते हैं, तो धीरे-धीरे आपकी मानसिक ऊर्जा समाप्त होने लगेगी। जब ऊर्जा घटती है, तो उत्साह भी कम होने लगता है।

इसलिए जीवन में एक समय ऐसा भी आता है जब आपको अपनी पूरी कोशिश करने के बाद परिणाम छोड़ना सीखना पड़ता है। प्रार्थना कीजिए, मार्गदर्शन माँगिए, अपनी बुद्धि और मेहनत का सर्वोत्तम उपयोग कीजिए और फिर परिणाम को लेकर अत्यधिक चिंता करना छोड़ दीजिए। इसका अर्थ आलस्य नहीं है। इसका अर्थ है—प्रयास मेरे हाथ में है, परिणाम पूरी तरह मेरे हाथ में नहीं। यह समझ मन को बहुत बड़ी स्वतंत्रता देती है।

हार चुकी टीम में जीत का विश्वास



मशहूर फुटबॉल कोच विन्स लोम्बार्डी जब ग्रीन बे पैकर्स के पास पहुँचे, तब टीम पहले से ही पराजित और निराश थी। खिलाड़ियों में आत्मविश्वास कम था। ऐसे समय में एक सामान्य नेता शायद खिलाड़ियों की गलतियाँ गिनाता, उनकी कमजोरियाँ बताता और उन्हें डराकर बेहतर प्रदर्शन कराने की कोशिश करता। लेकिन लोम्बार्डी ने कुछ अलग किया। उन्होंने खिलाड़ियों के सामने खड़े होकर उन्हें एक बड़ी तस्वीर दिखाई—उन्होंने कहा कि वे एक महान टीम बनने जा रहे हैं, मैच जीतने जा रहे हैं, रणनीति सीखेंगे, दौड़ना सीखेंगे, मुकाबला करना सीखेंगे और प्रतिस्पर्धी टीमों से बेहतर खेलेंगे। उन्होंने खिलाड़ियों के भीतर सबसे पहले विश्वास और उत्साह पैदा करने की कोशिश की।

यह बात केवल खेल के मैदान पर लागू नहीं होती। परिवार, व्यवसाय, पढ़ाई, नौकरी या अपने व्यक्तिगत जीवन में भी जब इंसान केवल समस्याओं को देखता है तो समस्या बड़ी होती जाती है। लेकिन जब वह लक्ष्य की तस्वीर अपने मन में स्पष्ट रखता है और उसके प्रति उत्साही होकर काम करता है, तो उसकी ऊर्जा बदल जाती है। कभी-कभी लोगों को केवल योजना की नहीं, बल्कि यह विश्वास दिलाने की जरूरत होती है कि “हम कर सकते हैं।”

उत्साह को अपनी पहचान बना लीजिए



उत्साह कोई एक दिन का मोटिवेशन नहीं है। यह एक जीवनशैली है। आप इसे रोज़ छोटे-छोटे कार्यों से विकसित कर सकते हैं। सुबह सकारात्मक विचारों के साथ शुरुआत कीजिए। अपने लक्ष्य को याद कीजिए। शरीर को सक्रिय रखिए। प्रेरणादायक साहित्य पढ़िए। प्रार्थना या ध्यान कीजिए। ऐसे लोगों के साथ समय बिताइए जो आपके भीतर ऊर्जा जगाते हैं। प्रकृति को देखिए। अपने काम में अर्थ खोजिए। दूसरों की सहायता कीजिए। और सबसे महत्वपूर्ण—अपने शब्दों पर ध्यान दीजिए।

बार-बार “मेरे साथ हमेशा बुरा होता है” कहने वाला मन धीरे-धीरे उसी विश्वास को अपना लेता है। इसके बजाय कहिए—“मेरे सामने कठिनाई है, लेकिन मैं सीख सकता हूँ।” “आज अच्छा दिन है।” “मैं अपनी पूरी कोशिश करूँगा।” “मैं हर दिन बेहतर बन रहा हूँ।” ये वाक्य जादू नहीं हैं, लेकिन लगातार दोहराए गए विचार आपके व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।

सबसे बड़ा दिवालियापन उत्साह खो देना है



धन खो जाने पर इंसान फिर से कमा सकता है। नौकरी चली जाए तो नई नौकरी मिल सकती है। व्यवसाय में नुकसान हो जाए तो दोबारा शुरुआत की जा सकती है। एक अवसर चला जाए तो दूसरा अवसर आ सकता है। लेकिन यदि इंसान ने अपने भीतर का उत्साह ही खो दिया, तो वही सबसे बड़ी हानि है। क्योंकि उत्साह ही वह शक्ति है जो उसे दोबारा खड़ा करती है।

इसलिए अपने जीवन की परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, अपने भीतर की आग को बुझने मत दीजिए। असफलता आए तो उससे सीखिए। आलोचना मिले तो उसे परखिए। कठिन समय आए तो धैर्य रखिए। लेकिन जीवन के प्रति अपना प्रेम मत खोइए।

हर सुबह स्वयं से कहिए—“आज मुझे एक और दिन मिला है। मैं इसे शिकायत में नहीं, निर्माण में लगाऊँगा। मैं अपने काम में उत्साह लाऊँगा। मैं अपने आसपास के लोगों में आशा जगाऊँगा। मैं कठिनाइयों के बावजूद आगे बढ़ूँगा।”

क्योंकि अंततः उत्साही व्यक्ति वह नहीं है जिसकी जिंदगी में समस्याएँ नहीं हैं। उत्साही व्यक्ति वह है जो समस्याओं के बीच भी जीवन की संभावना देखता है। वह कोहरे में भी रोशनी देखता है, कठिन रास्ते में भी अवसर देखता है और असफलता में भी सीख देखता है। वह हर सुबह दुनिया को फिर से देखने की कोशिश करता है—एक बच्चे की आँखों से।

जीवन रोमांचक है। प्रश्न यह नहीं है कि जीवन में कितना रोमांच है; प्रश्न यह है कि आपकी आँखों में उसे देखने का कितना उत्साह बचा है।

आज से अपने भीतर के उस बच्चे को फिर से जगाइए। जीवन को महसूस कीजिए। लोगों से प्रेम कीजिए। अपने उद्देश्य के लिए काम कीजिए। अपनी ऊर्जा की रक्षा कीजिए और उत्साह को केवल भावना नहीं, बल्कि अपनी पहचान बना लीजिए।

क्योंकि जब उत्साह जीवित रहता है, तब इंसान केवल जीवन काटता नहीं—वह जीवन को पूरी तरह जीता है।

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