अष्टावक्र गीता का 9 अध्याय त्याग वैराग्य और आत्म स्वरूप में स्थित होने की चरम शिक्षा देता है यह अध्याय कर्म , अकर्म , ज्ञान , भोग , मत मतांतर , गुरु और संसार सबको एक ही तलवार से काट देता है
यह अध्याय उन लोगों के लिए नहीं है जो सिर्फ सुधार चाहते हैं यह उन लोगों के लिए है जो पूर्ण मुक्ति चाहते हैं
1 कृत्य अकर्त्य और द्वंद : कभी शांत नहीं होते
कृताकृते चा द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा ।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती ।। १ ॥
यह मेरे को कर्त्तय है, और यह मेरे को कर्त्तव्य नहीं है, इसी का नाम कृत और अकृत है अर्थात् इस तरह का जो आग्रह है अर्थात् अवश्य ही मेरे को यह करना उचित है, और अवश्य ही मेरे को यह करना उचित नहीं है, इन दोनों में अभिनिवेश अर्थात् हठ न करना और द्वन्द्व जो सुख-दुःख हैं, मैं इन दोनों से रहित हो जाऊँ इसमें आग्रह न करना, क्योंकि वे दोनों किसी भी देहधारी के कभी शान्त नहीं हुए हैं और न होवेंगे, इस वास्ते अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इन कृताऽऽकृत आदिकों के त्याग से भी तू वैराग्य को प्राप्त हो । क्योंकि हे शिष्य ! तू अव्रती है, तेरा आग्रह याने हठे किसी में भी नहीं है ।।
कर्तव्य और कर्तव्य और सुख-दुख जैसे द्वंद ना कभी शांत हुए ना कभी होंगे मनुष्य हमेशा किसी न किसी द्वंद में रहेगा ,सही _गलत , अच्छा बुरा , धर्म _ अधर्म , सफलता _ असफलता
अष्टावक्र जी कहते हैं कि
इनसे लड़ना मूर्खता है इनसे ऊपर उठाना ही वह बुद्धिमानी है । जब यह स्पष्ट हो जाता है कि ” द्वंद संसार की प्रकृति है ” तभी निर्वेद (डिस्पैशन) पैदा होता है
2 सच्चा वैराग्य कैसे आता है?
अष्टावक्र जी कहते हैं कि है हे शिष्य! हजारों मनुष्य में से किसी एक भाग्यशाली पुरुष के चित में वैराग्य उत्पन्न होता है उसके जीने की और भोगने की इच्छा भी निवृत हो जाती है क्योंकि संसार के पदार्थ में ग्लानि और दोष दृष्टि का नाम ही वैराग्य है । जितने संसार की उत्पत्ति और नाश वाले पदार्थ हैं सब में दोष लगे हैं ,संसार में स्त्री, पुत्र। धन और शरीर तथा इंद्रिय आदिक सबको प्यार और इन्हीं के सुख के लिए पुरुष अनेक अनार्थों को करता है और यही सब जीवो के बंधन के कारण है इस वास्ते बिना इसमें वैराग्य प्राप्त हुए कदापि मोक्ष को नहीं प्राप्त होता है ।
पुरुष के बंधन का हेतु स्त्री को ही बेड़ि रूप करके कहां है एवं लोहे की बेड़ी करके बाधा हुआ पुरुष छूट जाता है परंतु स्त्री के स्नेह रूपी पाश करके बाध हुआ पुरुष कदापि छूट नहीं सकता है
ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि कोई भाग्यशाली व्यक्ति ही होता है जो दुनिया की भाग-दौड़ देखकर तीन चीज़ों को त्याग देता है:
जीवितेशा: जीने की लालच.
बुभुक्शा: भोग की लालच.
बुभूत्सा: सब कुछ जानने की लालच (इंटेलेक्चुअल ईगो).
*स्त्री पुत्र धनाआदिक विषय महान पाश है , जिनका त्यागना अति कठिन है जो पुरुष उन पाश से रहित है, वही मुक्ति का अधिकारी हैं दूसरा षष्ठशास्त्रों का जाने वाला पुरुष भी मोक्ष का अधिकारी नहीं है
केवल भाग्यशाली व्यक्ति ही यह देख पाता है किः
लोग जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं
भोग के लिए पागल हैं
ज्ञान के लिए भी अहंकार पाल रहे हैं
और तब उसके भीतर से.
. जीने की लालसा
. भोगने की वासना
. जानने की जिज्ञासा
तीनों शान्त हो जाती हैं।
यह वैराग्य जबरदस्ती नहीं आता यह लोग चेष्टा को गहराई से देखने से आता है
3 संसार का वास्तविक स्वरूप
अष्टावक्र स्पष्ट घोषणा करते हैं:
*संसार अनित्य है
*तीनों तापों से दूषित है
*सार हीन है
*त्यागने योग्य है
लेकिन ध्यान रहे _
यह ज्ञान किताब से नहीं प्रत्यक्ष अनुभूति से शांति देता है
जितना की दृष्टि का विषय प्रपंच है वह सब अनित्य हैं अर्थात चेतन में अध्यस्त है
आध्यात्मिक आदि तप करके दूषित है वात पित्त श्लेष्मा आदि निमित्त से जो दुख होता है उसका नाम आध्यात्मिक दुख है याने काम क्रोध लोभ मोह आदि करके जो मानस दुख है उसी का नाम आध्यात्मिक दुख है और जो पुरुष पशु सर्प वृक्ष आदि निमितक तक दुख है उसका नाम आदि भौतिक दुख है , यक्ष, राक्षक , विनायकादि निमित्त जो दुख है उसका नाम आदि दैविक दुख है
इन तीन प्रकार के दुखों करके पुरुष सदैव सतत रहता है इसी बात से यह सब प्रपंच आसार हैं तुच्छ है , त्यागने योग्य हैं ,
ऐसा जानकर ज्ञानवान किसी भी पदार्थ की इच्छा नहीं करता है
4 द्वंद मुक्त कल या अवस्था कभी नहीं आएगी
एक बड़ा भ्रम तोड़ता है
ऐसा कोई समय उम्र या अवस्था नहीं जहां द्वंद समाप्त हो जाए
तो समाधान क्या है ?
*उपेक्षा
* यथाप्राप्त में संतोष
जो व्यक्ति:
जो मिला है, उसमें सहज रहता है
जो नहीं मिला, उसके लिए रोता नहीं
वही सिद्धि को प्राप्त होता है।
पुरुषों को सुख दुःखादिक द्वन्द्व किसी खास काल या अवस्था में नहीं व्यापता है, किन्तु सब अवस्थाओं में और सर्व कालों में सुख-दुःखादिक द्वन्द्र देहधारी को बराबर बने रहते है सुख के अनन्तर दुःख होता है, और दुःख के अनन्तर सुख होता है; ये दोनों निश्चय करके जीव को अलंध्य हैं, याने हटाये नहीं जा सकते हैं ।।
सुख में दुःख, और दुःख में सुख स्थित है, अर्थात् क्षण- मात्र सुख के देनेवाले विषयों से अनेक रोगादिक दुःख उत्पन्न होते हैं, और उपवासादिक व्रतों से जिसमें दुःख होता है, फिर विषयों की प्राप्ति रूपी सुख होता है। ये दोनों सुख दुःख ऐसे मिले हैं, जैस मे पानी और कीच मिले होते हैं
किसी भी देहधारी से ये सुख-दुःख किसी काल में त्यागे नहीं जा सकते हैं, इस वास्ते विवेकी पुरुष उन सुख-दुःखा- दिक द्वन्द्रों में भो इच्छा को त्यागकर शरीर को प्रारब्ध आश्रित छोड़ देता है
5 सच्चा गुरु कौन है ?
जो व्यक्ति:
उपेक्षा
समता
विवेक
के द्वारा चैतन्य के वास्तविक स्वरूप को जान ले
और स्वयं को संसार से पार कर ले —
वही सच्चा गुरु है,
चाहे उसने शिष्य बनाए हों या नहीं।
कृत्वा मूत्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न कि गुरुः ।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ९. ६ ॥
अष्टावक्र जी कहते हैं –
जो व्यक्ति युक्ति (विवेक), वैराग्य (निर्वेद) और समता के द्वारा अपने चैतन्य आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है, और स्वयं को संसार (जन्म-मरण) से पार कर लेता है – वही सच्चा गुरु है।
केवल मंत्र फूंकने वाला, केवल परंपरा से गुरु कहलाने वाला, • या केवल बाहरी रूप (मूर्ति) का ज्ञान देने वाला वास्तविक गुरु नहीं है।
मुक्ति किसी दूसरे के द्वारा नहीं, अपने पुरुषार्थ और आत्म-बोध से होती है।
जो व्यक्ति
✔ विषय-वासना का त्याग कर चुका है
✔ मित्र-शत्रु में समान दृष्टि रखता है
✔ श्रुति (वेद) के अनुकूल विवेक से
✔ अपने सच्चिदानंद आत्मस्वरूप को जान चुका है
वह अपने ही प्रयास से संसार से मुक्त होता है।
कोई दूसरा उसे मुक्त नहीं कर सकता।
इसलिए तुम भी अपने ही पुरुषार्थ से मुक्त होगे,
किसी दूसरे के भरोसे नहीं।
अष्टावक्र जी कहते हैं —
जो अज्ञान दूर करे और आत्मज्ञान दे, वही गुरु है।
मंत्र फूँकना, आशीर्वाद देना, चमत्कार दिखाना
गुरु होने की कसौटी नहीं है।
मुक्ति शिष्य स्वयं प्राप्त करता है।
गुरु केवल दिशा दिखाता है।
जैसे —
रास्ता बताने वाला चल नहीं सकता,
चलना तुम्हें ही पड़ता है।
जैसे कुछ लोग मानते हैं —
*पैगम्बर पाप छुड़ा देगा
*ईसा पाप छुड़ा देगा
*गुरु पाप छुड़ा देगा
शास्त्र कहते हैं —
✔ जो जन्म-मरण के बंधन से छुड़ाए
✔ जो संशयों का नाश करे
✔ जो आत्मज्ञान दे वही गुरु है।
जैसे भगवान श्री राम ने वशिष्ठ को गुरु तब माना जब सारे संशय मिटे
अर्जुन ने कृष्ण को गुरु तब माना जब आत्म-बोध हुआ
गुरु = संशय-नाशक
आत्म-दृष्टि में गुरु-शिष्य भी मिथ्या
जब आत्मज्ञान हो जाता है —
गुरु-शिष्य का भेद भी मिट जाता है क्योंकि आत्मा में कोई दूसरा नहीं
,झूठे गुरुओं की आलोचना अष्टावक्र जी कठोर शब्दों में कहते हैं —
अज्ञानी गुरु शिष्यों को पशु बना देते हैं ,भेद-भाव बढ़ाते हैं
अपनी आजीविका के लिए धर्म का व्यापार करते हैं
कबीर भी कहते हैं —
गुरु लोभी, शिष्य लालची, दोनो खेलें दाँव।
दोनो डूबे बापड़े, बैठ पथर की नाव॥
गुरुजन जाका है गृही, चेला गृही जो होय।
कीच कीच को धोवते, दाग न छूट कोय॥
बँधे को बँधा मिले, छूटे कौन उपाय।
सेवा कर निर्बंध की, पल में देय छुड़ाय॥
अर्थ :
यदि गुरु लोभ से भरा हो और शिष्य लालच से,तो दोनों मिलकर एक जुए जैसा खेल खेलते हैं।अंत में दोनों ही डूब जाते हैं,क्योंकि वे पत्थर की नाव में बैठे हैं।जिस गुरु का मन ही गृहस्थी (आसक्ति) में फँसा हो और शिष्य भी उसी आसक्ति में डूबा हो,
तो दोनों कीचड़ से कीचड़ धोने का प्रयास कर रहे हैं।
ऐसे में किसी का भी दाग नहीं छूटता।यदि बँधा हुआ व्यक्ति बँधे हुए से मिले,
तो छूटने का कोई उपाय नहीं।
लेकिन जो निर्बंध (मुक्त) है,
उसकी सेवा से क्षण में मुक्ति मिल सकती है।
मुक्ति किसी गुरु से नहीं,
अपने आत्म-बोध से होती है।
सच्चा गुरु वही है जो तुम्हें
तुमसे मिला दे।”
जो गुरु ज्ञान से हीन हो, मिथ्यावादी हो, विडम्बी हो, उसका त्याग कर देना चाहिए । क्योंकि जब वह अपना ही कल्याण नहीं कर सकता है, तो शिष्यों का कल्याण क्या करेगा। ऐसे मूर्ख अज्ञानी गुरु के त्याग में बहुत से शास्त्रोक्त प्रमाण हैं, पर मूर्ख अज्ञानी लोग कुकर्मी मूर्ख गुरुओं को नहीं त्यागते हैं, क्योंकि प्रथम तो लोग आत्मा के ही कल्याण को नहीं जानते हैं। दूसरे उनके चित्त में भय रहता है कि गुरु के निरादर करने से हमारे को कोई विघ्न न हो जावे, इसी से मूर्खी के मूर्ख जन्म भर उनके पशु बने रहते हैं। इन मूर्ख शिष्य गुरुओं का इस जगह में निरूपण करने का कोई प्रकरण नहीं है, इस वास्ते उनका प्रसंग छोड़ दिया जाता है। हे राजन् ! ज्ञान की प्राप्ति के अनन्तर गुरु- शिष्य-व्यवहार भी मिथ्या हो जाता है, क्योंकि उसकी भेद- बुद्धि नहीं रहती है ॥
6 बंधन से मुक्ति तक
भूतों के विकार जो देह इन्द्रियादिक हैं, उनको यथार्थ रूप से तुम भूत मात्र देखो, आत्म-रूप करके उनको तुम मत देखो । जब तुम ऐसे देखोगे, तब उसी क्षण में शरीरादिकों से पृथक होकर आत्म-स्वरूप में स्थित हो जाओगे और उनका साक्षीभूत आत्मा भी तुमको करामल- कवत् प्रत्यक्ष प्रतीत होने लगेगा ॥
विषयों की जो अनेक वासनाएँ हैं, वही संसार है अर्थात् बंधन है ।
वासनाएं तीन प्रकार की हैं।
* १ – लोक वासना अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोक की प्राप्ति मुझको हो ।
* २- दूसरी शास्त्र वासना अर्थात् सब शास्त्रों को पढ़कर मैं ऐसा पण्डित हो जाऊँ कि मेरे तुल्य दूसरा कोई न हो ।
*३ – तीसरी शरीर की वासना अर्थात् मेरा शरीर सबसे सुन्दर और पुष्ट सदैव बना रहे ।
इन तीनों प्रकार की वासनाओं के त्याग करने से पुरुष बन्ध से छूट जाता है और उसका चित्त आत्मा में भी स्थिर हो जाता है।
दो प्रकार की वासनाएँ कही गई हैं पहली शुद्ध वासना, दूसरी मलिन वासना । किसी प्रकार से मेरी मुक्ति हो और मैं अपनी आत्मा का साक्षात्कार करूँ, उसके लिये जो वृत्ति आदिकों का निरोध करना है, वह शुभ वासना है। विषय भोगों की प्राप्ति की जो वासना है, वह मलिन वासना है। दोनों में से मलिन वासना जन्म का हेतु है और शुद्ध वासना जन्म का नाशक है । जो चतुर्थ भूमिकावाला ज्ञानी है और जो मुमुक्षु है, उनके लिये शुभ वासना का त्याग नहीं है, किन्तु अशुभ वासना का ही त्याग है। क्योंकि विदेहमुक्ति में आत्म-ज्ञान की ही प्रधानता है । शुभ वासना का नाश उपयोगी नहीं है, परन्तु जीवन्मुक्ति के लिये समग्र वासनाओं का त्याग और मन का भी नाश और आत्म-ज्ञान, ये तीनों उपयोगी हैं।
यहाँ पर अष्टावक्रजी जीवन्मुक्ति के मुख के लिये जनकजी से कहते हैं कि तू समग्र वासनाओं का त्याग कर ।।
