अष्टावक्र गीता का सातवां प्रकरण राजा जनक की आत्म साक्षात्कार से उपजी वाणी है यहां गुरु नहीं बोल रहे यहां ज्ञान स्वयं बोल रहा है ।
आत्मा= अन्नत महासमुंद
संसार= उठती _ गिरती लहरें
* संसार की नाव, आत्मा का समुद्र
” मुझमें अनंत महासमुंद में संसार उपनाम अपनी ही वायु से इधर-उधर डोलती हैं मुझे कोई असहिष्णुता नहीं । “
संसार हमें परेशान नहीं करता है हमारी ही वासनाएं हवा बन जाती हैं समुद्र कभी नाव से परेशान नहीं होता वैसे ही आत्मा मन की हलचलों से विचलित नहीं होता है
* लहरें से समुद्र नहीं बदलता है
जगत-रूपी लहर
उठे या मिटे—
मुझे न वृद्धि है, न हानि।
👉 यहाँ जनक का साहस देखिए:
सुख-दुःख, लाभ-हानि,
जन्म-मृत्यु—
ये सब लहरें हैं।
समुद्र वही रहता है।
आत्मा देहादिभावों में आधेय अर्थात् आश्रित रूप करके नहीं है, क्योंकि आत्मा व्यापक है, देहादिक सब परिच्छिन्न हैं। व्यापक, परिच्छिन्न के आश्रित नहीं होता। और आत्मा निराकार होने से देहादिकों की उपाधि भी नहीं हो सकता है, क्योंकि आत्मा सत्य है, देहादिक सब मिथ्या है। सत्य वस्तु मिथ्या वस्तु की उपाधि नहीं हो सकती है। और देह इन्द्रियादिक आत्मा की उपाधि भी नहीं हो सकते हैं, क्योंकि आत्मा अनन्त और निरञ्जन है और देहादिक अन्तवान् और नाशवान् हैं, इसी कारण आत्मा सम्बन्ध से रहित है और इच्छा आदिकों से भी रहित है एवं आत्मा शान्त स्वरूप है।
* संसार केवल कल्पना है
मुझ महान समुद्र रूपी आत्मा में जो जगत की कल्पना है सो भ्रम मात्र ही है । वास्तव में नहीं क्योंकि मेरा अनंत स्वरूप निराकार है निराकार से साकार की उत्पत्ति नहीं बनती है जबकि आत्मा में जगत की वास्तव में उत्पत्ति नहीं बनती है तो मैं प्रपंच से रहित शांत रूप होकर स्थित हो एवं लय योग भी मेरे को करना उचित नहीं है
मुझमें अनंत महासमुद्राम में संसार केवल विकल्पन है मैं शांत हो निराकार हूं
कल्पना में संघर्ष होता है स्वरूप में शांति
* बंधन की जड़ काट दो
“आत्मा विषय में नहीं और विषय आत्म में नहीं , इस प्रकार ” में अनासक इच्छा रहित और शांत हो”
हम सोचते हैं कि मैं वस्तुओं में उलझा हूं , जनक जी कहते हैं की आत्मा कभी वस्तु में गई नहीं ।
आत्मा देहाती भाव में आधेय अर्थात आश्रित रूप करके नहीं है , क्योंकि आत्मा व्यापक है देहार्दिक सब परिच्छिन्न है व्यापक परिच्छिन्न के आश्रित नहीं होता और आत्मा निराकार होने से देहआदिको की उपाधि भी नहीं हो सकता क्योंकि आत्मा सत्य है देहार्दिक सब मिथ्या है । सत्य वस्तु मिथ्या वस्तु की उपाधि नहीं हो सकती और देह इंद्रियआदिक आत्मा की उपाधि भी नहीं हो सकते , क्योंकि आत्मा अनंत और निरंजन है और देहादिक अनंतवन और नाशवान है इसी कारण आत्म संबंध से रहित है और इच्छाआदिकों से भी रहित है एवं आत्मा शांत स्वरूप है
* हेय और उपादेय किसके लिए?
“आहो ! में चैतन्यमात्र हूं । संसार इंद्रजाल जैसा है फिर मेरे लिए क्या त्याग है और क्या ग्रहण है ? ”
जब सब माया है तो छोड़ने को क्या है पाने को क्या है ?
संपूर्ण जगत इंद्रजाल के तुल्य मेरी सत्ता के बल ओर अपनी सत्ता से रहित प्रतीत होता है , जगत की अपनी सत्ता कुछ भी नहीं है इस वास्ते मेरे को किसी प्रदार्थ में भी किसी प्रकार करके त्याग ओर ग्रहण की बुद्धि नहीं होती है । जो पुरुष जगत के पदार्थ को सत्य मानता है , उसी की उनमें ग्रहण और त्याग बुद्धि होती है।
