5 निश्चय जो आपकी जिंदगी बदल देंगे| अष्टावक्र गीता अध्याय 11

अष्टावक्र गीता का 11 अध्याय में हमें ” निश्चय शक्ति ” ( firm conviction) सीखना है ।  ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को बताते हैं कि जब तक इंसान की बुद्धि में यह बातें पक्की नहीं होती तब तक वह भटकता रहता है इस अध्याय को ” उपशम प्रकरण ” भी कहा जाता है जिसका अर्थ है शांति का मार्ग।

1. nature is supreme (Bhav-Abhav aur Swabhav ka Rahasya )

सब कुछ अपने स्वभाव ( nature ) नेचर से हो रहा है इस दुनिया का निर्माता ईश्वर है जहां हम यह मान लेते हैं कि  ” मैं करता नहीं हूं ”  तो सारे क्लेश ( troubles) अपने आप खत्म हो जाते हैं .

भाव और अभाव ,  होना ना होना प्रकृति के स्वभाव से आते हैं जो व्यक्ति यह नीचे कर लेता है कि भाई निर्विकार और क्लेश रहित हो जाता है ।

* ” जो बदलने वाला है उसे पकड़ने का प्रयास ही दुख है “

चित की शांति आत्मज्ञान से ही होती है बिना आत्मज्ञान के किसी उपाय करके नहीं होती इस वास्ते  प्रथम आत्मज्ञान के साधनों को कहते हैं

भाव भाव अर्थात स्थूल सूक्ष्म रूप करके जितने विकार अर्थात कार्य हैं वह सब माया और माया के संस्कारों से ही उत्पन्न होते हैं और निर्विकार आत्मा से कोई भी विकार नहीं होता है

2 accepting ups and downs ( Ishwar hi Sabka Karta Hai )

विपत्ति ( misfortune) and  संपति ( wealth) समय के साथ आती-जाती रहती हैं एक ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि यह सब  ” दैविक “destiny है इसके लिए वह ना तो ज्यादा खुश होता है और ज्यादा दुखी होता है

जब व्यक्ति यह देख लेता है कि सब कुछ ईश्वर के नियम से हो रहा है तो उसकी सारी अपेक्षाएं (एसपेक्टेशन ) गल जाती हैं

ईश्वरआत्मा की सता करके जगत भर के पदार्थ उत्पन्न होते हैं जीवात्मा की सता करके शरीर के नख रोमादिक उत्पन्न होते हैं  । क्योंकि वह आत्मा अपने शरीर मात्रा में ही और इसकी कारण परिच्छिन्न  है उसकी सतह करके जगत के पदार्थ उत्पन्न नहीं हो सकते हैं और ईश्वर स्वतंत्र व्यापक है और सारे जगत से बड़ा है उसकी उपाधि माया भी बड़ी है ।

इसी वास्ते सर्वत्र ईश्वर की सतह करके पदार्थ उत्पन्न होते हैं और जीव की उपाधि जो अंत:करण है वह अल्प शरीर में स्थित है  , इस वास्ते से उसकी सत्ता करके शरीर के अवयव आदि बढ़ाते हैं  । अल्प उपाधि वाला होने से जीव अल्पज्ञ अल्प शक्तिशाली वाला है और बड़ी उपाधि वाला होने से ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है  , इसी कारण ईश्वर को ही लोग जगत का कर्ता मानते हैं वास्तव में वह कर्ता नहीं है  , केवल माया उपाधि करके कर्तव्य व्यवहार भी ईश्वर के गौण है मुख्य नहीं है वह वास्तव में अकर्ता है और जीव भी वास्तव में अकर्ता है

3 chinta: the root of all misery

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी”

दुख सिर्फ चिंता ( worrying ) से पैदा होता है जो व्यक्ति इस सच को जान लेता है वह सब लालच और मोह को छोड़कर शांत को हो जाता है

इस संसार में पुरुष को चिंता करने से ही दुख उत्पन्न होता है बिना चिंता के दुख नहीं होता है ,  जो इस प्रकार निश्चय करता है वह चिंता को त्याग देता है और शांत चित्त और स्थिर अंतरकरण वाला होता है और श्रम से रहित होकर भी कर्मों से जन्म अर्थों का भोगने वाला नहीं होता है

जो यथार्थ बौद्ध वाले हैं उनको कर्मों का फल नहीं होगा क्योंकि प्रथम वे फल की कामना से रहित होकर कर्मों को करते हैं दूसरे में श्रेष्ठचार के लिए कर्मों को करते हैं तीसरे में कर्मों को देह इंद्रियादिक  के धर्म जानते हैं अपने आत्मा का धर्म नहीं मानते चौथ अहंकार से रहित होकर वह कर्मों को करते हैं इन्हीं चार हेतु करके उनको कर्मों का फल नहीं होता

गीता में कहा है __

यस्य नावं कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।

हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १ ॥

जिसका देह इन्द्रियादिकों में अहंकृतभाव नहीं है, अर्थात् मैं देह हूँ, या मेरा यह देह है, इस प्रकार की जिसका भावना नहीं है और कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि भी जिसकी लिपायमान नहीं हो सकती है, सो विद्वान् यदि प्रारब्धकर्म के वश से शरीरादिकों करके तीनों लोकों का बध भी कर देवे, तो भी उसको ऐसा करने का फल लिपायमान नहीं होता है। जो इस प्रकार निश्चय करता है कि सुख-दुःखा-दिक ये सब प्रारब्धकर्म के वश से जीवों को होते हैं, वह विद्वान् परिश्रम से रहित प्रारब्धवश से कर्मों को करता हुआ उनके फल के साथ लिपायमान नहीं होता है । ४ ।।

4 you are not the body ( मै देह नहीं हु)

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी ।

कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ११. ६ ॥

ज्ञानवान् का ऐसा निश्चय होता है “नाहं देहः” मैं देह नहीं हूँ और “न मे देहः” मेरा यह देह नहीं है और मैं नित्य बोध-स्वरूप हूँ । आत्म-ज्ञान करके देहादिकों में दूर हो गया है अहं और मम अभिमान जिसका, कर्तव्य और अकर्तव्य जिसका बाकी नहीं रहा है, और कृत तथा अकृत का स्मरण भी जिसको नहीं है वही ज्ञानवान् जीवन्मुक्त कहा जाता है।

ब्रह्मा से लेकर स्तंबयरत संपूर्ण जगत मेरा ही रूप है  , अर्थात में ही स्वरूप हूं ऐसा निश्चय करने वाला जो पुरुष है वहीनिर्विकल्प समाधि वाला जीव मुक्त है वही विषय रूपी मल के संबंध से भी रहित है, वही शांत चित्त वाला है और वही प्राप्तप्राप्त विषयों में इच्छा से रहित  है वही परम संतोष वाला है अब वही अपने आत्मानंद करके ही पूर्ण है

5 आत्म साक्षात्कार को जानो

अज्ञान के अनेक अंश है ! जिसे विद्वान के अंतःकरण रूपी अंश का जो अज्ञान का कार्य है नाश हो  जाता है  , उसी को अपने आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है और बाकी के जीवों को नहीं होता है उनका जगत भी बना रहता है । जैसे 10 पुरुष सोए हुए अपने-अपने सपनों को देखते हैं उनमें से किसी जिसकी निद्रा दूर हो गई उसी का संपन्न प्रपंच नष्ट हो जाता है।  बाकी के पुरुषों का बना रहता है जिस पुरुष को ऐसा निश्चय हो गया कि जगत अपनी सत्ता से शुन्य हैं  , ब्रह्म की सता करके सत्य व्रत भान होता है वास्तव में मिथ्या है वहीं पुरुष शांति को प्राप्त हो जाता है।

जब आपको पता चल जाए कि सामने दिखने वाला सोना सिर्फ एक पीतल है जिसके ऊपर पॉलिश की गई तो क्या आप उसे पाने की इच्छा करेंगे ? नहीं ,ब इसलिए सच्चाई जानते की सारी  वासना विषय ( desire ) गिर जाती है

एक फिल्म स्क्रीन पर बहुत सारे कैरेक्टर्स लड़ाई दुख और सुख दिखते हैं  , देखने वाला इमोशनल हो जाता है लेकिन जो निश्चायी जिससे पता है वह जानता है कि स्क्रीन पर सिर्फ लाइट और शैडो का खेल है वहां सच में कुछ नहीं हो रहा है।

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