वासना ही संसार है  , वासना ही दुख का कारण है |  अष्टावक्र गीता अध्याय 9 श्लोक 8 explain| life lessons from ashtavakra Gita

वासना ही संसार है इसलिए सब वासनाओं को छोड़ दें वासना का त्याग ही संसार का त्याग है अब तू जहां चाहे , जैसे चाहे , स्थित हो जा ||

वासना क्या है ?

वासना केवल कामना नहीं है , वासना का अर्थ है __

*कुछ पाने की चाह, कुछ बनने की इच्छा ,  कुछ छोड़ने की चाह ,वोमुक्ति पाने की इच्छा जो चाह  वही वासना है।

और जब यह चाहा तब तक मन भागता है ,  तब तक मरण जन्म चलता है ,  तब तक सुख-दुख का चक्र चलता है ।

इसीलिए कहा है की वासना एवं संसार:

वासना ही संसार है

वासनाएं तीन प्रकार की है :

1 लोक वासनाएं अर्थात स्वर्ग आदि उत्तम लोक की प्राप्ति मुझको हो

2. दूसरी शास्त्र वासना अर्थात सब शास्त्रों को पढ़कर मैं ऐसा पंडित हो जाऊं कि मेरे तुल्य दूसरा कोई ना हो

3. तीसरी शरीर की वासना अर्थात मेरा शरीर सबसे सुंदर और पुष्ट सदैव बना रहे

इन तीनों प्रकार की वासनाओं के त्याग करने से पुरुष बंधन से छूट जाता है और उसका चित्र आत्मा में ही स्थिर हो जाता है

संसार छोड़ना क्यों कठिन लगता है

क्योंकि लोग सोचते हैं कि जंगल जाना पड़ेगा घर छोड़ना पड़ेगा कम छोड़ना पड़ेगा , अष्टावक्र जी कहते हैं कि नहीं ।

केवल वासना छोड़ो

जब चाह मिट जाती है तब संसार अपने आप गिर जाता है

वासना का त्याग = संसार का त्याग

भूतों के विकार जो देह इंद्रिय आदिक है उनको यथार्थ रूप से तुम भूत मात्र देखो आत्मा रूप करके उनको तुम मत देखो जब तुम देखोगे तब उसी क्षण में शरीर आदि को से पृथक होकर आत्म स्वरूप में स्थित हो जाओगे

हम जिसे संसार कहते हैं घर पैसा शरीर रिश्ते दुख संघर्ष व असल में बाहर नहीं है

संसार = मन के अंदर उठने वाली चाह है

वासनाओं के त्याग करने से पुरुष बंधन से छूट जाता है और उसका चित् आत्मा में भी स्थिर हो जाता है यही वासनाएं मिलकर संसार बनती हैं ।

अब जैसे चाह , जहां चाहे  , स्थित हो जा

जब वासना चली गई तो अब कोई नियम नहीं

समस्त वासनाओं के त्याग कर देने से शरीर की स्थिति कैसे होगी ?

शारीर वासना से नहीं प्रारब्ध कर्म  से चलता है , जैसे बच्चा बिना वासना से भी सांस लेता है पागल व्यक्ति भी बिना इच्छा के भी चलता फिरता है शरीर अपने नियमों से चलता है वासना का संबंध शरीर से नहीं बल्कि अहंकार और मन से हैं

दूध पीने वाला बालक और पागल व्यक्ति दोनों के शरीर वासना से नहीं चलते फिर भी उनका शरीर भूख लगने पर खाता है  , चोट लगने पर प्रतिक्रिया करता है इसलिए यह डर की वासना छोड़ने से शरीर नष्ट हो जाएगा यह केवल अज्ञान है

यह देह केवल प्रारब्ध के अनुसार चलती हैं अंदर से ज्ञानी  , शांत हल्का मुक्त साक्षी रूप में स्थित है

Q. यदि पुरुष समग्र वास्ता का त्याग कर देगा तब आत्मज्ञानी को भी वह नहीं प्राप्त होगी क्योंकि मुमुक्षु को आत्मज्ञान की प्राप्ति की वासना सर्वदा बनी रहती है और ज्ञानवन को भी चित के निरोध करने की वासना बनी रहती है  जीव मुक्त होने की उसकी वासना बनी रहती है तब सर्व वासनाओं का त्याग तो किसी से भी नहीं हो सकता

उत्तर- ‘वाल्मीकीय रामायण’ में ऐसा लिखा है-वासना द्विविधा प्रोक्ता शुद्धा च मलिना तथा । मलिना जन्महेतुः स्याच्छुद्धा जन्मविनाशिनी ॥ १ ॥ दो प्रकार की वासनाएँ कही गई हैं- पहली शुद्धवासना, दूसरी मलिन वासना।

किसी प्रकार से मेरी मुक्ति हो और मैं अपनी आत्मा का साक्षात्कार करूँ, उसके लिये जो वृत्ति आदिकों का निरोध करना है, वह शुभ वासना है।

विषय भोगों की प्राप्ति की जो वासना है, वह मलिन वासना है।

दोनों में से मलिन वासना जन्म का हेतु है और शुद्ध वासना जन्म का नाशक है। जो चतुर्थ भूमिकावाला ज्ञानी है और जो मुमुक्षु है, उनके लिये शुभ वासना का त्याग नहीं है, किन्तु अशुभ वासना का ही त्याग है। क्योंकि विदेहमुक्ति में आत्म-ज्ञान की ही प्रधानता है । शुभ वासना का नाश उपयोगी नहीं है, परन्तु जीवन्मुक्ति के लिये समग्र वासनाओं का त्याग और मन का भी नाश और आत्म-ज्ञान, ये तीनों उपयोगी हैं।

यहाँ पर अष्टावक्रजी जीवन्मुक्ति के मुख के लिये जनकजी से कहते हैं कि तू समग्र वासनाओं का त्याग कर

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