न ते सङ्गोऽस्ति केनापि कि शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि ।
संघातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज ॥५. १ ॥ आ. गीता
हे शुद्ध स्वरूप शिष्य ! जब तेरा किसी भी वस्तुओं से कोई वास्तविक संबंध ही नहीं है तो तू क्या त्यागना चाहता है ?
“हे शिष्य! तेरी किसी के साथ कोई भी आसक्ति (attachment) नहीं है।
तू अपने स्वरूप से, अपनी प्रकृति से बिल्कुल शुद्ध है।
ऐसे में तू किन चीज़ों को त्यागना चाहता है?
अब तू बस इस देह—इंद्रियों—मन के समूह (संघात) का विलय कर दे,
और अपने वास्तविक स्वरूप—परम शांति, मोक्ष—में स्थापित हो जा।
* “तू शुद्ध है “
मन ,भावनाएं , देह ,विचार _ इस सब बाद में आए तेरी असली पहचान इसे अलग है।
* “तेरा किसी से कोई संग नहीं है।”
संग (attachment) दो चीज़ों के बीच होता है—
लेकिन आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है।
तो उससे किसी चीज़ का स्थायी संबंध कैसे होगा?
सारा संग केवल मन का भ्रम है।
* “किसको त्यागेगा?”
त्याग उन्हीं चीज़ों का होता है जिनसे लगाव हो।
पर तू जिनसे भी जुड़ा हुआ लगता है—वह जुड़ाव केवल देह-विचार का खेल है,
आत्मा का नहीं।
*“संघात-विलयम् कुर्वन्…” – Real sadhana
संघात = शरीर + मन + इंद्रियाँ + अहंकार
विलय = dissolve, अलग देखना, समाप्त करना
अर्थ:
‘मैं शरीर हूँ’ यह गलत पहचान छोड़ दे।
‘मेरा मन’, ‘मेरी इंद्रियाँ’, ‘मेरा दुख’ — यह सब छोड़ दे।
ये “तू” नहीं है।
* लयम् व्रज”— मोक्ष यहीं है
मोक्ष कहीं जाने से नहीं,ग़लत पहचान मिटने से मिलता है।
देवी भागवत में कहा है-
शुद्धो मुक्तः सर्दवात्मा न वै बध्येत कहिचित् ।
बन्धमोक्षौ मनस्संस्थौ तस्मिञ्छान्ते प्रशाम्यति ॥ १ ॥
आत्मा सदैव शुद्ध और मुक्त है, वह कदापि बंध को नहीं प्राप्त होता है बंध और मोक्ष दोनों मन के धर्म हैं। मन के शान्त होने से बंध और मोक्ष का नाम भी नहीं रहता है। आत्मा में मन के लय करने से सारा जगत् लय को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥
मन के संकल्प से इस जगत उत्पन्न हुआ है और मन के ही लें होने से जगत ले हो जाता है !
आत्मा सदैव शुद्ध और मुक्त है, वह कदापि बंध को नहीं प्राप्त होता है बंध और मोक्ष दोनों मन के धर्म हैं। मन के शान्त होने से बंध और मोक्ष का नाम भी नहीं रहता है । आत्मा में मन के लय करने से सारा जगत् लय को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥
