अष्टावक्र गीता का छठा अध्याय अद्वैत वेदांत की अत्यंत सूक्ष्म और ऊंची अवस्था को प्रकट करता है यह अध्याय साधक को यह समझना नहीं आता कि क्या करना है , बल्कि यह प्रकट करता है कि वास्तव में कुछ भी करने योग्य नहीं है ।
यहां का ज्ञान का अर्थ है
ना त्याग ग्रहण न लय केवल स्वरूप में स्थित रहना है
आत्मा आकाश के समान है
आकाश में __
बादल आते हैं जाते हैं पर आकाश ना गिला होता है ना सुख इस प्रकार संसार आत्मा में घटित होता है पर आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता जो इस सत्य को जान लेता है उसके लिए न त्याग शेष रहता है ना ग्रहण ।
जो वस्तु उत्पत्ति से पहले नहीं है और ना से उत्तर भी नहीं वह वर्तमान काल में भी नहीं परंतु नित्य होकर सत्य की तरह वर्तमान काल में प्रतीत होता है
ज्ञानियों ने ऐसा अनुभव करके वेदांत शास्त्र द्वारा देखा है कि केवल अद्वैत अनंत स्वरूप आत्मा ही सत्य और सारा प्रपंच प्रतीत मात्र ही है वास्तव में नहीं है
आत्मा समुद्र के समान है
अष्टाव जी कहते हैं कि मैं महासमुंद के समान हूं और यह संसार केवल तरंगे है
तरंगे उठाती है गिरती है टकराती है पर समुद्र ना बढ़ता है और ना घटना है जन्म और मृत्यु तरंगे है आत्मा सदा अपरिवर्तित है ।
इस ज्ञान के बाद मनुष्य क्या छोड़े और क्या पकड़े ?
संसार इन्द्रजाल के समान है
यह अध्याय संसार को इंद्रजाल ( माया )कहता है
इंद्रजाल में __
सब कुछ दिखता है पर कुछ भी वास्तविक नहीं होता उसी प्रकार संसार अनुभव में है पर सत्य में नहीं है इसलिए ज्ञानी के लिए न संसार का ग्रहण है ना संसार का त्याग
क्योंकि जो कल्पना मात्र है , उससे संबंध कैसे?
चैतन्य ही मै हुं
अष्टावक्र का स्पष्ट उद्घोष
“अहम चिन्मात्रमेव
मैं केवल चैतन्य हूं
मैं ही संपूर्ण भूतों में व्यापक रूप करके मणिओ में सूत की तरह वार्ता हूं मैं ही सबका अधिष्ठान रूप होकर सत्ता और स्पूर्ति का देने वाला हूं मेरे में ही सारा जगत आकाश में नीलता की तरफ अध्यस्त है
मै —
देह नहीं मन नहीं इंद्रिय नहीं
मैं वही साक्षी हूं जो सबको देख रहा है
जब यह स्पष्ट हो जाता है तो करता भी मिट जाता है भोक्ता भी मिट जाता है
अष्टावक्र जी कहते है कि तू कुछ बन नहीं रहा , तू कुछ छोड़ नहीं रहा , तू केवल वही है जो सदा था
