मन से बड़ा बहरूपिया ना कोई पल-पल रचता स्वांग निराले
माया ममता से उलझ रहे वो पड़ जाए जो मन के पाले
मन के बहकावे में ना , मन रहा भूलावे भ्रम मे डाले
तू इस मन का दास ना बन , इस मन को अपना दास बनाले
मन है शरीर के रथ के सारथी रथ को चाहे जिधर ले जा
इंद्रिय है इस रथ के घोड़े , घोड़े को विषयो की ओर भगाए
आत्मा और शरीर के मध्य में , ये मन अपने खेल दिखाएं
मन को वश मे कर ले जो योगी, वो इसी रथ से मोक्ष को जाए
मन को वश मे करले जो प्राणी , वो इसी रथ से अनंत को जाए
