मन से बड़ा बहरूपिया ना कोई  पल पल रचता स्वांग निराले| lyrics ravindra Jain

मन से बड़ा बहरूपिया ना कोई पल-पल रचता स्वांग निराले

माया ममता से उलझ रहे वो पड़ जाए जो मन के पाले

मन के बहकावे में ना  , मन रहा भूलावे भ्रम मे डाले

तू इस मन का दास ना बन ,  इस मन को अपना दास बनाले

मन है शरीर के रथ के सारथी रथ को चाहे जिधर ले जा

इंद्रिय है इस रथ के घोड़े ,  घोड़े को  विषयो की ओर भगाए

आत्मा और शरीर के मध्य में , ये मन अपने खेल दिखाएं

मन को वश मे कर ले जो योगी, वो इसी रथ से मोक्ष को जाए

मन को वश मे करले जो  प्राणी , वो इसी रथ से अनंत को जाए

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