गुरु बिन घोर अंधेरा रे सन्तों, गुरु बिन घोर अंधेरा जी
बिना दीपक मन्दिरियो सूनो, अब नहीं वस्तु का बेरा हो जी ॥
* जब तक कन्या रेवे कंबारी, नहीं पुरुष का बेरा जी ।
आठों पहर आवस में खेले, अब खेले खेल घणेरा हो जी ।
गुरु बिन घोर अंधेरा रे सन्तों, गुरु बिन घोर अंधेरा जी ।
बिना दीपक मन्दिरियो सूनो, अब नहीं वस्तु का बेरा हो जी ॥
* मिरगे री नागिन बसे किस्तूरी, नहीं मिरगे को बेरा जी
रनी वनी में फिरे भटकतो, अब सूंघे घास घणेरा हो जी ॥
गुरु बिन घोर अंधेरा रे सन्तों, गुरु बिन घोर अंधेरा जी ।
बिना दीपक मन्दिरियो सुनो, अब नहीं वस्तु का बेरा हो जी
* जब तक आग रेवे रे पथर में, नहीं पथर को बेरा जी
चकमक चोटी लागे शब्द री, अब फेंके आग चोपेरा हो जी ॥
गुरु बिन घोर अंधेरा रे सन्तों, गुरु बिन घोर अंधेरा जी ।
बिना दीपक मन्दिरियो सुनो, अब नहीं वस्तु का बेरा हो जी ॥
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रामानन्द मिल्या गुरु पूरा, दिया शब्द तत्सारा जी ।
कहत कबीर सुणो रे भाई संतों ! अब मिट गया भरम अंधेरा हो जी ॥
गुरु बिन घोर अंधेरा रे सन्तों, गुरु बिन घोर अंधेरा जी ।
बिना दीपक मन्दिरियो सुनो, अब नहीं वस्तु का बेरा हो जी ।
