Ashtavakra Gita chapter 9 slok 6 details explain
* “क्या गुरु आपको मुक्त कर सकता है?
* क्या कोई और आपकी मुक्ति की गारंटी ले सकता है?
* या मुक्ति एकदम व्यक्तिगत, भीतर का सफर है?
अष्टावक्र गीता 9 .6
कृत्वा मूर्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किम् गुरुः ।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ६ ॥
मूर्तिपरिज्ञानम् – अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान
चैतन्यस्य – चैतन्य/आत्मा का
निर्वेद – वैराग्य
समता – सभी में एक भाव
युक्त्या – विवेकपूर्ण समझ से
यः तारयति – जो स्वयं को मुक्त कर लेता है
न किम् गुरुः – वही असली ‘गुरु’ है, कोई बाहरी नहीं
अष्टावक्र जी कहते हैं कि
जो व्यक्ति विवेक, वैराग्य और समता की बुद्धि का उपयोग करके —
अपने चैतन्य-स्वरूप का अनुभव कर लेता है…
उसी ने खुद को संसार से पार कर दिया।
उसी का नाम ‘गुरु’ है — कोई दूसरा नहीं।
मतलब:
मुक्ति बाहरी व्यक्ति से नहीं मिलती,
मुक्ति अपने ही पुरुषार्थ से मिलती है।
* बाहरी गुरु आपको रास्ता दिखा सकता है, पार नहीं लगा सकता
Ashtavakra कहते हैं —
लोग यह मानकर बैठे हैं कि गुरु मोक्ष दिला देगा, पर ये भ्रम है।
गुरु मंत्र दे सकता है,
मार्ग दिखा सकता है,
भ्रम दूर कर सकता है—
पर चलना आपको ही है।
जो खुद नहीं चलता, उसे कोई नहीं चला सकता।
अष्टावक्र स्पष्ट लिखते हैं:
दुनियावाले यह नहीं समझते कि ‘गुरु’ शब्द शास्त्रों में किसके लिए आया है।
संसारी लोग किसी के कान में मंत्र डाल देने को ही ‘दीक्षा’ और ‘गुरुत्व’ मान लेते हैं।
वे बताते हैं कि ऐसा मानना—
“दुःख का जनक है।”
यही कारण है कि:
मुसलमान मानते हैं— पैगम्बर पाप छुड़ाएँगे
ईसाई मानते हैं— ईसा पाप छुड़ा देंगे
हिंदू मानते हैं— गुरु पाप नष्ट कर देंगे
परन्तु यह केवल मान्यता है, शास्त्रार्थ नहीं।
” मुक्त तुम खुद होते हो”
संसारी लोगों ने मान रखा है कि गुरु हमको पापों से छुड़ा देगा ऐसा उनका मानना दुख का जनक है क्योंकि वेद और शास्त्र में कान में मंत्र फूटने वाले को गुरु नहीं लिखा है किंतु जो अज्ञान और ज्ञान के कार्य जन्म मरण रूपी संसार से आत्मज्ञान उपदेश करके छुड़ा देवी और चित के संशय को दूर कर देवे उसका नाम गुरु है ।
* असली गुरु कौन ?
अष्टावक्र इस श्लोक से एक कड़ा सत्य बता रहे हैं:
सच्चा गुरु ‘कान में मंत्र’ देने वाला नहीं,
बल्कि वह है जो चित्त में बैठे संशय को खत्म कर दे।
जैसे:
वशिष्ठ → रामजी ने गुरु के प्रति हजारों शंकाएं की थी , जब सबका उतर वरिष्ठ जी ने देकर रामजी के संशय मिटाते हैं और आत्मा बोध करवाते हैं। तब रामजी ने गुरु माना।
कृष्ण → अर्जुन के भ्रम काटते हैं , तब भगवान कृष्ण जी ने विराट रूप दिखाया
और तभी उन्हें ‘गुरु’ माना गया।
गुरु = वह जो अज्ञान काट दे
न कि वह जो भीड़ बनाए।
गुरु वह है जो—
अज्ञान को नष्ट कर दे
संशय मिटा दे
आत्मस्वरूप का बोध करा दे
मार्ग दिखा दे
विवेक विकसित करे
गुरु कभी यह नहीं कहता—
“मैं तुम्हें मुक्त कर दूंगा।”
बल्कि वह कहता है—
“तुम्हें अपने पुरुषार्थ से मुक्त होना है।”
अष्टावक्र चार प्रकार के गुरु बताते हैं:
1. परम गुरु (आत्मज्ञानी) — जो संशय मिटाए
2. मंत्र गुरु — केवल मंत्र देने वाला
3. विद्या गुरु — सांसारिक शिक्षा देने वाला
4. सत्संग गुरु — संगति से प्रेरणा देने वाला
अष्टावक्र जी ने आत्म दृष्टि को लेकर कहां है कि संसारी मूर्ख कान में मंत्र फूंकने वाले गुरु के ही अज्ञानार्थ शिष्य पूरे पशु बन जाते हैं क्योंकि उनको बोध नहीं है कि पारमार्थिक गुरु आत्मज्ञानि का ही नाम है । ऐसे गुरु तो संसार में बहुत दुर्लभ है ।
* नकली गुरु क्यों खतरनाक हैं?
आज के समय अष्टावक्र की यह सीख 100% लागू होती है।
वह कहते हैं:
जो स्वयं ही अज्ञान में है,
जो मंत्र दे पर समझ न दे,
जो शिष्य को डराए,
जो विभाजन करवाए…
वो गुरु नहीं — वो केवल अपनी जीविका के लिए भीड़ इकट्ठा करने वाले लोग हैं।
कबीर भी कहते हैं:
“गुरु लोभी, शिष्य लालची,दोनों खेलें दांव;
दोनों डूबे बापड़े,बैठ पथर की नाव।”
तो क्या गुरु की जरूरत नहीं है?
ज़रूरत है — पर सही अर्थ में।
गुरु वह नहीं जो ‘तुम्हारी मुक्ति’ का दावा करे।
गुरु वह है जो ‘तुम्हें स्वयं की पहचान’ दे।
बाकी फैसला —
तुम्हारी साधना,
तुम्हारे विवेक,
तुम्हारी समझ,
और तुम्हारी शांति पर निर्भर है।
कबीर जी कहते हैं
गुरु लोभी, शिष्य लालची, दोनो खेलें दाँव ।
दोनो डूबे बापड़े, बैठ पथर की नाव ॥
गुरुजन जाका है गृही, चेला गृही जो होय ।
कीच कीच को धोवते, दाग न छूट कोय ॥
बँधे को बँधा मिले, छूटे कौन उपाय ।
सेवा कर निर्बंध की, पल में देय छुड़ाय ॥
अर्थ :
यदि गुरु लोभ से भरा हो और शिष्य लालच से, तो दोनों मिलकर एक जुए जैसा खेल खेलते हैं। अंत में दोनों ही डूब जाते हैं, क्योंकि वे पत्थर की नाव में बैठे हैं। जिस गुरु का मन ही गृहस्थी (आसक्ति) में फँसा हो और शिष्य भी उसी आसक्ति में डूबा हो, तो दोनों कीचड़ से कीचड़ धोने का प्रयास कर रहे हैं।
ऐसे में किसी का भी दाग नहीं छूटता। यदि बँधा हुआ व्यक्ति बँधे हुए से मिले,
तो छूटने का कोई उपाय नहीं।
लेकिन जो निर्बंध (मुक्त) है,
उसकी सेवा से क्षण में मुक्ति मिल सकती है।
मुक्ति किसी गुरु से नहीं, अपने आत्म-बोध से होती है। सच्चा गुरु वही है जो तुम्हें तुमसे मिला दे।”
जो गुरु ज्ञान से हीन हो, मिथ्यावादी हो, विडम्बी हो, उसका त्याग कर देना चाहिए । क्योंकि जब वह अपना ही कल्याण नहीं कर सकता है, तो शिष्यों का कल्याण क्या करेगा। ऐसे मूर्ख अज्ञानी गुरु के त्याग में बहुत से शास्त्रोक्त प्रमाण हैं, पर मूर्ख अज्ञानी लोग कुकर्मी मूर्ख गुरुओं को नहीं त्यागते हैं, क्योंकि प्रथम तो लोग आत्मा के ही कल्याण को नहीं जानते हैं। दूसरे उनके चित्त में भय रहता है कि गुरु के निरादर करने से हमारे को कोई विघ्न न हो जावे, इसी से मूर्खी के मूर्ख जन्म भर उनके पशु बने रहते हैं। इन मूर्ख शिष्य गुरुओं का इस जगह में निरूपण करने का कोई प्रकरण नहीं है, इस वास्ते उनका प्रसंग छोड़ दिया जाता है। हे राजन् ! ज्ञान की प्राप्ति के अनन्तर गुरु- शिष्य-व्यवहार भी मिथ्या हो जाता है, क्योंकि उसकी भेद- बुद्धि नहीं रहती है ।
