हम सबका जन्म हरि नाम जपने के लिए हुआ है, परंतु अक्सर यह महसूस होता है कि जीवन का कोई और भी उद्देश्य है। इस संदर्भ में महाराज जी समझाते हैं कि यह संसार एक स्वप्न की भांति है, जिसमें दुख और सुख केवल जागने से ही समाप्त होते हैं। जिस प्रकार स्वप्न में किए गए कार्य जागने के बाद न पुण्य देते हैं और न पाप, उसी प्रकार यह सांसारिक कर्तव्य भी एक स्वांग या नाटक की तरह हैं। हमें अपने जीवन के स्वांग—चाहे वह पति, पत्नी, पिता या पुत्र का हो—को मर्यादा में रहकर पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए, लेकिन यह हमेशा याद रखना चाहिए कि हम यह स्वांग नहीं, बल्कि सत्य सच्चिदानंद स्वरूप हैं। यदि हम इस सत्य को भूलकर केवल स्वांग में ही उलझ गए, तो अगला जन्म फिर से किसी नई योनि में तय है, लेकिन यदि हम यह जान गए कि हम कौन हैं, तो परमात्मा हमें अपनी दिव्य लीला में समाहित कर लेते हैं। संसार में सबको प्रेम की भूख है, लेकिन वह केवल भगवान से प्रेम करने पर ही शांत होती है, क्योंकि लौकिक जगत में स्वार्थ के बिना प्रेम नहीं होता। शरीर स्वस्थ रहते हुए हमें भगवान का नाम जप करना चाहिए, क्योंकि शरीर अनित्य है और एक दिन बुढ़ापा व मृत्यु अवश्य आने हैं। भजन और सत्संग के माध्यम से शरीर के प्रति राग का त्याग करके जीते-जी जीवन-मुक्त होना ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।
अपना देश, अपनी ज़िम्मेदारी -मिलकर बनाए नया भारत
